28 फरवरी के अमेरिकी हमले के बाद से ही बंद पड़ा होर्मुज खुल तो गया है, लेकिन पूरी तरह से नहीं. होर्मुज अब भी बंद है लेकिन वो भी पूरी तरह से नहीं. यानी कि होर्मुज खुला भी है और बंद भी. लेकिन असल सवाल अब सबसे बड़ा है कि ये होर्मुज खुला है तो किसके लिए और बंद है तो किसके लिए.
अगर होर्मुज खुला है तो किसने खोला है और होर्मुज बंद है तो किसने बंद किया है. और इससे भी बड़ा सवाल कि भारत के लिए होर्मुज की स्थिति क्या है. क्या भारत के लिए होर्मुज खुला है या फिर अब भी वो भारत के लिए बंद ही है और भारत में एलपीजी को लेकर जो किल्लत चल रही है, वो और भी बढ़ने वाली है. अमेरिका-ईरान की बातचीत फेल होने के बाद आखिर क्या है होर्मुज पर ईरान और अमेरिका के अलग-अलग दावों की हकीकत?
ईरान के साथ अमेरिका की बातचीत फेल
दरअसल जैसे ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ईरान के साथ अमेरिका की बातचीत फेल हो चुकी है और अमेरिकी डेलिगेशन बिना किसी निष्कर्ष के ही अमेरिका वापस लौट रहा है, ट्रंप नाराज हो गए. और इसी नाराजगी में उन्होंने ऐलान कर दिया कि अब अमेरिका की नेवी होर्मुज में दाखिल होगी और होर्मुज की नाकेबंदी करेगी. ट्रंप ने कहा था कि अमेरिकी नेवी ये तय करेगी कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से कोई भी जहाज नहीं निकल पाएगा. तब शिपिंग कंपनियों का प्लान था कि वो होर्मुज से गुजरने के लिए ईरान को टोल देंगे और बदले में ईरान उन जहाजों को होर्मुज से गुजरने देगा.
सेंट्रल कमांड ने ही खारिज कर दिया ट्रंप का दावा
लेकिन ट्रंप के इस बयान को अमेरिका के केंद्रीय कमान यानी कि सेंटकॉम ने ही खारिज कर दिया है और कहा है कि अमेरिकी नेवी होर्मुज में सिर्फ उन जहाजों को ही रोकेगी जो होर्मुज के जरिए या तो ईरान के किसी पोर्ट से तेल लेकर आ रहा है या फिर कोई जहाज ईरान के किसी पोर्ट पर होर्मुज के जरिए जा रहा है. मतलब साफ है कि ट्रंप कर रहे हैं कि होर्मुज पूरी तरह से बंद होगा जबकि उनकी सेना कह रही है कि होर्मुज सिर्फ ईरानी जहाजों के लिए ही बंद होगा. हालांकि वो बात चाहे ट्रंप की हो या फिर उनकी नेवी की, मकसद सिर्फ एक है कि ईरान तेल बेचकर पैसे न कमा पाए.
होर्मुज खोलने पर क्या कहा ईरान ने?
वहीं ईरान का कहना है कि होर्मुज बंद तो होगा, लेकिन सिर्फ इजरायल और अमेरिका के लिए. बाकी के जो भी देश और उनके जहाज होर्मुज के जरिए गुजरना चाहते हैं, वो ईरान को टोल दें और फिर ईरान उन्हें होर्मुज में ही बनाए गए सुरक्षित रास्ते से गुजरने देगा. ईरानी की एलिट फोर्स आईआरजीसी ने पहले ट्रंप और फिर अमेरिकी सेंटकॉम की धमकी पर कहा है कि अगर कोई भी नेवी शिप होर्मुज में दाखिल होता है तो उसे सीज फायर का उल्लंघन माना जाएगा और फिर ईरानी सेना उसका माकूल जवाब देगी.
फिर से जंग शुरू होनी की आशंका!
ऐसे में आशंका इस बात की है कि एक बार फिर से ये जंग शुरू होगी. और इस बार जो जंग होगी उसका दायरा होर्मुज तक रहेगा, जिसमें एक तरफ अमेरिकी नेवी होगी और दूसरी तरफ ईरान की नेवी. ट्रंप को इस घेराबंदी के लिए यकीन है कि और भी देशों की नेवी अमेरिका का साथ देगी, लेकिन पहले ब्रिटेन और फिर दूसरे देशों ने भी ट्रंप के प्लान को खारिज कर दिया है और कहा है कि उनकी नेवी होर्मुज खुलवाने नहीं जाएगी. ऐसे में ट्रंप फिर से उसी दोराहे पर आकर खड़े हो गए हैं, जहां से होर्मुज का बंद होना शुरू हुआ था.
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और अब ट्रंप को ये जंग अकेले लड़नी पड़ेगी, जिसके लिए अमेरिकी नेवी शायद ही तैयार हो. क्योंकि अगर अमेरिकी नेवी की अकेले की तैयारी होती तो शायद अब तक होर्मुज की घेराबंदी हो चुकी होती. लेकिन अमेरिकी नेवी की कमजोरी को देखते हुए ही ट्रंप ने पहले कहा था कि उनके देश का होर्मुज से कोई लेना-देना नहीं है और जिसको तेल खरीदना है वो या तो होर्मुज खुलवाए या फिर अमेरिका से तेल खरीदे.
क्या भारत के लिए बढ़ने वाली हैं मुश्किलें?
लेकिन वो ट्रंप ही क्या, जो अपनी बात पर टिके रहें. तो ट्रंप फिर से पलट गए हैं और अपनी जिद में होर्मुज पर कब्जा करना चाहते हैं, जो कतई आसान नहीं है. रही बात हिंदुस्तान की, तो पहले तो ईरान की भलमनसाहत और भारत की कूटनीति के जरिए कुछ जहाज होर्मुज से एलपीजी लेकर भारत आ भी गए. लेकिन अब जब अमेरिकी नेवी और ईरान की नेवी आमने-सामने होगी तो शायद ही कोई शिपिंग कंपनी अपने जहाज को होर्मुज के जरिए भेजे, क्योंकि अब खतरा सिर्फ ईरान से ही नहीं बल्कि अमेरिका से भी है.
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इस हिसाब से भारत फिर वहीं पहुंच गया है, जहां उसके सामने एलपीजी की किल्लत है और अगर जंग लंबी चली तो ये किल्लत गैस से होते हुए तेल तक भी पहुंच जाएगी. और अगर तेल की किल्लत हुई तो महंगाई जहां पहुंचेगी, उसे रोकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी हो जाएगा.
