दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं की खतना प्रथा की तुलना पुरुषों में खतना से करने पर सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर वकील से कहा कि उन्हें अपने तथ्यों को सही करने की जरूरत है. कोर्ट ने महिलाओं के खतना पर चिंता जताई और कहा कि यह प्रथा संविधान के तहत स्वास्थ्य के दायरे में आ सकती है.
सुनवाई के दौरान एडवोकेट निजाम पाशा ने इसकी तुलना पुरुषों में खतना प्रथा से की और कहा कि इसका मकसद महिलाओं में यौन सुख को बढ़ाना है. इस पर कोर्ट ने उनसे कहा कि उन्हें अपने तथ्यों को सही करने की जरूरत है, क्योंकि जो वह कह रहे हैं वो बिल्कुल विपरीत बात है. केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह टिप्पणी की है. नौ जजों की संविधान बेंच दाऊदी बोहरा समुदाय सहित विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार कर रही है.
खतना प्रथा को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की तरफ से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा पेश हुए, जिन्होंने बताया कि सात साल की छोटी बच्चियों का खतना किया जाता है, जिसमें उनकी सार्थक सहमति संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि जहां कोई प्रथा शारीरिक स्वायत्तता में अतिक्रमण करती है और किसी महत्वपूर्ण अंग को विकृत करती है, वह अनिवार्य रूप से अनुच्छेद 25 और 26 के तहत सीमाओं, यानी सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता का उल्लंघन करती है.
एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट को बताया कि इस प्रथा का पालन न करने पर लोगों को समुदाय से बहिष्कृत किए जाने का खतरा होता है. पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि इस धार्मिक प्रथा की गहन जांच की आवश्यकता होगी, क्योंकि इसका पालन न करने पर न सिर्फ बहिष्कार झेलना पड़ सकता है, बल्कि यह व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक अखंडता और यौन स्वायत्तता पर भी प्रभाव डालता है. जस्टिस वराले ने कहा कि इस प्रथा का प्रभाव कई गुना है.
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जस्टिस बागची ने भी इस विचार का समर्थन करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य महिलाओं की कामुकता को नियंत्रित करना है. कुछ अपीलकर्ताओं की ओर से पेश एडवोकेट निजाम पाशा ने कहा कि महिलाओं के खतना की प्रथा का पालन न करने पर किसी प्रकार का बहिष्कार नहीं होता है. इस प्रथा को विकृति के रूप में पेश किए जाने का विरोध करते हुए निजाम पाशा ने कहा कि समुदाय के भीतर इस प्रथा का पालन न करने के कोई दंडनीय परिणाम नहीं होते हैं, हालांकि सदस्यों का मानना हो सकता है कि इसके आध्यात्मिक परिणाम हो सकते हैं.
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जस्टिस बागची ने विशेष रूप से यह प्रश्न पूछा कि क्या बोहरा समुदाय के धार्मिक प्रमुख दाई के निर्देश का उल्लंघन करने पर कोई परिणाम भुगतना पड़ता है. निजाम पाशा ने कहा कि इसके कोई दंडनीय परिणाम नहीं हैं और अगर कोई नमाज नहीं अदा करता है, तो कोई दंड नहीं दिया जाता है. उन्होंने इसकी तुलना इस्लाम में पुरुषों के खतना की प्रथा से की.
जस्टिस बागची ने कहा, ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से पुरुषों के खतना और महिलाओं के खतना में अंतर है.’ पीठ में शामिल जस्टिस बीवी नागरत्ना ने निजाम पाशा से पूछा कि इस प्रथा का उद्देश्य क्या था. इस पर उन्होंने उत्तर दिया, ‘महिलाओं के यौन सुख को बढ़ाना.’ पीठ में शामिल दूसरे जज जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘यह तो बिल्कुल विपरीत बात है.’
उन्होंने पाशा के इस प्रथा की पुरुषों के खतना से तुलना करने पर भी आपत्ति जताई. जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, ‘मुझे आश्चर्य है कि इसकी तुलना पुरुषों के खतना से की जा रही है, यह एक अलग अवधारणा है. अपने तथ्यों को सही करें.’ याचिकाओं पर अगली सुनवाई 12 मई को होगी.
