अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के मेयर जोहरान ममदानी 30 अप्रैल 2026 को ब्रिटेन के किंग चार्ल्स से मुलाकात करने पहुंचे. इससे पहले उन्होंने कहा था कि अगर उनकी राजा से अलग से बात हुई, तो वह कोहिनूर को भारत को लौटाने के लिए जरूर कहेंगे. हालांकि, यह पता नहीं चल पाया कि उनकी मुलाकात में यह मुद्दा उठा या नहीं, लेकिन इस बयान ने एक बार फिर से इस नायाब हीरे के दर्दनाक इतिहास और उसकी वापसी की मांग को ताजा कर दिया है. एक्सप्लेनर में जानते हैं कि कितना बेशकीमती है यह हीरा और इसे खरीदने के लिए कितनी दौलत चाहिए…
मुर्गी के अंडे के बराबर था कोहिनूर
‘कोहिनूर द स्टोरी ऑफ द वर्ल्ड्स मोस्ट इनफेमस डायमंड’ किताब के मुताबिक, कोहिनूर का पहला तारुफ 1750 में फारसी इतिहासकार मोहम्मद मारवी के नादिरशाह के भारत आक्रमण के किस्से में मिलता है. मारवी ने अपनी आंखों से इस हीरे को देखा था और लिखा है कि उस समय यह तख्त-ए-ताऊस के ऊपरी हिस्से में जड़ा हुआ था. इसे नादिरशाह 1739 में दिल्ली से लूटकर ईरान ले गया था. मारवी के मुताबिक, कोहिनूर उस समय ‘मुर्गी के छोटे अंडे के बराबर’ था. यहीं से इस हीरे का नाम ‘कोहिनूर’ यानी ‘रोशनी का पहाड़’ पड़ा, जो नादिरशाह ने ही रखा था.
बाबरनामा के मुताबिक, 1526 में आगरा किले पर हमले के बाद हुमायूं को यह हीरा खजाने से मिला था और उसने इसे अपने पिता बाबर को भेंट किया था. लेकिन बाबर ने यह हीरा उसे वापस लौटा दिया. बाबरनामा में इस हीरे का वजन 36 माशा लिखा गया है और इसकी कीमत दुनिया के आधे दिन के खर्च के बराबर बताई गई है. कहा यह भी जाता है कि यह हीरा कभी दक्षिण भारत के किसी मंदिर में एक मूर्ति की आंख में जड़ा हुआ था, जहां से तुर्कों ने इसे निकाला होगा.
नूर बाई ने की थी कोहिनूर की मुखबिरी
बहरहाल, नादिरशाह के पास यह हीरा एक चतुराई भरी चाल के बाद पहुंचा. दरबार की एक नर्तकी नूर बाई ने नादिरशाह को मुखबरी की कि मुगल बादशाह मोहम्मद शाह रंगीला ने अपनी पगड़ी में कोहिनूर छिपा रखा है. इस पर नादिरशाह ने दोस्ती की खातिर पगड़ियां बदलने की रस्म का प्रस्ताव रखा और इस तरह कोहिनूर उसके हाथ लग गया. जब उसने पहली बार इस हीरे को देखा, तो देखता ही रह गया.
‘कोहिनूर द स्टोरी ऑफ द वर्ल्ड्स मोस्ट इनफेमस डायमंड’ किताब के मुताबिक, 1747 में नादिरशाह की हत्या के बाद, यह हीरा उसके अफगान अंगरक्षक अहमद शाह अब्दाली के पास पहुंचा और फिर कई हाथों से होता हुआ 1813 में महाराजा रणजीत सिंह के पास आ गया. महाराजा रणजीत सिंह इसे दीवाली, दशहरे और बड़े त्योहारों पर अपनी बांह में बांधकर निकलते थे और जब भी कोई ब्रिटिश अफसर दरबार में आता, तो इसे विशेष रूप से दिखाया जाता था.
1839 में रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद, कड़े सत्ता संघर्ष के बीच पांच साल के दलीप सिंह को 1843 में पंजाब का राजा बनाया गया. लेकिन दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध में अंग्रेजों की जीत के बाद 29 मार्च 1849 को लाहौर किले के शीश महल में एक नाटकीय समारोह हुआ. दस वर्षीय महाराजा दलीप सिंह को लाल कोट और हैट पहने अंग्रेजों के घेरे में लाया गया और उनसे एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवाए गए, जिसके तहत सिख साम्राज्य और कोहिनूर दोनों पर ईस्ट इंडिया कंपनी का अधिकार हो गया. उसी समय लाहौर किले से सिख खालसा का झंडा उतारकर कंपनी का झंडा फहरा दिया गया.
