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Gen-Z के गुस्से से बेचैन क्यों हैं राजनीतिक दल?



युवाओं की बेचैनी को केवल सोशल मीडिया अभियान से शांत नहीं किया जा सकता. परीक्षा की विश्वसनीयता, रोजगार की गुणवत्ता और संस्थागत जवाबदेही पर ठोस सुधार नहीं हुए तो इसका असर विद्यार्थियों के भविष्य से लेकर 2029 के चुनावी समीकरण तक दिखाई देगा.

भारत के कोचिंग सेंटरों, विश्वविद्यालयों और भर्ती केंद्रों में सुलगती बेचैनी को केवल ‘पेपर लीक’ की तात्कालिक प्रतिक्रिया मानना एक बड़ी भूल होगी. प्रश्नपत्र लीक होने की घटना ने तो महज एक चिंगारी का काम किया है, इसके नीचे बेरोजगारी, शिक्षा के व्यवसायीकरण और टूटते भरोसे का बारूद सालों से जमा हो रहा था.

यह संकट हर उस परिवार से जुड़ा है, जिसका बच्चा किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है. यह उन अभिभावकों का भी प्रश्न है, जो कॉलेज की फीस पर अपनी बचत खर्च कर रहे हैं. डिग्री के बाद नौकरी खोज रहे युवाओं पर इसका सीधा असर है. बिना सामाजिक सुरक्षा के काम कर रहे गीग वर्कर भी इससे अलग नहीं हैं.

पेपर लीक के बाद शुरू हुआ विरोध जल्द ही देशव्यापी आंदोलन में बदल गया. छात्र सड़कों पर उतरे. सोशल मीडिया ने अलग-अलग राज्यों के युवाओं को जोड़ा. विपक्ष ने संसद में सरकार को घेरा. आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा.

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा व्यवस्था में बदलाव के लिए नंदन नीलेकणि के नेतृत्व में टास्क फोर्स बनाने की घोषणा की. सरकार ने नई व्यवस्था को सुरक्षित और पारदर्शी बनाने का भरोसा भी दिया.

लेकिन मंत्री का इस्तीफा समाधान नहीं है. टास्क फोर्स की घोषणा भी केवल पहला कदम है. असली सवाल यह है कि व्यवस्था कब बदलेगी. जिम्मेदारी किसकी तय होगी. छात्र को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा.

पेपर लीक नहीं, भरोसे का संकट

भारत में प्रतियोगी परीक्षा केवल योग्यता जांचने का माध्यम नहीं है. गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह सामाजिक प्रगति का रास्ता है. परिवार अपनी बचत लगाता है. छात्र कई वर्ष तैयारी करता है. बदले में वह केवल निष्पक्ष अवसर चाहता है.

इसे राज्य और नागरिक के बीच सामाजिक अनुबंध कहा जाता है. इसका अर्थ है कि छात्र नियम माने और व्यवस्था उसकी मेहनत के साथ न्याय करे. पेपर लीक होने पर यही अनुबंध टूटता है. इसीलिए पेपर लीक प्रश्नपत्र से पहले व्यवस्था की विश्वसनीयता लीक करता है.

छात्र दोबारा परीक्षा दे सकता है. बीता हुआ समय वापस नहीं मिलता. परिवार को यात्रा, आवास और कोचिंग पर फिर पैसा खर्च करना पड़ता है. कई अभ्यर्थी आयु सीमा के करीब पहुंच जाते हैं. कुछ पर नौकरी खोजने और घर संभालने का दबाव बढ़ जाता है.

हर स्थगित परीक्षा के साथ किसी युवा का जीवन भी कुछ समय के लिए स्थगित हो जाता है. इसलिए केवल मुफ्त पुनर्परीक्षा पर्याप्त नहीं है. छात्रों को उचित मुआवजा भी मिलना चाहिए. जांच की समयसीमा तय होनी चाहिए. जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका सार्वजनिक की जानी चाहिए.

