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Xप्लेन: राजस्थान निकाय में BJP की जीत फीकी क्यों? महाराष्ट्र-गुजरात जैसा कमाल नहीं


राजस्थान निकाय चुनाव 2026 के नतीजे आ गए हैं. BJP ने 10,245 में से 4,179 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनने का दावा किया है, लेकिन यह जीत उतनी शानदार नहीं है जितनी महाराष्ट्र और गुजरात में दिखी थी. राजस्थान में BJP को सिर्फ 35.18% वोट मिले जबकि कांग्रेस को 34.24%. यानी दोनों के वोट शेयर में सिर्फ 0.94% का फर्क है. निर्दलीय उम्मीदवारों को 27.38% वोट मिले और उन्होंने 2,273 वार्ड जीत लिए. BJP की जीत के बावजूद 10 में से सिर्फ 5 नगर निगमों में ही स्पष्ट बहुमत मिल पाया है. आखिर BJP की जीत की किरकिरी हुई कैसे और निष्कर्ष क्या है…

सबसे पहले ताजा बुनियादी आंकड़े समझिए

राजस्थान में इस बार 309 शहरी निकायों की 10,244 सीटों पर चुनाव हुए. इनमें 10 नगर निगम, 47 नगर परिषद और 252 नगर पालिकाएं शामिल थीं. चुनाव दो चरणों में हुए. 9 सितंबर को पहले चरण में 162 निकायों में 76.41% मतदान हुआ और 11 सितंबर को दूसरे चरण में 147 निकायों में 70.01% मतदान हुआ.

महाराष्ट्र और गुजरात के बाद राजस्थान में कैसे जीत फीकी?

महाराष्ट्र में BJP ने 29 नगर निगमों में से 23 पर जीत हासिल की और 2,869 सीटों में से 1,425 सीटें जीतीं. पार्टी का सीट शेयर 2017 के 39.2% से बढ़कर 49.7% हो गया, यानी 10.5% का उछाल आया. नवी मुंबई में तो BJP 6 सीटों से 65 सीटों पर पहुंच गई. मुंबई में शिवसेना का गढ़ तोड़कर BJP सबसे बड़ी पार्टी बनी.

गुजरात में BJP ने सभी 15 नगर निगमों पर कब्जा कर लिया और 9,900 में से करीब 6,472 सीटें जीतीं. नगर निगमों में तो पार्टी ने 493 में से 467 सीटें जीतकर विपक्ष को लगभग साफ कर दिया.

इसके उलट राजस्थान में BJP ने 309 निकायों में से 163 में जीत दर्ज की, लेकिन 10 बड़े नगर निगमों में सिर्फ जयपुर, कोटा, उदयपुर, भीलवाड़ा और जोधपुर (बराबरी) में ही उसकी स्थिति मजबूत रही. बीकानेर में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया, अजमेर और पाली में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी और भरतपुर में तो निर्दलीय हावी हो गए.

सीटों के हिसाब से देखें तो BJP ने 4,179 वार्ड जीते, कांग्रेस को 3,613 मिले और निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीते. वोट शेयर की बात करें तो BJP को 37,35,567 वोट मिले और कांग्रेस को 36,35,952. यानी सिर्फ 99,615 वोटों का फर्क रहा.

BJP की जीत फीकी क्यों लग रही है?

चुनाव आयोग से आंकड़े और एक्सपर्ट्स की राय लेकर फीकी जीत की 7 बड़ी वजहें निकलती हैं…

वजह-1: वोट शेयर का बेहद कम अंतर

BJP को 35.18% और कांग्रेस को 34.24% वोट मिले. यह अंतर सिर्फ 0.94% का है. यह बताता है कि शहरी राजस्थान में दोनों पार्टियों के बीच कांटे की टक्कर रही. BJP ने सीटें ज्यादा जीतीं, लेकिन वोट के मामले में वह कांग्रेस से बहुत आगे नहीं है. महाराष्ट्र में BJP का सीट शेयर 49.7% था, यानी लगभग आधी सीटें अकेले BJP के पास थीं. राजस्थान में BJP का सीट शेयर सिर्फ 41% है.

वजह-2: निर्दलीयों का राज

राजस्थान में 2,273 निर्दलीय पार्षद जीते हैं. इन्हें 27.38% वोट मिले, जो किसी भी एक पार्टी के वोट शेयर से कम नहीं है. 177 निकायों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला और निर्दलीय किंगमेकर बन गए. 47 नगर परिषदों में से 28 में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. यानी 140 से ज्यादा निकायों में सत्ता की चाबी निर्दलीयों के पास है.

इन निर्दलीयों में बड़ी संख्या उन नेताओं की है जिन्हें BJP या कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया था. BJP ने 49 बागियों को पार्टी से बाहर कर दिया था, लेकिन वे चुनाव लड़े और जीते.

वजह-3: 10 नगर निगमों में मिला-जुला प्रदर्शन

जहां किसी को बहुमत नहीं मिला:

  • जोधपुर नगर निगम (100 वार्ड): BJP 44, कांग्रेस 44, निर्दलीय 11
  • अजमेर नगर निगम (80 वार्ड): कांग्रेस 37, BJP 32, निर्दलीय 11
  • अलवर नगर निगम (65 वार्ड): BJP 28, कांग्रेस 23, अन्य 14
  • भरतपुर नगर निगम (65 वार्ड): निर्दलीय 36, BJP 20, कांग्रेस सिर्फ 7

वजह-4: दिग्गजों के गढ़ में हार

इस चुनाव ने कई बड़े नेताओं के प्रभाव वाले इलाकों में सियासी समीकरण बदल दिए हैं. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर में BJP को बड़ा झटका लगा, जहां निर्दलीयों ने 36 सीटें जीतकर दोनों प्रमुख दलों का गणित बिगाड़ दिया. BJP के 20 और कांग्रेस के सिर्फ 7 वार्ड आए. इससे साफ है कि मुख्यमंत्री के गढ़ में पार्टी की पकड़ कमजोर पड़ी है.

पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के गढ़ झालावाड़ में कांग्रेस ने 45 में से 29 वार्ड जीतकर नगर परिषद पर कब्जा कर लिया. BJP को सिर्फ 13 सीटें मिलीं. हालांकि, राजे के विधानसभा क्षेत्र झालरापाटन में BJP ने 35 में से 22 वार्ड जीतकर अपनी पकड़ बनाए रखी.

प्रदेश BJP अध्यक्ष मदन राठौड़ के पाली में कांग्रेस 29 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि BJP को सिर्फ 21 सीटें मिलीं. यह पार्टी अध्यक्ष के लिए बड़ी चुनौती है. इसके अलावा, 2 केंद्रीय मंत्रियों सहित राजस्थान के 4 कैबिनेट मंत्री और पूर्व सीएम गहलोत सहित कई कांग्रेसी अपने वार्ड में पार्टी को नहीं जितवा पाए. कई ऐसे उम्मीदवार हैं जिन्हें एक-एक वोट से संतोष करना पड़ा.

वजह-5: छोटे दलों और NOTA का उभार

निर्दलीयों के अलावा छोटे दलों ने भी अच्छा प्रदर्शन किया. हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) ने 63 वार्ड जीते, जो पिछली बार के 14 वार्ड से 350% ज्यादा है. CPI(M) ने 38 वार्ड जीते, जो पिछली बार के 8 से 375% ज्यादा है. आम आदमी पार्टी ने 42 वार्ड जीते और बारां नगर परिषद में 60 में से 31 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया. यह शहरी राजस्थान में AAP की पहली बड़ी सेंध है.

नोटा को 1.03% यानी 1,09,523 वोट मिले, जो RLP, AAP, CPI(M), BSP और BAP पांच क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के वोट शेयर से ज्यादा है. नोटा के इन वोटों को UGC के प्रस्तावित जाति आधारित कानून के खिलाफ विरोध से जोड़ा जा रहा है. BJP के समर्थन में माने जाने वाले राजपूत समाज के एक हिस्से ने पार्टी को वोट देने के बजाय निर्दलीय उम्मीदवारों और नोटा का विकल्प चुना.

वजह-6: डीलिमिटेशन से सीटें बढ़ीं, तुलना मुश्किल

इस बार परिसीमन के बाद निकायों में सीटें 37% बढ़ गईं. पिछली बार 7,474 वार्ड थे, जो इस बार 10,244 हो गए यानी 2,770 नए वार्ड जुड़े. BJP के वार्डों की संख्या 57% बढ़ी जबकि कुल वार्ड सिर्फ 37% बढ़े. कांग्रेस के वार्डों की संख्या सिर्फ 19% बढ़ी. यानी BJP को परिसीमन का फायदा मिला है, लेकिन सीट-दर-सीट तुलना मुश्किल है.

वजह-7: कांग्रेस ने कई जगह सेंध लगाई

कांग्रेस ने पिछली बार के मुकाबले 5% वोट शेयर खोया है, लेकिन वह अब भी 34% वोट के साथ मजबूत बनी हुई है. BJP को सिर्फ 1% का फायदा मिला है. कांग्रेस ने बीकानेर में स्पष्ट बहुमत हासिल किया. अजमेर और पाली में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.

सबसे बड़ी जीत पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के गढ़ झालावाड़ में मिली. कांग्रेस नेता गोविंद सिंह डोटासरा के गृह क्षेत्र सीकर और लक्ष्मणगढ़ में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया.

2028 विधानसभा चुनाव के लिए क्या संकेत

इस चुनाव को 2028 के विधानसभा चुनाव का ‘फर्स्ट सेमीफाइनल’ माना जा रहा है. कांग्रेस को पिछली बार के मुकाबले 5% वोट शेयर का नुकसान हुआ है, लेकिन वह अब भी 34% वोट के साथ मजबूत बनी हुई है. BJP को सिर्फ 1% का फायदा मिला है. यह बताता है कि राजस्थान की शहरी सियासत में अब भी कांटे की टक्कर है.

BJP के लिए सबसे बड़ी चेतावनी यह है कि उसकी जीत सीटों के गणित में तो दिख रही है, लेकिन वोटों के मामले में वह कांग्रेस से बहुत आगे नहीं है. निर्दलीयों और छोटे दलों का उभार बताता है कि जनता स्थानीय स्तर पर पार्टी से ज्यादा व्यक्ति को महत्व दे रही है.

एक लाइन में कहें तो राजस्थान में BJP जीती है, लेकिन महाराष्ट्र और गुजरात जैसी प्रचंड जीत नहीं मिली. 21 सितंबर को मेयर और सभापति के चुनाव होंगे, तब पता चलेगा कि निर्दलीयों की असली ताकत कितनी है और किस पार्टी को कितना फायदा होगा. फिलहाल, BJP के लिए यह जीत आत्ममंथन का संदेश है, उत्सव का नहीं.



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