कोहिनूर ले जाने वाले जहाज पर फैल गया था हैजा
‘कोहिनूर द स्टोरी ऑफ द वर्ल्ड्स मोस्ट इनफेमस डायमंड’ किताब के मुताबिक, लॉर्ड डलहौजी खुद कोहिनूर लेने लाहौर आए और तोशेखाने से निकलवाकर इसे अपने हाथों में लिया. उस समय इसका वजन 190.3 कैरेट था. उन्होंने इसे ‘मेडिया’ नामक जहाज से महारानी विक्टोरिया के पास भेजने का फैसला किया. यह समुद्री यात्रा बेहद मुश्किलों भरी रही. जहाज के चालक दल को यह भी नहीं बताया गया कि वे क्या ले जा रहे हैं. रास्ते में जहाज पर हैजा फैल गया, मॉरीशस के लोगों ने तट पर आने पर तोपों से उड़ाने की धमकी दी और एक भयंकर समुद्री तूफान ने जहाज को लगभग दो हिस्सों में तोड़ दिया. आखिरकार जब वे इंग्लैंड पहुंचे, तब जाकर उन्हें पता चला कि वे अपने साथ कोहिनूर लेकर आ रहे थे.
लंदन में इस हीरे का आलीशान इस्तकबाल हुआ और इसे क्रिस्टल पैलेस में दिखाया गया. द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, लंदन में इससे पहले लोगों का इतना बड़ा जमावड़ा कभी नहीं देखा गया. बाद में, दलीप सिंह को भी लंदन लाया गया और उन्होंने बकिंघम पैलेस में एक भावुक लम्हे में खुद महारानी विक्टोरिया को यह हीरा भेंट किया. हालांकि, तब तक इसे काटकर इसकी शक्ल बदली जा चुकी थी. महारानी विक्टोरिया ने इसे अपनी मृत्यु तक लगातार पहना. फिर यह हीरा महारानी एलेक्जेंड्रा और फिर राजकुमारी मेरी (जार्ज पंचम की पत्नी) के ताज में जड़ा गया. अभी यह दुनिया का सबसे मशहूर हीरा लंदन के टावर ऑफ लंदन स्थित ज्वेल हाउस में रखा हुआ है और ब्रिटिश राजशाही के ताज का हिस्सा है.

कोहिनूर हीरे की कीमत इतनी ज्यादा क्यों आंकी जाती है?
कोहिनूर की कीमत को लेकर सदियों से किवदंतियां प्रचलित हैं और इसका सबसे प्रसिद्ध और चौंकाने वाला अनुमान ऐतिहासिक दस्तावेज ‘बाबरनामा’ से आता है. बाबरनामा के मुताबिक, कोहिनूर इतना कीमती थी कि इससे पूरी दुनिया को ढाई दिन तक पेट भर खाना खिलाया जा सकता था. इस हीरे की कीमत दुनिया के आधे दिन के खर्च के बराबर बताई गई थी. फ़ारसी इतिहासकार मोहम्मद मारवी ने भी अपने दस्तावेज में इस बात की पुष्टि की है कि उस समय की समझ के अनुसार, इसे बेचकर पूरी दुनिया के लोगों को ढाई दिन तक खाना खिलाया जा सकता था.
हालांकि, इसकी मौजूदा कीमत आंकना बेहद मुश्किल है, क्योंकि यह एक ‘अमूल्य’ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर है. इसे औपचारिक रूप से कभी भी बाजार में बिक्री के लिए नहीं रखा गया. इसकी कोई आधिकारिक कीमत नहीं है, लेकिन जेम्स एक्सपर्ट्स और इतिहासकार मानते हैं कि इसकी कीमत खरबों या अरबों डॉलर में हो सकती है, जो इसे दुनिया की सबसे महंगी चीज में से एक बनाती है.
क्या इस अरबों-खरबों की कीमत के बावजूद कोहिनूर बिक सकता है?
