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एपस्टीन फाइल्स में सुनहरे गुंबद की मस्जिद का खुलासा! काबा का पवित्र कपड़ा भी मंगवाया, सऊदी प्रिंस MBS से क्या चाहता था जेफरी?


अमेरिकी अरबपति और दोषी यौन अपराधी जेफ्री एपस्टीन की रहस्यमयी दुनिया से जुड़े फाइल्स में एक नया और बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. अमेरिकी न्याय विभाग के मुताबिक, एपस्टीन के प्राइवेट आइलैंड ‘लिटिल सेंट जेम्स’ पर एक रहस्यमयी मस्जिद का पता चला है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते थे. इस मस्जिद में न सिर्फ सोने का गुंबद लगा था, बल्कि इसे मक्का से मंगाए गए विशेष कपड़े और उज्बेकिस्तान से इम्पोर्टेड टाइल्स से सजाया गया था. किसी धर्म को नहीं मानने वाला एपस्टीन आलीशान मस्जिद बनवाकर क्या हासिल करना चाहता था? जानेंगे एक्सप्लेनर में…

सवाल 1: एपस्टीन फाइल्स में ‘मस्जिद’ को लेकर क्या चौंकाने वाला खुलासा हुआ है?

जवाब: अमेरिकी न्याय विभाग से जारी 30 लाख से ज्यादा पेज की फाइल्स और ईमेल ने जेफ्री एपस्टीन के प्राइवेट आइलैंड ‘लिटिल सेंट जेम्स’ पर बनी एक रहस्यमयी इमारत का राज खोल दिया. यह नीली-सफेद धारियों और सुनहरे गुंबद वाली इमारत, जिसे दुनिया म्यूजिक रूम या चैपल समझती थी, असल में एक ‘मस्जिद’ थी. यह बात खुद एपस्टीन और इस प्रोजेक्ट पर काम करने वाले रोमानियाई कलाकार आयन निकोला ने कही थी. इसकी साज-सज्जा के लिए एपस्टीन ने मक्का के काबा से पवित्र ‘किसवा’ के तीन टुकड़े मंगवाए थे.

किसवा वह काला रेशमी गिलाफ है जिस पर 700 किलोग्राम रेशम और 115 किलो सोने-चांदी के तारों से कुरान की आयतें कढ़ी जाती हैं. इसकी कीमत लगभग 50 लाख डॉलर होती है. उसे भेजे गए टुकड़ों में एक हरे रंग का कपड़ा था जो काबा के अंदर इस्तेमाल हुआ था, दूसरा काला बाहरी गिलाफ का हिस्सा था और तीसरा कढ़ाई वाला कपड़ा था. इसके अलावा, एपस्टीन ने 2011 में उज्बेकिस्तान की एक ऐतिहासिक मस्जिद से हाथ से बनी टाइल्स मंगवाते हुए लिखा था, ‘यह अंदरूनी दीवारों के लिए होगा, बिल्कुल एक मस्जिद की तरह.’

इमारत का सोने का गुंबद 15वीं सदी के सीरिया के यालबुगा हमाम की नकल पर डिजाइन किया गया था. सबसे चौंकाने वाला पहलू यह था कि एपस्टीन ने निकोला को ईमेल में लिखा, ‘अल्लाह की जगह, मैंने सोचा J’s और E’s (यानी जेफ्री एपस्टीन के नाम के पहले अक्षर) लिख दिए जाएं.’

 

एपस्टीन ने मस्जिद के गुंबद को सोने का बनवाया था

सवाल 2: एपस्टीन ने मक्का से किसवा और उज्बेकिस्तान से टाइल्स कैसे हासिल कीं?

जवाब: यह पूरा ऑपरेशन एपस्टीन के सऊदी शाही दरबार से जुड़े हाई-लेवल कॉन्टेक्ट्स के जरिए मुमकिन हुआ. इस नेटवर्क की बुनियाद नॉर्वे के राजनयिक टेरजे रोड-लार्सन ने 2010 के आसपास रखी, जिन्होंने एपस्टीन को क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के करीबी सलाहकार राफत अल-सब्बाग और शाही परिवार की सहयोगी अजीजा अल-अहमदी से मिलवाया.

अल-अहमदी ने ही काबा के किसवा के टुकड़े एपस्टीन तक पहुंचाने का इंतजाम किया. फरवरी 2017 में उनके असिस्टेंट ने एपस्टीन के स्टाफ को ईमेल कर बताया कि वे ‘मस्जिद के लिए’ ये टुकड़े भेज रहे हैं. 4 मार्च 2017 को यह खेप पहले फ्लोरिडा स्थित उसके घर पहुंची और फिर वहां से सेंट थॉमस बंदरगाह के रास्ते लिटिल सेंट जेम्स आइलैंड भेज दी गई. अमेरिकी कस्टम फॉर्म पर इसे ‘पेंटिंग्स, ड्रॉइंग्स और पेस्टल्स’ बताकर इसकी असलियत छिपाई गई.

अल-अहमदी ने खुद एपस्टीन को लिखा, ‘जो काला कपड़ा भेजा गया है, उसे कम से कम एक करोड़ मुसलमान सुन्नी, शिया और दूसरे फिरके छू चुके हैं. उन्होंने इस कपड़े पर अपनी दुआएं, ख्वाहिशें, आंसू और उम्मीदें रखी हैं.’ आज तक यह साफ नहीं हो पाया कि इस्लाम की ये सबसे पवित्र चीजें अल-अहमदी तक कैसे पहुंचीं और सऊदी सरकार ने इस मामले पर कोई जवाब नहीं दिया है.

