गोवा के वन विभाग ने मांडवी और ज़ुआरी नदियों के किनारे फैले विशाल इलाके करीब 6.72 करोड़ वर्गमीटर, को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. गोवा में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सियासत का केंद्र तेजी से बदल रहा है. इस बार मुद्दा सिर्फ विकास नहीं, बल्कि जमीन के अधिकार और पर्यावरण के बीच टकराव है. इसे नदी तंत्र और जैव विविधता की सुरक्षा के लिए एक मजबूत पहल के तौर पर देखा जा रहा है.
राज्य के वन विभाग का यह कदम ऐसे समय आया है जब गोवा में जमीन अधिकारों और पर्यावरण पहले ही सबसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों में गिने जाते हैं. स्थानीय समुदाय, खासकर तटीय और नदी किनारे बसे लोग, लंबे समय से जमीन के उपयोग और सरकारी नियंत्रण को लेकर सवाल उठाते रहे हैं.
वन मंत्री विश्वजीत राणे ने शुरू की कार्रवाई
यह कार्रवाई वन मंत्री विश्वजीत राणे के निर्देश पर शुरू की गई है. अधिकारियों ने इसे एक सोची-समझी प्रक्रिया करार दिया है. उप वन संरक्षक (वन) कार्यालय की ओर से जारी पत्र में कहा गया, ‘विभाग ने राज्य की दो प्रमुख नदियों के किनारे पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील और पारिस्थितिक रूप से कमजोर क्षेत्रों की पहचान और सीमांकन का काम किया है. दोनों नदी तटों के साथ चिह्नित कुल क्षेत्रफल 6,729.54 हेक्टेयर (लगभग 6.72 करोड़ वर्गमीटर) है, जिसमें पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं.’
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वन विभाग ने नगर और ग्राम नियोजन विभाग से क्या कहा?
वन विभाग ने नगर और ग्राम नियोजन विभाग को साफ तौर पर कहा है कि मौजूदा कानून, विनियमों और नियमों के तहत आवश्यक कार्रवाई की जाए, ताकि इन क्षेत्रों को पारिस्थितिक क्षति से बचाया जा सके. यानी अब आने वाले समय में इन इलाकों में निर्माण पर सख्त नियम लागू हो सकते हैं. यही वह बिंदु है जहां से यह मुद्दा सीधे चुनावी बहस में प्रवेश करता है.
राज्य में पहले भी ऐसे फैसलों ने खड़े किए आंदोलन
गोवा में पहले भी पर्यावरण से जुड़े फैसलों ने बड़े राजनीतिक आंदोलन खड़े किए हैं, चाहे वह खनन का मुद्दा हो, कोस्टल रेगुलेशन जोन (CRZ) नियम हों या फिर जमीन के जोन बदलने के विवाद. ऐसे में मांडवी-ज़ुपआरी नदी तटों का यह नया वर्गीकरण लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है.
सरकार का दावा है कि यह फैसला पूरी तरह संरक्षण को ध्यान में रखकर लिया गया है. अधिकारियों के मुताबिक, ‘राणे के निर्देश पर उठाया गया यह कदम नदी तंत्र के दीर्घकालिक संरक्षण को सुनिश्चित करने और नदी किनारों पर अनियंत्रित विकास को रोकने के उद्देश्य से किया गया है.’
विशेषज्ञों के अनुसार, यह पहल ऐसे समय आई है जब गोवा में पर्यटन और रियल एस्टेट के बढ़ते दबाव के कारण नदी तटों पर निर्माण गतिविधियां तेजी से बढ़ रही थीं. इससे बाढ़, मिट्टी के कटाव और जल गुणवत्ता पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही थी. ऐसे में संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान एक समय रहते सही हस्तक्षेप माना जा रहा है.
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