- कॉकरोच परमाणु विस्फोट के केंद्र के पास जीवित नहीं रह सकते।
- उनकी धीमी कोशिका विभाजन रेडिएशन प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है।
- वे इंसानों से कई गुना अधिक रेडिएशन सहन कर पाते हैं।
- मजबूत शरीर, लंबे समय तक भोजन रहित जीवन भी उनकी मदद करता है।
CJP Jantar Mantar Protest: पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे थे, तभी पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. जंतर मंतर और कनॉट प्लेस जैसे इलाकों से 1000 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है.
इन घटनाओं के बीच आइए एक दिलचस्प वैज्ञानिक सवाल पर गौर करते हैं. आखिर कॉकरोच को न्यूक्लियर रेडिएशन में भी जीवित रहने में सक्षम क्यों माना जाता है? जानें क्या है इस सवाल का जवाब.
क्या कॉकरोच परमाणु विस्फोट में जीवित रह सकते हैं?
यह आम धारणा कि कॉकरोच परमाणु हमले में जीवित रह सकते हैं सिर्फ आंशिक रूप से सच है. कॉकरोच परमाणु विस्फोट के केंद्र के पास काफी ज्यादा गर्मी, शक्तिशाली शॉक वेव और विनाशकारी ताकत का सामना नहीं कर सकते. दूसरे जीवित जीवों की तरह अगर वह सीधे इन स्थिति के संपर्क में आते हैं तो तुरंत मारे जा सकते हैं.
हालांकि जमीन के नीचे, ड्रेनेज सिस्टम के अंदर या फिर विस्फोट वाले क्षेत्र से दूर संकरी दरारों में छिपे कॉकरोच के शुरुआती विनाश से बचने की संभावना काफी बेहतर हो सकती है. उनके बारे में इस तरह का दावा इंसानों की तुलना में उच्च स्तर के रेडिएशन को सहन करने की उनकी क्षमता की वजह से है, ना कि परमाणु हथियारों से पूरी तरह सुरक्षित होने की वजह से.
कॉकरोच रेडिएशन के प्रति काफी ज्यादा प्रतिरोधी क्यों होते हैं?
एक बड़ी वजह उनकी कोशिकाओं के विभाजन के तरीके में अंतर है. रेडिएशन डीएनए और दूसरी कोशिकीय संरचनाओं को नुकसान पहुंचा सकता है. खासकर तब जब कोशिकाएं तेजी से विभाजित हो रही हों. इंसानों के कुछ टिशू में ऐसी कोशिकाएं होती हैं जो बार-बार विभाजित होती हैं. जिससे वह रेडिएशन के संपर्क में आने पर खास तौर से संवेदनशील हो जाती हैं.
कॉकरोच में आमतौर पर कोशिका विभाजन की रफ्तार धीमी होती है और उनका ज्यादातर कोशिका विभाजन विकास और मोल्टिंग से जुड़ा होता है. इससे उनके जीवन चक्र के कुछ चरणों में कुछ कोशिकाओं की संवेदनशीलता कम हो सकती है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि रेडिएशन उनके डीएनए को नुकसान नहीं पहुंचा सकता या फिर हानिकारक जैविक प्रभाव पैदा नहीं कर सकता.

वे कितना रेडिएशन सहन कर सकते हैं?
अक्सर ऐसा कहा जाता है कि कॉकरोच इंसानों के लिए घातक रेडिएशन डोज की तुलना में कई गुना ज्यादा रेडिएशन डोज सहन कर सकते हैं. कुछ रिपोर्ट में लगभग 10000 रैड की डोज का जिक्र है. इसी के साथ इंसानों के लिए लगभग 1000 रैड की डोज संभावित रूप से घातक हो सकती है.
इन आंकड़ों को सावधानी से देखा जाना चाहिए क्योंकि रेडिएशन सहन करने की क्षमता प्रजाति, प्रयोगात्मक स्थिति और संपर्क के स्तर के आधार पर अलग-अलग होती है. रैड से रेडिएशन की अवशोषित डोज मापी जाती है जबकि इसके बायोलॉजिकल असर रेडिएशन के प्रकार और संपर्क के समय जैसी वजहों पर निर्भर करते हैं.
उनका सख्त शरीर उनकी सुरक्षा करता है?
कॉकरोच की शरीर पर एक मजबूत कवच होता है जिसे एक्सोस्केलेटन कहते हैं. यह उनके शरीर को शारीरिक नुकसान से बचाता है, शरीर से पानी की काफी ज्यादा कमी को रोकता है और उन्हें मुश्किल हालात में जिंदा रहने में मदद करता है. उनका चपटा शरीर उन्हें छोटी जगहों में घुसने में मदद करता है.
बिना खाने के जिंदा रहना
कॉकरोच की एक और खास बात यह है कि वह बिना भोजन के लंबे समय तक जिंदा रह सकता है. प्रजाति और पर्यावरणीय स्थिति के आधार पर वे हफ्तों तक भोजन की कमी को झेल सकते हैं.
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क्या कॉकरोच सबसे ज्यादा जीवित रहने वाला जीव है?
कॉकरोच अपनी अनुकूलन क्षमता, प्रजनन क्षमता और अलग-अलग वातावरण में रहने की क्षमता की वजह से लाखों सालों से जिंदा है. रेडिएशन को सहने की उनकी क्षमता एक और प्रभावशाली बायोलॉजिकल खासियत है लेकिन यह न्यूक्लियर हमले के बाद जिंदा रहने की गारंटी नहीं देती. काफी ज्यादा गर्मी, विस्फोट का दबाव, आग, रेडिएशन और पर्यावरणीय प्रदूषण उन्हें मार सकते हैं.
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