कानून अपराधी को दंड दे सकता है. वह अपने आप सुरक्षित परीक्षा नहीं करा सकता. इसके लिए पूरी प्रक्रिया का स्वतंत्र ऑडिट चाहिए. ऑडिट का अर्थ है व्यवस्था की निष्पक्ष और विस्तृत जांच.

प्रश्नपत्र किसने तैयार किया. डेटा तक किसकी पहुंच थी. सुरक्षा की जांच किसने की. गड़बड़ी की सूचना मिलने के बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई. इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए.

टास्क फोर्स की सफलता बैठकों की संख्या से नहीं मापी जा सकती. उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए. सिफारिशों पर कार्रवाई की तारीख भी बतानी चाहिए. तकनीक तभी भरोसा बढ़ाएगी, जब उस पर सार्वजनिक निगरानी होगी.

भर्ती के लिए वार्षिक कैलेंडर भी जरूरी है. इसमें विज्ञापन, परीक्षा, परिणाम और नियुक्ति की संभावित तारीखें हों. तारीख बदलने पर संबंधित विभाग लिखित कारण बताए. इससे अभ्यर्थी अपने करियर की योजना बना सकेगा.

इस सुधार का लाभ केवल आंदोलन कर रहे छात्रों को नहीं मिलेगा. NEET, SSC, रेलवे, बैंकिंग, UPSC और राज्य भर्ती की तैयारी करने वाला हर अभ्यर्थी इससे प्रभावित होगा.

डिग्री बढ़ी, पर सम्मानजनक रोजगार कहां है?

परीक्षा को लेकर पैदा हुआ गुस्सा रोजगार की चिंता से जुड़ा है. छात्र वर्षों तक सरकारी नौकरी की तैयारी इसलिए भी करता है, क्योंकि उसके सामने दूसरे सुरक्षित विकल्प कम हैं. निजी क्षेत्र में कम वेतन और अस्थिरता इस आकर्षण को बढ़ाती है.

भारत की समस्या केवल बेरोजगारी नहीं है. खराब रोजगार भी उतनी ही बड़ी चुनौती है. बहुत से शिक्षित युवा काम कर रहे हैं, लेकिन उनका वेतन योग्यता के अनुसार नहीं है.

इसे अल्प-रोजगार कहा जाता है. इसका अर्थ है कि व्यक्ति के पास काम तो है, लेकिन उसकी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो रहा. इंजीनियर असंबंधित क्षेत्र में काम कर सकता है. स्नातकोत्तर युवा ऐसा काम कर सकता है, जिसके लिए उसकी डिग्री की जरूरत ही नहीं थी.

ILO और Institute for Human Development की India Employment Report 2024 के अनुसार 2022 में भारत के कुल बेरोजगारों में युवाओं की हिस्सेदारी लगभग 82.9 प्रतिशत थी. यह युवा बेरोजगारी दर नहीं है. इसका अर्थ है कि देश के सभी बेरोजगारों में युवाओं का हिस्सा बहुत बड़ा था.

यह अंतर समझना जरूरी है. गलत व्याख्या आंकड़े को सनसनीखेज बनाती है. सही व्याख्या संकट का स्वरूप समझाती है. भारत के रोजगार संकट का सबसे भारी बोझ युवा उठा रहे हैं.

भारत की बड़ी युवा आबादी को जनसांख्यिकीय लाभांश कहा जाता है. इसका अर्थ है कि काम करने वाली आबादी अधिक हो तो अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ सकती है. लेकिन यह लाभ अपने आप नहीं मिलता. इसके लिए अच्छी शिक्षा, कौशल और पर्याप्त रोजगार चाहिए.

नौकरी न मिलने पर यही लाभ जनसांख्यिकीय निराशा में बदल सकता है. तब युवा आबादी आर्थिक शक्ति बनने के बजाय सामाजिक असंतोष का स्रोत बन जाती है.

