36 दिनों तक दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के छात्र आंदोलन ने इतिहास रच दिया. NEET पेपर लीक के खिलाफ उठी इस आवाज ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा करवा दिया. लेकिन जैसे ही आंदोलन खत्म हुआ, वैसे ही इसे बदनाम करने की मुहिम शुरू हो गई. आंदोलन में आपराधिक तत्वों के शामिल होने की बातें, गाली-गलौज के वीडियो वायरल करना, सोशल मीडिया पर पोस्ट हटवाना और आंदोलन के मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिशें हुईं. आखिर CJP आंदोलन को दागदार क्यों किया जा रहा है…
पहला दाग: 2,873 लोगों में से 989 आपराधिक पृष्ठभूमि वाले?
CJP आंदोलन को बदनाम करने का पहला और सबसे बड़ा हथियार बना दिल्ली पुलिस का आंकड़ा. 20 जुलाई को ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान हुई झड़पों के बाद पुलिस ने CCTV फुटेज के आधार पर 2,873 लोगों की पहचान की. पुलिस का दावा है कि इनमें से 989 लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड है, यानी हर तीन में से एक. दिल्ली पुलिस के मुताबिक, इन 989 लोगों में:
| अपराध | संख्या |
| हत्या के आरोपी | 101 |
| हत्या की कोशिश | 62 |
| डकैती/लूट | 284 |
| बलात्कार | 61 |
| महिलाओं के साथ छेड़छाड़ | 25 |
| बच्चों से यौन अपराध (POCSO) | 6 |
| शस्त्र अधिनियम | 229 |
| नशीले पदार्थ (NDPS) | 67 |
| अपहरण | 19 |
| झपटमारी | 135 |
क्या ये आंकड़े सच हैं?
यहां दो बड़े सवाल उठते हैं:
- पुलिस ने CCTV फुटेज से 2,873 लोगों की पहचान की, लेकिन CJP आंदोलन में हजारों लोग शामिल थे. क्या 2,873 लोगों के नमूने को पूरे आंदोलन का प्रतिनिधि माना जा सकता है?
पुलिस का कहना है कि इनमें से 989 लोग आपराधिक पृष्ठभूमि वाले थे. CJP का आरोप है कि सरकार ने आंदोलन खत्म होने से पहले यह आश्वासन दिया था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई या FIR नहीं दर्ज की जाएगी. तो ऐसा क्यों नहीं हुआ? - सरकार ने एक तरफ आंदोलनकारियों को FIR वापसी का आश्वासन दिया. दूसरी तरफ पुलिस आंकड़े जारी कर आंदोलन को ‘अपराधियों का जमावड़ा’ बताने लगी. यह विरोधाभास अपने आप में सवाल खड़ा करता है कि क्या ये आंकड़े आंदोलन को बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं?
दूसरा दाग: ‘नीम का पत्ता कड़वा है…’ गाली का विवाद
आंदोलन को बदनाम करने का दूसरा बड़ा हथियार बना ‘अभद्र भाषा’ का मुद्दा. आंदोलन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाए.
असम के NDA मंत्री केशब महंत की बेटी दिबिसा महंत का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह CJP प्रदर्शन के दौरान ‘नीम का पत्ता कड़वा है…’ का नारा लगाती नजर आईं. यह नारा बेहद आपत्तिजनक था और सोशल मीडिया पर तुरंत वायरल हो गया.
आंदोलन खत्म होने के बाद दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पर PM मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट्स के खिलाफ अभियान तेज कर दिया. कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस भेजे गए और सैकड़ों पोस्ट, वीडियो और कमेंट हटा दिए गए. पुलिस की एक टीम लगातार ऑनलाइन कंटेंट की निगरानी कर रही है.
क्या गाली पूरे आंदोलन को बदनाम करने का बहाना है?
CJP का कहना है कि उसने शुरू से ही शांतिपूर्ण आंदोलन की वकालत की. CJP के प्रवक्ता का दावा है कि 37 दिनों का आंदोलन शांतिपूर्ण रहा. फिर भी कुछ लोगों की गालियों को तूल देकर पूरे आंदोलन को ‘अभद्र’ करार देने की कोशिश की जा रही है.
दिलचस्प बात ये है कि जब कंगना रनौत और अनुपम खेर जैसी हस्तियों ने आंदोलन में शामिल लड़कियों की भाषा पर सवाल उठाए, तो भी यही पैटर्न दिखा. आंदोलन के मूल मुद्दे से ध्यान हटाकर भाषा और शिष्टाचार पर बहस छेड़ दी गई.
