sweet potato farming: शकरकंद एक ऐसी फसल है जिसे कम लागत और सीमित देखभाल में भी अच्छी पैदावार के साथ उगाया जा सकता है. अगर आप अपने फार्म हाउस पर शकरकंद की खेती शुरू करने की योजना बना रहे हैं, तो बुवाई से पहले कुछ जरूरी तैयारियां करनी होती हैं. सही मिट्टी, स्वस्थ बीज और सिंचाई की उचित व्यवस्था फसल की सफलता में अहम भूमिका निभाती है और आगे चलकर उपज को भी बेहतर व मुनाफेदार बनाती है.
खेत की मिट्टी और जुताई की तैयारी करें
शकरकंद की खेती के लिए बलुई-दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, जिसमें पानी का निकास आसानी से होता है. बुवाई से पहले खेत की दो से तीन बार गहरी जुताई करनी चाहिए ताकि मिट्टी भुरभुरी बन जाए और जड़ों को फैलने में आसानी हो. जुताई के समय खेत में गोबर की सड़ी हुई खाद मिलाना फायदेमंद माना जाता है, इससे मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है. खेत में मेड़ बनाकर बुवाई करना बेहतर तरीका माना जाता है, क्योंकि इससे जलभराव की समस्या नहीं होती और कंद आसानी से विकसित होते हैं. मेड़ की ऊंचाई सही रखने से कंद का आकार भी बेहतर बनता है और खुदाई करने में भी आसानी रहती है. खेत का चुनाव करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वहां पानी लंबे समय तक जमा न रहे, क्योंकि इससे जड़ें खराब होने लगती हैं. मिट्टी की जांच करवाकर उसमें जरूरी पोषक तत्वों की कमी को पहले ही पूरा कर लेना चाहिए, ताकि फसल की शुरुआत मजबूत नींव के साथ हो सके.
स्वस्थ बीज और सही समय पर बुवाई करें
शकरकंद की बुवाई के लिए स्वस्थ और रोगमुक्त बेल के टुकड़ों का चयन करना जरूरी होता है, क्योंकि इसी से पौधे की शुरुआती ग्रोथ तय होती है. आमतौर पर बारिश के मौसम की शुरुआत में यानी जून से जुलाई के बीच बुवाई करना सबसे उपयुक्त समय माना जाता है. बेल के टुकड़ों को मेड़ों पर उचित दूरी बनाकर लगाना चाहिए, ताकि पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिले. आमतौर पर पौधों के बीच 25 से 30 सेंटीमीटर की दूरी रखना उपयुक्त माना जाता है, इससे बेलों को फैलने की पूरी जगह मिलती है. बुवाई से पहले बेल के टुकड़ों को हल्के फफूंदनाशी घोल में डुबोकर लगाना भी फायदेमंद माना जाता है, इससे शुरुआती बीमारियों से बचाव होता है. बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना जरूरी होता है, इससे बेल जल्दी जमीन पकड़ लेती है और पौधे की मृत्यु दर भी कम होती है. सही समय पर बुवाई करने से पैदावार में भी काफी सुधार देखने को मिलता है और फसल तैयार होने में भी कम समय लगता है.
यह भी पढ़ें: शहद उत्पादन में दुनिया में नंबर-1 कौन, जानें भारत का नंबर?
सिंचाई और खरपतवार प्रबंधन पर दें ध्यान
शकरकंद की फसल में ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती, लेकिन मिट्टी में नमी बनाए रखना जरूरी होता है. शुरुआती एक महीने में हल्की और नियमित सिंचाई करनी चाहिए, जबकि बाद में जरूरत के अनुसार ही पानी देना सही रहता है. ज्यादा पानी देने से कंद सड़ने की समस्या हो जाती है, इसलिए सिंचाई में संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी होता है. खेत में उगने वाले खरपतवार पौधों के पोषण को प्रभावित करते हैं, इसलिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना जरूरी होता है.
बुवाई के 20 से 25 दिन बाद पहली निराई करना फायदेमंद माना जाता है, इससे पौधों को पूरा पोषण मिलता है और कंद अच्छी तरह विकसित होते हैं. लता को बीच-बीच में पलटते रहना भी जरूरी होता है, ताकि जमीन में अतिरिक्त जड़ें न बनें और पोषण मुख्य कंद तक ही पहुंचे. फसल में कीट और रोग की निगरानी करते रहना भी जरूरी होता है, ताकि समय रहते जरूरी उपाय किए जा सकें. फसल तैयार होने में आमतौर पर तीन से चार महीने का समय लगता है, जिसके बाद खुदाई कर कंद निकाले जाते हैं. खुदाई के समय मिट्टी हल्की नम होनी चाहिए, इससे कंद टूटने की संभावना कम रहती है. इन सभी तैयारियों को ध्यान में रखकर खेती करने पर शकरकंद की पैदावार बेहतर और मुनाफेदार बनती है.
यह भी पढ़ें: धान की फसल बोई है? ‘तना छेदक’ और ‘पत्ती मोड़क’ का खतरा बढ़ा; अलर्ट
