रामकृष्णन हर हफ्ते तिरुचि कलेक्ट्रेट में आयोजित होने वाली जनसुनवाई में पहुंचते हैं, जहां आम लोग अपनी नागरिक समस्याओं, कल्याणकारी योजना और पेंशन जैसी शिकायतों को लेकर अधिकारियों से गुहार लगाने आते हैं. वह 1995 से अब तक 5000 से ज्यादा अर्जियां लिखकर सरकारी दफ्तरों में जमा कर चुके हैं और अपनी पेंशन व बचत से रोजाना करीब 300 रुपये अर्जियों की फोटो कॉपी कराने में खर्च करते हैं.

1958 में मुसिरी के पास अय्यम्पलायम में जन्मे रामकृष्णन ने तिरुचि के थानथाई पेरियार कॉलेज से फिजिक्स में ग्रेजुएशन किया. इसके बाद उन्होंने एक ट्यूटोरियल कॉलेज में पढ़ाया. कुछ समय पत्रकारिता में बिताया और फिर 1995 में ऑल इंडिया रेडियो में बेतौर तकनीकी कर्मचारी शामिल हुए. जहां से वह 2023 में रिटायर्ड हुए. उनकी इस यात्रा की शुरुआत 1994 में हुई, जब तिरुचि कलेक्ट्रेट में उनकी मुलाकात सामाजिक कार्यकर्ता एनएल रमन से हुई.

रमन ने उन्हें और दूसरे लोगों को लिखित याचिकाओं के माध्यम से अपनी शिकायतें अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए प्रेरित किया. रामकृष्णन के शुरुआती प्रयासों में उय्याकोंडन नहर की सफाई का मुद्दा शामिल था. रेडियो में काम करने के दौरान मिले एक्सपीरियंस ने उनकी भाषा को बहुत शालीन और स्पष्ट बनाया, जिसका उपयोग वह तमिल और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में अर्जियां लिखने के लिए करते हैं.

रामकृष्णन की ओर से लिखी गई अर्जियों ने कई बड़े सार्वजनिक मुद्दों को हल करने में मदद की है. तिरुचि के ऐतिहासिक टाउन हॉल भवन के हिस्से को बचाने के लिए उन्होंने अर्जी दाखिल की और तत्कालीन जिलाधिकारी को इसके ऐतिहासिक महत्व के बारे में समझाया. इसके बाद इमारत के एक हिस्से को संग्रहालय में बदल दिया गया. वहीं 2004 में अधिकारियों की सलाह पर उन्होंने MGR नलपानी मंद्रम के बैनर तले पिटीशन याचिकाएं सौंपना शुरू किया ताकि अर्जियों को अधिकारी गंभीरता से लें.

रामकृष्णन तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन के बहुत बड़े प्रशंसक हैं. उन्होंने शादी नहीं की और अपना पूरा जीवन और समय समाज सेवा के लिए समर्पित किया. उनका मानना है कि समाज में कई लोग ऐसे हैं जो अपनी परेशानी तो जानते हैं, लेकिन उसे अधिकारियों को सही भाषा में समझा नहीं पाते. रामकृष्णन उनकी इस पहली कड़ी में मदद करते हैं.

कन्नन रामकृष्णन से जब यह पूछा गया कि सोशल मीडिया के दौर में भी हाथ से लिखी अर्जियां क्यों चुनते हैं, तो उनका कहना था कि मुझे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि मेरी हर अर्जी का तुरंत असर होता है या नहीं. मुझे अधिकारियों को सार्वजनिक मुद्दों पर लिखने में ही आनंद मिलता है. जब किसी अर्जी के कारण समाज में कोई पॉजिटिव बदलाव आता है, तो उसकी खुशी बयां नहीं की जाती जा सकती. उनका मानना है कि भले ही सोशल मीडिया से शिकायत तेजी से पहुंचती है, लेकिन एक साफ-सुथरी, विनम्र और सही तरीके से लिखी गई अर्जी को पढ़कर अधिकारी उस पर विचार करने को मजबूर होते हैं.
Published at : 30 Oct 2026 07:18 AM (IST)
Tags :