यह सवाल कोहिनूर के पूरे विवाद के केंद्र में है और इसका सीधा सा जवाब है- नहीं. कोहिनूर का पारंपरिक अर्थों में ‘बिकना’ नामुमकिन है. अगर यह किसी तरह बिक भी जाए, तो भी यह दुनिया की गरीबी को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता.
इसके न बिक पाने के पीछे 2 पुख्ता वजहें हैं.
- कानूनी और मालिकाना हक: भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान सभी ने समय-समय पर इस हीरे पर अपना ऐतिहासिक दावा ठोंका है और इसे अपनी राष्ट्रीय धरोहर बताया है. भारत सरकार ने कई बार इसकी वापसी की मांग की है, हालांकि भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि वह ब्रिटिश सरकार को इसे नीलाम न करने या लौटाने का आदेश नहीं दे सकता. ब्रिटिश सरकार और शाही परिवार का रुख भी साफ रहा है कि यह हीरा 1849 की लाहौर संधि के तहत कानूनी रूप से उनके पास आया था और इसे लौटाने का कोई सवाल ही नहीं उठता.
- कोहिनूर आम हीरा नहीं: यह एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रतीक है, जिसे ‘क्राउन ज्वेल’ का दर्जा हासिल है. यह ब्रिटिश राजशाही के ताज का अभिन्न हिस्सा है और शाही परिवार की महिलाओं के ताज में जड़ा जाता रहा है. इसे खुले बाजार में बेचना न सिर्फ एक कानूनी उल्लंघन होगा, बल्कि इससे ब्रिटिश राजशाही की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान पहुंचेगा और एक बड़ा विवाद खड़ा हो जाएगा.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि भले ही कोहिनूर की कीमत कई अरब डॉलर क्यों न हो, फिर भी वैश्विक गरीबी को पूरी तरह खत्म करने के लिए यह कीमत समुद्र में एक बूंद के बराबर है. वर्ल्ड बैंक और यूनाइटेड नेशंस (UN) के मुताबिक, दुनिया की गरीबी खत्म करने के लिए सालाना खरबों डॉलर की जरूरत है. एक अनुमान के मुताबिक, 2030 तक गरीबी खत्म करने के लिए हर साल लगभग 175 अरब डॉलर की जरूरत होगी.
इस लिहाज सेलअगर कोहिनूर की काल्पनिक कीमत 10-20 अरब डॉलर भी मान ली जाए, तो भी यह राशि कुछ महीनों या एक-दो साल की गरीबी मिटा सकती है. पूरी दुनिया की गरीबी को हमेशा के लिए खत्म नहीं कर सकती. यह सवाल इसलिए भी गलत है क्योंकि गरीबी सिर्फ पैसे के अभाव का नाम नहीं है, बल्कि यह असमानता, शिक्षा, स्वास्थ्य और अवसरों की कमी का नतीजा है. इसे एकमुश्त कीमत से हल नहीं किया जा सकता.
तो क्या भारत को कोहिनूर कभी वापस नहीं मिलेगा?
फिलहाल, दुनिया का यह सबसे मशहूर और विवादित हीरा लंदन में सुरक्षित रखा हुआ है. यह अब उसी रूप में नहीं है जैसा कभी था. इसे काटकर और तराशकर इसकी शक्ल पूरी तरह बदल दी गई और इसका वजन 190.3 कैरेट से घटकर में 105.6 कैरेट रह गया है. एक दिलचस्प अंधविश्वास यह भी प्रचलित है कि यह हीरा पुरुषों के लिए अभिशाप है और जो भी पुरुष इसे धारण करता है, वह बर्बाद हो जाता है, जबकि महिलाओं के लिए ऐसा कोई खतरा नहीं है. शायद इस वजह से इसे हमेशा रानियों और राजकुमारियों के ताज में ही जड़ा गया, कभी किसी राजा के ताज में नहीं.
शाही परिवार के सूत्रों का कहना है कि कोहिनूर लौटाने का कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि यह कानूनी संधि के तहत ब्रिटेन की संपत्ति है. अगर इसे वापस किया भी जाता है तो एक बड़ा कूटनीतिक संकट खड़ा हो जाता कि यह किस देश को लौटाया जाए- भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान या ईरान? क्योंकि इन सभी के पास इस पर दावा करने के ऐतिहासिक तर्क मौजूद हैं.
