मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बीच चुनाव आयोग अपने ही कमिश्नर्स के सवालों के घेरे में आ गया है. आयोग के तीन में से दो कमिश्नर्स ने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान कई बार आपत्तियां दर्ज कराई. इंडियन एक्सप्रेस अखबार के इस खुलासे के बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार पर एक्शन की मांग तेज कर दी है. आज कांग्रेस नेता राहुल गांधी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सकते हैं. वहीं कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस का ऐलान किया है. माना जा रहा है कि सीईसी के इस्तीफे की मांग के लिए आगे के कदम उठाए जा सकते हैं.
इस बीच पूर्व चुनाव आयुक्तों ने भी जांच की मांग उठाई है. जनवरी 2018 से दिसंबर 2018 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे ओपी रावत ने कहा कि यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है, ऐसा कभी नहीं होना चाहिए. चुनाव आयोग एक ऐसी संस्था रही है जिसकी पूरे विश्व में ख्याति रही कि यह हमेशा फ्री फेयर क्रेडिबल इलेक्शन डिलीवर करते रहे हैं. इसलिए इस विवाद का हल इलेक्शन कमिश्नर्स को और चीफ इलेक्शन कमिश्नर को बैठ के तुरंत करना चाहिए.
पश्चिम बंगाल में क्रिमिनल नेगलेक्ट- ओपी रावत
ओपी रावत ने कहा, ”एसआईआर को लेकर उन्होंने कहा कि प्रक्रिया में गलतियां शुरू में रही हैं और कोर्ट में भी आई. मैंने भी उसके बारे में कहा है और इलेक्शन कमीशन ने उनमें सुधार किए. धीरे धीरे उसको इम्प्रूव किया. लेकिन जो पश्चिम बंगाल के बारे में ट्रिब्यूनल ने फैसले दिए हैं कि 93% जिनको आपने डिलीट किया था वो वोटर थे और वोट देने से वंचित रह गए. यह एक क्रिमिनल नेगलेक्ट है. इलेक्शन कमीशन को इसके लिए तुरंत कुछ ना कुछ उपाय करनी चाहिए नहीं तो पूरी एसआईआर प्रक्रिया रोक देनी चाहिए.”
एसवाई कुरैशी ने क्या कहा?
जुलाई 2010 से जून 2012 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एसवाई कुरैशी ने न्यूज़ एजेंसी एएनआई से कहा कि दोनों चुनाव आयुक्त सख्ती से बहुत हर चीज को सवाल कर रहे थे, मुकालफत कर रहे थे और उनको विश्वास में भी नहीं लिया गया और मुझे तो यह भी पता लगा कि चार-चार महीने तक इलेक्शन कमिशन की मीटिंग भी नहीं होती थी.
उन्होंने कहा, ”मेजोरिटी डिसीजन अगर नहीं हुए तो सारे फैसले गैरकानूनी हैं. पूरे डेढ़ साल में जो जो फैसले लिए गए हैं उसकी पूरी लिस्ट बनाई जाए, पब्लिक की जाए कि उनमें से कितने सर्वसम्मति से फैसले लिए गए. सर्वसम्मति हैं तो ठीक डिसीजन है. यह चीज अब सुप्रीम कोर्ट के सामने चल ही रही है, सुप्रीम कोर्ट ही बुला के सारी लिस्ट ले ले और पूरी जनता जानना चाहती है.”
अशोक लवासा ने क्या कहा?
वहीं जनवरी 2018 से अगस्त 2020 तक चुनाव आयुक्त रहे अशोक लवासा ने सवाल उठाया है कि चुनाव आयोग अलग-अलग राय को सामान्य टिप्पणियां कैसे मान सकता है, जबकि उसके तीन में से दो सदस्यों की आपत्तियों के बावजूद फैसले लिए गए.
उन्होंने एनडीटीवी से बातचीत में कहा, “ऐसा लगता है कि विचारों में मतभेद जरूर है. ऐसे में चुनाव आयोग की जिम्मेदारी बनती है कि वह पूरी स्थिति स्पष्ट करे.”
बता दें कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघन को लेकर बीजेपी के नेताओं को दी गई ‘क्लीन चिट’ पर असहमति दर्ज कराई थी. हालांकि, तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा की अध्यक्षता वाले आयोग ने उनकी मांग को खारिज कर दी थी. बाद में लवासा ने चुनाव आयोग के पद से इस्तीफा दे दिया था.
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने बुधवार (24 सितंबर) को एसआईआर प्रक्रिया को लेकर उसके दो आयुक्तों की तरफ से उठाई गई आपत्तियों को लेकर कहा कि किसी भी संस्थान में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होती हैं. साथ ही आयोग ने कहा कि उसके सभी आदेशों को पूर्ण कानूनी मान्यता प्राप्त है और वे स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं के अनुरूप हैं. आयुक्तों द्वारा दिए गए सुझाव चुनाव प्रक्रियाओं को और बेहतर बनाने के लिए थे.