इसलिए सरकारों को केवल नौकरियों की संख्या नहीं बतानी चाहिए. उन्हें क्षेत्र, योग्यता, वेतन और समयसीमा भी बतानी होगी. नौकरी मिलना पर्याप्त नहीं है. उसका सम्मानजनक और सुरक्षित होना भी जरूरी है.

AI और ऑटोमेशन ने इस चिंता को बढ़ाया है. AI हर नौकरी समाप्त नहीं करेगा. वह काम करने का तरीका जरूर बदलेगा. इसे तकनीकी विस्थापन कहते हैं. यानी मशीन पूरे पेशे के बजाय उसके कुछ कार्य अपने हाथ में लेती है.

नई तकनीक कुछ काम कम करेगी. वह नए अवसर भी बनाएगी. इसलिए बड़ा खतरा केवल AI नहीं है. बड़ा खतरा वह कौशल है, जो समय के साथ उपयोगी नहीं रहता.

कौशल विकास की सफलता प्रशिक्षण पाने वालों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए. यह देखना चाहिए कि प्रशिक्षण के बाद कितने युवाओं को काम मिला. उनका वेतन कितना बढ़ा. कितने लोग छह महीने बाद भी उसी रोजगार में बने रहे.

महंगी शिक्षा, गीग वर्क और मानसिक दबाव

रोजगार संकट का दूसरा सिरा कॉलेजों तक जाता है. उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ना अच्छी बात है. लेकिन कॉलेज में प्रवेश अपने आप अच्छी शिक्षा या नौकरी की गारंटी नहीं देता.

कई निजी कॉलेज अपने सबसे बड़े प्लेसमेंट पैकेज का प्रचार करते हैं. इससे पूरे बैच की वास्तविक स्थिति सामने नहीं आती. एक छात्र को बड़ा पैकेज मिल सकता है. उसी बैच के अधिकतर छात्र कम वेतन पर या बिना नौकरी के रह सकते हैं.

हर कॉलेज को सत्यापित रोजगार रिपोर्ट जारी करनी चाहिए. इसमें कुल छात्रों की संख्या हो. वास्तविक प्लेसमेंट प्रतिशत बताया जाए. औसत वेतन और सामान्य वेतन की जानकारी मिले. इससे अभिभावक विज्ञापन के बजाय आंकड़ों के आधार पर कॉलेज चुन सकेंगे.

शिक्षा का बढ़ता खर्च भी राजनीतिक प्रश्न है. कमजोर सार्वजनिक संस्थान छात्रों को महंगे निजी कॉलेजों की ओर धकेलते हैं. वहां फीस अधिक हो सकती है, लेकिन परिणाम की कोई गारंटी नहीं होती. इससे परिवार पर कर्ज और युवा पर मानसिक दबाव बढ़ता है.

युवा रोजगार का एक बड़ा हिस्सा गीग इकॉनमी में भी है. गीग इकॉनमी का अर्थ है ऐप या छोटे अनुबंध के जरिए किया जाने वाला अस्थायी काम. डिलीवरी पार्टनर, कैब चालक और फ्रीलांसर इसके प्रमुख उदाहरण हैं.

ये युवा बेरोजगार नहीं हैं. फिर भी उनका भविष्य सुरक्षित नहीं है. बीमार होने पर आमदनी रुक सकती है. दुर्घटना होने पर परिवार संकट में आ सकता है. ऐप से अकाउंट बंद हुआ तो काम तुरंत छिन सकता है.

इन्हें नियमित कर्मचारी जैसी पेंशन, स्वास्थ्य बीमा या भुगतान वाली छुट्टी भी नहीं मिलती. इसलिए गीग वर्कर्स के लिए पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा जरूरी है. इसका अर्थ है कि श्रमिक प्लेटफॉर्म बदले, लेकिन बीमा और पेंशन उसके साथ बने रहें.

इसका खर्च केवल श्रमिक पर नहीं डाला जा सकता. सरकार, डिजिटल प्लेटफॉर्म और कर्मचारी को मिलकर योगदान देना होगा. ऐसी व्यवस्था करोड़ों युवाओं की आर्थिक सुरक्षा बदल सकती है.

