सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा है कि अदालतों के दयालु रवैये के चलते हत्या के दोषी बार-बार राहत पा रहे हैं. यह एक गंभीर समस्या है. इससे कहीं न कहीं अपराध को बढ़ावा मिल रहा है. हरियाणा में पूर्व विधायक रेलू राम पुनिया समेत आठ लोगों की हत्या के दोषियों की रिहाई पर सुनवाई के दौरान जज ने यह टिप्पणी की.
जस्टिस दत्ता ने कहा कि माफ करने की भी कोई सीमा होनी चाहिए. अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए जज ने एक पुराने मामले का उदाहरण दिया. उस मामले में एक व्यक्ति ने अपनी बड़ी बेटी का रेप कर उसकी हत्या की थी. उम्रकैद की सजा के दौरान वह पैरोल पर बाहर आया और मामले में गवाही देने वाली अपनी पत्नी की हत्या कर दी. यह वारदात उसने अपनी छोटी बेटी के सामने की. सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे गंभीर मामले में भी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया.
मामले की सुनवाई के दौरान क्या बोले जस्टिस दत्ता?
जस्टिस शील नागू के साथ बेंच में बैठे जस्टिस दत्ता ने यह भी कहा कि पहले फांसी की सजा तय करते समय ‘रेयर ऑफ रेयरेस्ट’ यानी ‘दुर्लभ में भी दुर्लभतम’ की कसौटी पर अपराध को परखा जाता था, लेकिन अब समय बदल गया है. जस्टिस दत्ता की इस टिप्पणी को सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से जोड़ कर भी देखा जा रहा है, जिसमें 13 लोगों की मौत की सजा को यह कहते हुए उम्रकैद में बदल दिया गया था कि राष्ट्रपति ने उनकी दया याचिका की निपटारे में देरी की.
किस मामले की हो रही थी सुनवाई?
2001 में हरियाणा के पूर्व विधायक रेलू राम पूनिया और उनके परिवार के 7 अन्य सदस्यों की हत्या हुई थी. इस मामले में उनकी बेटी सोनिया और उसके पति संजीव को दोषी पाया गया. 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका के निपटारे में राष्ट्रपति की तरफ से की गई देरी के आधार पर उनकी फांसी को उम्र कैद में बदल दिया था.
सोनिया और संजीव ने लंबा समय जेल में बिता लेने के आधार पर रिहाई की मांग की थी, पिछले साल दिसंबर में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने दोनों को अंतरिम जमानत दी और हरियाणा सरकार से उनके आवेदन पर विचार करने को कहा था. इस आदेश के खिलाफ पीड़ित परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसके बाद हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लग गई. अब सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली है और फैसला सुरक्षित रख लिया है.
पीड़ित परिवार की दलील
पीड़ित परिवार की ओर से वकील आइना वर्मा और लाल बहादुर खोवाल ने दोषियों की रिहाई का जोरदार विरोध किया. उन्होंने कहा कि 2001 में एक ही रात में परिवार के 8 लोगों की हत्या की गई, इनमें तीन बच्चे भी शामिल थे. एक बच्ची की उम्र तो महज डेढ़ महीने थी. सिर्फ लंबी जेल अवधि या हाल का अच्छा आचरण रिहाई का आधार नहीं हो सकता है. सजा माफी का फैसला लेते समय अपराध की गंभीरता, दोषी का इतिहास और समाज पर असर का मूल्यांकन जरूरी है.
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