मिर्जापुर की सीरीज पर फिल्म तो बन गई, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है आखिर इसमें नया क्या है? वही किरदार, वही दुनिया और वही भौकाल, जिसे दर्शक पहले ही सीरीज में देख चुके हैं. ऐसे में क्या फिल्म उन लोगों को भी समझ आएगी, जिन्होंने सीरीज नहीं देखी?
और जो फैंस सीरीज के हर किरदार से वाकिफ हैं, उनके लिए इस फिल्म में नया क्या है?
तो इन सारे सवालों का जवाब है- कहानी… मेकर्स ने सीरीज की कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसी दुनिया और उन्हीं किरदारों के साथ एक बिल्कुल नई कहानी पेश की है. यानी किरदार पुराने जरूर हैं, लेकिन कहानी पूरी तरह नई है.
कहानी
मिर्जापुर की गद्दी पर सबकी नजर है, जिस पर पहले से कालीन भैया का राज है. बहराइच, जौनपुर से लेकर जैसलमेर तक, हर कोई मिर्जापुर पर कब्जा करना चाहता है, क्योंकि इस गद्दी पर जिसका राज होगा, वही यूपी पर राज करेगा.
लेकिन सवाल है कि आखिर मिर्जापुर की गद्दी हासिल करने के लिए कालीन भैया को कौन और कैसे रास्ते से हटाएगा? इसी कहानी में एंट्री होती है रवि किशन की, जो बब्बन यादव के किरदार में नजर आ रहे हैं.
बब्बन खुद दूसरों को अपना प्यादा बनाकर इस पूरी बाजी को अपने इशारे पर चलाना चाहता है. लेकिन उसका प्लान क्या है और वह कालीन भैया को कैसे मात देगा? क्या अपने चाल में कामयाब हो पाएगा? यही फिल्म की कहानी है.
डायरेक्शन और राइटिंग
फिल्म को गुरमीत सिंह ने डायरेक्ट किया है और वह इस नई कहानी को पर्दे पर दिखाने में कामयाब रहे हैं. वहीं, पुनीत कृष्ण की राइटिंग फिल्म की बड़ी ताकत है. पुराने किरदारों और नई कहानी के बीच उन्होंने अच्छा संतुलन बनाया है.
उन्होंने ये साबित कर दिया है कि किसी हिट सीरीज की दुनिया और किरदारों को बरकरार रखते हुए भी एक बिल्कुल नई कहानी कही जा सकती है. फिल्म में वही पुराने किरदार हैं, जिन्हें दर्शक सीरीज से जानते हैं, लेकिन कहानी सीरीज से बिल्कुल अलग है.
मुन्ना भैया से लेकर गुड्डू भैया और बीना तक, कई पुराने किरदारों की बैकस्टोरी और उनके नए पहलू भी देखने को मिलते हैं. इन्हीं किरदारों के रिश्ते, उनके बीच की खींचतान और मिर्जापुर की गद्दी के लिए चल रही जंग कहानी को दिलचस्प बनाती है.
हालांकि फिल्म की लंबाई थोड़ी खटकती है. फिल्म करीब 3 घंटे 17 मिनट लंबी है और इसे थोड़ा छोटा किया जा सकता था. फर्स्ट हाफ का काफी हिस्सा किरदारों को बिल्ड करने में चला जाता है और सेकंड हाफ भी कई जगह लंबा महसूस होता है. खासकर जिन्होंने सीरीज देखी है, उन्हें कुछ जगहों पर लगेगा कि फिल्म को थोड़ा और टाइट किया जा सकता था.
- एक्टिंग
मिर्जापुर का मतलब अगर कोई एक नाम है, तो वो हैं कलीन भैया यानी पंकज त्रिपाठी. फिल्म में भी उनका जलवा बरकरार है. सब एक तरफ और कलीन भैया एक तरफ. - वहीं, बबलू पंडित के किरदार में जितेंद्र कुमार की एंट्री भी खूब जमती है. उन्होंने किरदार को इतनी अच्छी तरह पकड़ा है कि कुछ जगहों पर विक्रांत मैसी की याद तक नहीं आती.
- बीना का किरदार पहले से ही बहुत अहम था, लेकिन फिल्म में उनकी बैकस्टोरी लगभग क्लाइमेक्स जैसा असर छोड़ती है. रसिका दुग्गल शानदार हैं.
- मुन्ना भैया के किरदार में दिव्येंदु और गुड्डू भैया के किरदार में अली फज़ल, दोनों अपने-अपने किरदार में फिर से जान डाल देते हैं.
- सच कहूं तो कास्ट इतनी दमदार है कि इन किरदारों को इनसे बेहतर कोई और कर पाएगा, ऐसा सोचना भी मुश्किल है. सोनल चौहान की एंट्री भी नई है और उनका ट्रैक कहानी में एक नया एंगल जोड़ता है.
रवि किशन की नई एंट्री
फिल्म में रवि किशन की नई एंट्री जबरदस्त है. उनका अंदाज बिल्कुल अलग है. महिलाओं की इज्जत करने वाला उनका किरदार बब्बन यादव काफी दिलचस्प है. उनका एक डायलॉग है-“जुबान ही मेरा कॉन्ट्रैक्ट है.” रवि किशन का पूरा ट्रैक फिल्म में एक नया रंग भरता है और उनका किरदार कहानी में अच्छी तरह फिट बैठता है.
डायलॉग्स
फिल्म के डायलॉग्स भी दमदार हैं. “तुम वफादारी के लिए लड़ रहे हो और हम प्यार के लिए… जीत थोड़ी पाओगे.” ऐसे कई डायलॉग्स हैं जो थिएटर में सीटियां बजवाने का पूरा दम रखते हैं.
क्यों देखें-
मिर्जापुर द मूवी भौकाल मचाने आई है… और भौकाल मचा देगी. वॉयलेंस है, दमदार किरदार हैं, बढ़िया कहानी है और सबसे बड़ी बात-मास ऑडियंस को पसंद आने वाला पूरा मसाला है. अगर आपको मिर्जापुर की दुनिया पसंद है, तो ये फिल्म आपको निराश नहीं करेगी. फिल्म थिएटर में देखने लायक है.
रेटिंग- 3.5/5