रोजगार और परीक्षा की अनिश्चितता मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है. लगातार देरी चिंता बढ़ाती है. बार-बार रद्द भर्ती आत्मविश्वास तोड़ती है. परिवार का कर्ज दबाव को और गंभीर बनाता है.

इसे संस्थागत तनाव कहा जा सकता है. इसका अर्थ है कि व्यक्ति की परेशानी केवल निजी कमजोरी से पैदा नहीं होती. व्यवस्था की अनिश्चितता भी उसका कारण बनती है.

इसलिए काउंसलिंग जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं. परीक्षा समय पर कराना भी मानसिक स्वास्थ्य नीति का हिस्सा है. पारदर्शी भर्ती और कम आर्थिक अनिश्चितता कई युवाओं को गहरे तनाव से बचा सकती है.

जलवायु परिवर्तन का सवाल भी जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा है. जेन-जी प्रदूषण, भीषण गर्मी और जल संकट को दूर की समस्या नहीं मानती. परीक्षा केंद्रों की खराब व्यवस्था, प्रदूषित शहर और असुरक्षित सार्वजनिक परिवहन उसके रोजमर्रा के अनुभव हैं.

इसलिए हरित रोजगार, स्वच्छ हवा, पानी और सुरक्षित शहर भी युवा राजनीति का हिस्सा बनेंगे. रोजगार और पर्यावरण को अलग-अलग मुद्दे मानने वाली राजनीति नई पीढ़ी की चिंता पूरी तरह नहीं समझ पाएगी.

जेन-जी के पास अपना मीडिया भी है

पिछली पीढ़ियों को अपनी बात बड़े स्तर पर पहुंचाने के लिए अखबार, टीवी चैनल या राजनीतिक संगठन की जरूरत पड़ती थी. जेन-जी की यह निर्भरता काफी कम हो गई है. उसके हाथ का स्मार्टफोन ही कैमरा, स्टूडियो और प्रसारण केंद्र बन चुका है.

इंस्टाग्राम रील, यूट्यूब शॉर्ट्स, पॉडकास्ट और स्वतंत्र डिजिटल चैनल उसके नए मीडिया हैं. व्हाट्सएप, टेलीग्राम और डिस्कॉर्ड उसके संगठन के साधन हैं. एक छात्र परीक्षा केंद्र का वीडियो बनाकर कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है.

इसे न्यू मीडिया कहा जाता है. इसका अर्थ है ऐसी डिजिटल व्यवस्था, जिसमें यूजर केवल समाचार देखता नहीं है. वह उसे बनाता, जांचता और आगे भी पहुंचाता है. यहां दर्शक और पत्रकार के बीच की पुरानी सीमा कमजोर हो जाती है.

जेन-जी के पास केवल अपनी आवाज नहीं है. उसके पास अपना कैमरा, अपना मंच और अपनी ऑडियंस भी है. यही कारण है कि उसे अपनी समस्या उठाने के लिए हमेशा किसी बड़े एंकर या राजनीतिक प्रवक्ता की जरूरत नहीं पड़ती.

वह अपना अनुभव रिकॉर्ड करती है. दस्तावेज दिखाती है. हैशटैग चलाती है. दूसरे छात्रों को जोड़ती है. स्थानीय शिकायत इसी रास्ते से राष्ट्रीय मुद्दा बन सकती है.

जेन-जी के आंदोलन अक्सर किसी एक नेता पर निर्भर नहीं होते. इन्हें नेटवर्क आधारित आंदोलन कहा जाता है. लोग सोशल मीडिया और मैसेजिंग ग्रुप के जरिए जुड़ते हैं.

हालिया आंदोलन में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी CJP इसी तरह उभरी. इसके प्रमुख अभिजीत दीपके ने फिलहाल चुनाव लड़ने के बजाय सामाजिक आंदोलन जारी रखने की बात कही.

