राजस्थान में दिसंबर 2023 के विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता परिवर्तन हो चुका है और वर्तमान में बीजेपी की सरकार है. लेकिन, राज्य के तीन बार (कुल 15 साल) मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस के कद्दावर नेता अशोक गहलोत की राजनीतिक छाप आज भी सदन से लेकर सड़क तक महसूस की जाती है.
बुधवार (15 जुलाई) को राजस्थान विधानसभा के गौरवशाली 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित ‘अमृत महोत्सव’ कार्यक्रम के दौरान एक ऐसा ही दिलचस्प और अप्रत्याशित वाकया सामने आया, जिसकी अब सियासी हलकों में खूब चर्चा हो रही है.
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सदन में कुछ पल के लिए छा गया सन्नाटा
कार्यक्रम के दौरान मंच से बोलते हुए वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) वासुदेव देवनानी की जुबान अचानक फिसल गई. उन्होंने अपने संबोधन में भूलवश पूर्व सीएम अशोक गहलोत को ‘मुख्यमंत्री अशोक गहलोत’ कहकर संबोधित कर दिया.
स्पीकर देवनानी के मुंह से वर्तमान मुख्यमंत्री की बजाय पूर्व सीएम के लिए ‘मुख्यमंत्री’ शब्द सुनते ही पूरे सदन में कुछ पल के लिए अजीब सा सन्नाटा छा गया. उपस्थित लोग एक-दूसरे का मुंह देखने लगे.
हालांकि, सदन में मौजूद सत्ता पक्ष या विपक्ष के किसी भी विधायक और दिग्गज नेता ने इस भूल पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई. बिना किसी टोका-टाकी या हंगामे के स्पीकर ने अपनी बात पूरी की और कार्यक्रम अपनी सामान्य गति से आगे बढ़ गया. जानकारों का मानना है कि लंबे समय तक सीएम रहने के कारण कई बार नेताओं के मुंह से स्वाभाविक रूप से उनके नाम के साथ यह पदवी निकल जाती है.
कार्यक्रम में क्यों शामिल नहीं हुए अशोक गहलोत?
दरअसल, विधानसभा के इस विशेष सत्र में राजस्थान के अब तक के संसदीय सफर, पुराने और महत्वपूर्ण कानूनों तथा वर्तमान समय में उनकी प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा होनी थी. इस ऐतिहासिक सत्र के लिए राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और पूर्व सीएम अशोक गहलोत को विशेष तौर पर चर्चा के लिए आमंत्रित किया गया था.
स्वास्थ्य कारणों से रहे अनुपस्थित
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे हैं. इसी कारण वे इस महत्वपूर्ण और गरिमामयी कार्यक्रम में व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हो सके.
सीपी जोशी ने संभाला मोर्चा
अशोक गहलोत की अनुपस्थिति में कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी को इस सत्र की अध्यक्षता के लिए भेजा गया. उन्होंने मंच साझा करते हुए अपने व्यापक संसदीय अनुभव के साथ महत्वपूर्ण कानूनों पर चर्चा को आगे बढ़ाया और गहलोत की कमी को पूरा किया.