सवाल 3: एपस्टीन आखिर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) से क्या चाहता था?

जवाब: एपस्टीन की महत्वाकांक्षा सिर्फ इस्लामी कलाकृतियां जमा करने तक सीमित नहीं थी. उसका असली मकसद क्राउन प्रिंस MBS का वित्तीय सलाहकार बनना था. 2016 में जब MBS सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी अरामको को शेयर बाजार में लाने की तैयारी कर रहे थे, तब एपस्टीन ने इसे सुनहरा मौका समझा. उसने रोड-लार्सन और अल-सब्बाग के जरिए क्राउन प्रिंस तक सीधी पहुंच बनाने की कोशिश की. अल-अहमदी ने एपस्टीन को निर्देश दिया कि सऊदी दूतावास में अधिकारियों से कहे कि उसे ‘खुद प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने बुलाया है.’

अक्टूबर 2017 में एपस्टीन ने खुद MBS को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उसने ‘पूरी तरह से शरिया-अनुपालक’ क्रिप्टोकरेंसी बनाने और अरबों डॉलर के शेयर चीन को बेचने जैसे प्रस्ताव रखे. उसने यह भरोसा दिलाया कि उसकी सेवाएं पूरी तरह मुफ्त रहेंगी. एपस्टीन अपने प्राइवेट जेट से पेरिस से रियाद गया और वहां MBS से मुलाकात की. बाद में उसने दावा किया कि क्राउन प्रिंस ने उसे एक भव्य उपहार दिया और अपने घर में उसने खुद की और MBS की साथ वाली तस्वीर लगाई. जब MBS ने उसकी सलाह को नजरअंदाज कर दिया, तो वह बेहद नाराज हुआ और उसने लिखा, ‘अगर मेरी सलाह मानी होती तो सऊदी को इतनी महंगी मदद की जरूरत नहीं पड़ती.’

सवाल 4: इस ‘मस्जिद’ के जरिए एपस्टीन की असली मंशा क्या थी?

जवाब: इस पूरी परियोजना के पीछे तीन बड़ी मंशाएं काम कर रही थीं:

  • प्रभाव और पहुंच का विस्तार: एपस्टीन एक सोशल क्लाइंबर था जो ताकतवर लोगों के साथ संबंध बनाने के लिए जाना जाता था. यह मस्जिद और इस्लामी कलाकृतियां सऊदी शाही परिवार और मिडिल ईस्ट के प्रभावशाली लोगों को प्रभावित करने का औजार थीं. 2014 की एक तस्वीर में एपस्टीन अपने न्यूयॉर्क घर में फर्श पर बिछे किसवा के टुकड़े को दुबई की बंदरगाह कंपनी डीपी वर्ल्ड के तत्कालीन प्रमुख अमीराती कारोबारी सुल्तान अहमद बिन सुलयेम को दिखा रहा है. बाद में इसी संबंध के कारण बिन सुलयेम को इस्तीफा देना पड़ा.
  • राजनीतिक शरण की तैयारी: एपस्टीन को अपने यौन अपराधों के कारण लगातार कानूनी खतरा बना रहता था. माना जाता है कि वह किसी मुस्लिम देश, खासकर सऊदी अरब में राजनीतिक शरण पाने की जमीन तैयार कर रहा था. वे खुद को इस्लाम का संरक्षक साबित करके कानूनी संकट की स्थिति में एक सुरक्षित पनाह की आशा कर रहा था.
  • वित्तीय साम्राज्य की स्थापना: वह अरबों डॉलर के अरामको IPO और सॉवरेन वेल्थ फंड तक पहुंच चाहता था.

सवाल 5: इस पूरे खेल का अंत कैसे हुआ और इसके क्या नतीजे रहे?

जवाब: एपस्टीन की भव्य योजना धीरे-धीरे बिखरती गई. 2017 में आए हरिकेन मारिया तूफान ने लिटिल सेंट जेम्स आइलैंड को काफी नुकसान पहुंचाया और ‘मस्जिद’ में रखी कई कीमती चीजें टूट गईं या खराब हो गईं. जब MBS ने उसकी सलाह को दरकिनार कर दिया, तो उसकी उम्मीदों को बड़ा झटका लगा. जुलाई 2019 में उसका 2008 का पुराना मामला फिर खुल गया और उसे संघीय यौन तस्करी के आरोपों में गिरफ्तार कर लिया गया.

10 अगस्त 2019 को मैनहट्टन की मेट्रोपॉलिटन करेक्शनल सेंटर की जेल में वह फांसी पर लटका मृत पाया गया, आधिकारिक रूप से इसे आत्महत्या बताया गया. अपनी मौत से ठीक दो दिन पहले, उसने अपने आइलैंड का मालिकाना हक एक ट्रस्ट को ट्रांसफर कर दिया था. एपस्टीन की मौत के बाद भी सवाल खत्म नहीं हुए.

ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रयू, पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप सहित तमाम शक्तिशाली लोगों की भूमिकाओं पर सवाल उठते रहे. मार्च-अप्रैल 2026 में इस ‘मस्जिद’ और इस्लामी कलाकृतियों का पूरा विवरण सार्वजनिक होने पर दुनिया भर के मुसलमानों में भारी गुस्सा देखा गया. आज यह सुनहरे गुंबद वाली इमारत एक ऐसे व्यक्ति की विकृत महत्वाकांक्षा, धार्मिक प्रतीकों के घोर अपमान और सत्ता की अंधी दौड़ का एक भयावह और खामोश स्मारक बनकर खड़ी है.



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