यह मॉडल तेजी से लोगों को जोड़ता है. लेकिन इसकी सीमा भी है. सरकार बातचीत किससे करे. समझौता स्वीकार करने का अधिकार किसके पास हो. आंदोलन के बाद संगठन और एजेंडा कैसे बचे. इन सवालों का आसान उत्तर नहीं मिलता.

किसी एक नेता का न होना आंदोलन की शक्ति है. बाद में वही उसकी कमजोरी बन सकता है.

परंपरागत मीडिया में संपादक तय करता है कि कौन-सी खबर प्रमुख होगी. न्यू मीडिया में यह भूमिका कई बार एल्गोरिदम निभाता है. एल्गोरिदम वह तकनीकी व्यवस्था है, जो यूजर की पसंद के आधार पर सामग्री आगे बढ़ाती है.

इससे छोटी आवाज तेजी से बड़ी हो सकती है. लेकिन सबसे सच्ची बात के बजाय सबसे भावुक वीडियो भी वायरल हो सकता है. वीडियो गड़बड़ी का प्रमाण बन सकता है. वही वीडियो अधूरा काटकर भ्रम भी फैला सकता है.

Reuters Institute की Digital News Report 2026 के भारतीय सर्वे में 58 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने ऑनलाइन गलत सूचना पर चिंता जताई. केवल 39 प्रतिशत ने कहा कि वे ज्यादातर समाचारों पर अधिकतर समय भरोसा करते हैं.

इसलिए डिजिटल पहुंच अपने आप राजनीतिक समझदारी नहीं बनाती. जेन-जी को मीडिया साक्षरता भी चाहिए. इसका अर्थ है किसी सूचना का स्रोत, संदर्भ और प्रमाण जांचने की क्षमता.

युवाओं के इस मिज़ाज को राजनीतिक दल भी अब गहराई से समझ रहे हैं. हालिया प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की डिजिटल रणनीति में बड़ा बदलाव दिखा. इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर अब ज़्यादा स्वाभाविक और सीधे दिल को छूने वाले वीडियो सामने आ रहे हैं, जहां युवाओं की भाषा, ट्रेंड्स और पॉपुलर कल्चर के ज़रिए उनसे जुड़ने की कोशिश की जा रही है.

लेकिन बेहतर संवाद और बेहतर शासन एक बात नहीं हैं. रील युवाओं तक पहुंच सकती है. वह पेपर लीक नहीं रोक सकती. पुरानी राजनीति मीडिया के जरिए युवाओं से बोलती थी. अब युवा उसी मीडिया से राजनीति को जवाब दे रहा है.

डिजिटल चुनावी प्रचार में पारदर्शिता भी जरूरी है. किस इन्फ्लुएंसर को भुगतान हुआ. कौन-सा वीडियो AI से बनाया गया. किस समूह को कौन-सा विज्ञापन दिखाया गया. मतदाता को इन सवालों का जवाब मिलना चाहिए.

पहचान, प्रतिनिधित्व और 2029 की परीक्षा

सोशल मीडिया ने जाति और धर्म की राजनीति समाप्त नहीं की है. कई बार उसने पहचान को और मजबूत किया है. एक जैसी विचारधारा वाली सामग्री बार-बार दिखने पर दूसरी राय के लिए जगह कम हो जाती है. इसे डिजिटल ध्रुवीकरण कहा जाता है.

इसलिए जेन-जी को जाति और धर्म से पूरी तरह मुक्त पीढ़ी मानना गलत होगा. युवा अपनी सामाजिक पहचान भी रखता है. साथ ही रोजगार और सम्मान की मांग भी करता है.

वह अपने समुदाय का प्रतिनिधित्व चाहता है. वह निष्पक्ष परीक्षा भी चाहता है. वह सांस्कृतिक मुद्दे से प्रभावित हो सकता है. फिर भी बेरोजगारी पर सरकार से नाराज रह सकता है.

