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हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा सख्त रुख, कहा- आउटसोर्स भर्तियां युवाओं के अधिकारों का हनन.


हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के विभिन्न विभागों, बोर्डों और निगमों में बड़े पैमाने पर हो रही आउटसोर्स भर्तियों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने साफ कहा कि नियमित पदों को स्थायी भर्ती प्रक्रिया से भरने के बजाय बैक डोर एंट्री के जरिए नियुक्तियां की जा रही हैं, जो प्रदेश के युवाओं के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन और उनका शोषण है.

मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए स्वास्थ्य सचिव और प्रधान सचिव (वित्त) को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं. मामले की अगली सुनवाई 16 जून को निर्धारित की गई है.

वित्त विभाग के सचिव द्वारा हलफनामा दायर किया गया 

सुनवाई के दौरान वित्त विभाग के विशेष सचिव सौरभ जस्सल की ओर से हलफनामा दायर किया गया, इसमें कहा गया कि आउटसोर्स कर्मचारियों का आंकड़ा काफी बड़ा है और यह केंद्रीकृत रूप से उपलब्ध नहीं है, इसलिए जानकारी जुटाने में समय लग रहा है.

हालांकि अदालत ने इस दलील पर नाराजगी जाहिर करते हुए संकेत दिए कि सरकार नियमित भर्तियों के बजाय आउटसोर्स व्यवस्था पर अधिक निर्भर होती जा रही है.कोर्ट ने टिप्पणी की कि इससे पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया प्रभावित हो रही है और योग्य युवाओं को अवसर नहीं मिल पा रहे.

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हिमाचल प्रदेश में बेरोजगारी का असली चेहरा सामने आया 

हिमाचल प्रदेश के सरकारी विभागों, बोर्डों और निगमों में लगभग 40,000 आउटसोर्स कर्मचारी कार्यरत हैं. जिनको 10 से 25 हजार तक वेतन दिया जाता है. इनमें से शिक्षा, जल शक्ति, लोक निर्माण और बिजली बोर्ड  जैसे विभागों में कर्मचारियों की संख्या सबसे अधिक है.

यही नहीं हिमाचल प्रदेश में रोजगार कार्यालयों  में लगभग 7 लाख युवा बेरोजगार के रूप में पंजीकृत हैं आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के अनुसार, राज्य में युवा बेरोजगारी दर 29% से अधिक हो गई है. 

इसके अलावा, हर साल लगभग 60 हजार  नए युवा इस बेरोजगारी सूची में जुड़ रहे हैं.कुछ बेरोजगार ऐसे भी हैं जो रोजगार कार्यालयों में नाम दर्ज ही नहीं करवाते हैं, क्योंकि पिछले कुछ सालों से रोजगार कार्यालयों से रोजगार न मिलने से युवा उम्मीद छोड़ चुके हैं. ऐसे में हिमाचल में बेरोजगारी का आंकड़ा दस लाख के करीब है.

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