तीसरा दाग: ‘खालिस्तानी कनेक्शन’ का आरोप
प्रतिबंधित संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) के प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नू ने एक वीडियो जारी कर दावा किया कि उसने CJP आंदोलन को…. हालांकि इस दावे को CJP ने खारिज कर दिया, लेकिन मीडिया में इसकी खूब चर्चा हुई.
चौथा दाग: ‘आंदोलन में असामाजिक तत्व घुसपैठिए’ का नैरेटिव
दिल्ली पुलिस ने यह भी दावा किया कि 20 जुलाई को हुए CJP प्रदर्शन में 2500 से ज्यादा आपराधिक मामलों वाले लोग शामिल हुए. पुलिस का तर्क है कि ‘घुसपैठियों’ ने हिंसा को अंजाम दिया. लेकिन सवाल ये है कि क्या ये ‘घुसपैठिए’ आंदोलन को बदनाम करने के लिए भेजे गए थे? या फिर पुलिस खुद ही आंदोलन को ‘अपराधियों का आंदोलन’ करार देने के लिए ये आंकड़े पेश कर रही है?
आंदोलन के नेता का आरोप: ‘जानबूझकर बदनाम करने की कोशिश’
CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने आरोप लगाया कि कुछ लोग जानबूझकर आंदोलन को बदनाम करने और माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं. आंदोलन के नेता खुद मानते हैं कि ये बदनामी की कोशिशें संगठित हैं और उनके पीछे कोई मंशा है.
तो आखिर आंदोलन को बदनाम क्यों किया जा रहा है?
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर हम सारे तथ्यों को जोड़कर देखें, तो चार बड़े कारण सामने आते हैं:
1. आंदोलन की सफलता से बनी नाराजगी
CJP आंदोलन ने शिक्षा मंत्री का इस्तीफा करवा दिया. यह भारत के हालिया इतिहास में छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है. जब कोई आंदोलन इतना ताकतवर हो जाता है, तो सत्ता की साख उसे कमजोर करने की कोशिश करती है. आंदोलन को ‘अपराधियों का जमावड़ा’ और ‘गाली देने वाले’ के रूप में पेश करना उसे कमजोर करने का सबसे आसान तरीका है.
2. भविष्य के आंदोलनों को रोकना
CJP की सफलता ने पूरे देश के युवाओं को एक संदेश दिया कि अगर एकजुट होकर आवाज उठाएं तो सरकार को झुकना पड़ता है. यह संदेश सत्ता के लिए खतरनाक है, इसलिए CJP को बदनाम करके यह संदेश देना चाहा गया कि ‘आंदोलन में अपराधी और गाली देने वाले लोग शामिल होते हैं.’ इससे भविष्य में कोई और आंदोलन न करे.
3. असली मुद्दों से ध्यान भटकाना
NEET पेपर लीक, शिक्षा प्रणाली में सुधार और पारदर्शिता गंभीर मुद्दे हैं. इन पर बहस होना सरकार के लिए तैयार नहीं है. इस वजह से बहस को भाषा, गाली और अपराधियों जैसे मुद्दों पर ले जाकर मूल मुद्दों को दफन करने की कोशिश की गई.
4. ‘आंदोलन’ बनाम ‘व्यवस्था’ की लड़ाई
CJP ने मजाक और मीम्स के जरिए सत्ता को चुनौती दी. ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसा नाम खुद में एक तंज था. जब कोई आंदोलन हंसी-मजाक और सोशल मीडिया के जरिए इतना बड़ा असर डाल ले, तो सत्ता की साख के लिए उसे गंभीरता से लेना मुश्किल हो जाता है. उसे बदनाम करना ही एकमात्र रास्ता बचता है.
सरकार के झुक जाने से व्यवस्था बैचेन
CJP आंदोलन की सफलता ने यह साबित कर दिया कि युवा एकजुट होकर बड़ी से बड़ी सरकार को झुका सकते हैं, लेकिन इसी सफलता ने आंदोलन को दुश्मन भी बना लिए. आपराधिक लोगों वाले आंकड़े, गाली-गलौज के वीडियो, खालिस्तानी कनेक्शन के आरोप और सोशल मीडिया पोस्ट हटाने की कार्रवाई एक पैटर्न दिखाते हैं- आंदोलन के असली मुद्दे को किनारे रखकर उसे बदनाम करने की कोशिश.
तो क्या हम इन बदनामी की कोशिशों में उलझकर असली मुद्दों को भूल जाएंगे? या फिर युवा एक बार फिर एकजुट होंगे और अपनी आवाज बुलंद रखेंगे?