युवा पहचान नहीं छोड़ रहा. वह पहचान से आगे अपना भविष्य भी देख रहा है. आने वाली राजनीति में अस्मिता और आकांक्षा साथ चलेंगी. सफल दल वही होगा, जो दोनों को परिणाम से जोड़ सकेगा.

चुनाव आयोग के अनुसार 2024 के लोकसभा चुनाव में 18 से 29 वर्ष के मतदाता कुल मतदाताओं का 22.78 प्रतिशत थे. यह हिस्सा किसी भी बड़े चुनाव पर प्रभाव डाल सकता है.

लेकिन जेन-जी कोई एक जैसा वोट बैंक नहीं है. महानगर का टेक कर्मचारी और बिहार का भर्ती अभ्यर्थी अलग परिस्थितियों में रहते हैं. गांव की युवती और गीग वर्कर की प्राथमिकताएं भी अलग हो सकती हैं.

भाजपा के पास मजबूत संगठन है. प्रधानमंत्री मोदी की युवाओं में व्यक्तिगत अपील भी रही है. राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाएं, स्टार्टअप और डिजिटल इंडिया ने उसकी युवा राजनीति को आकार दिया है.

मौजूदा असंतोष इस मॉडल की परीक्षा ले रहा है. अब आकांक्षा को ठोस परिणाम से जोड़ना होगा. परीक्षा और रोजगार पर भरोसा नहीं लौटा तो संचार की बढ़त कमजोर पड़ सकती है.

कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को इससे अवसर मिला है. लेकिन सरकार से नाराज युवा अपने आप विपक्ष के साथ नहीं जाएगा. वह कांग्रेस शासित राज्यों की भर्ती का भी हिसाब मांगेगा.

समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, आम आदमी पार्टी, जन सुराज और दूसरे क्षेत्रीय दलों से भी यही सवाल पूछे जाएंगे. उनके राज्यों में कितने पद खाली हैं. परीक्षाएं समय पर होती हैं या नहीं. कॉलेजों की स्थिति कैसी है.

युवा असंतोष किसी एक दल के खिलाफ स्थायी नहीं रहता. वह सत्ता में बैठे हर दल से जवाब मांगता है. जो दल बेहतर शासन का मॉडल दिखाएगा, वही अधिक विश्वसनीय बनेगा.

प्रतिनिधित्व पर भी सवाल उठेंगे. दल युवा चेहरे के नाम पर अक्सर राजनीतिक परिवारों के सदस्यों को टिकट देते हैं. केवल कम उम्र का उम्मीदवार युवा प्रतिनिधि नहीं बन जाता.

वास्तविक प्रतिनिधित्व तब होगा, जब छात्र संगठनों, स्थानीय निकायों और सामान्य परिवारों से आए युवाओं को अवसर मिलेगा. उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया भी पारदर्शी बनानी होगी.

2029 का लोकसभा चुनाव अभी दूर है. यह कहना जल्दबाजी होगी कि जेन-जी किसी सरकार को बना या गिरा देगी. सोशल मीडिया का समर्थन हमेशा वोट में नहीं बदलता.

फिर भी हालिया आंदोलन ने एक बदलाव स्पष्ट कर दिया है. युवा अब केवल राजनीतिक संदेश सुनने वाला वर्ग नहीं है. वह अपना नैरेटिव बना सकता है. सरकार पर दबाव डाल सकता है. वह दलों की भाषा और रणनीति भी बदल सकता है.

सरकार को अब ठोस परिणाम देने होंगे. परीक्षा सुरक्षित हो. भर्ती समय पर पूरी हो. गड़बड़ी पर मुआवजा मिले. कॉलेज प्लेसमेंट का सच बताएं. गीग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा मिले.

विपक्ष को भी केवल आलोचना से आगे बढ़ना होगा. उसे अपने राज्यों में बेहतर व्यवस्था दिखानी होगी. घोषणापत्र में नौकरी की संख्या के साथ समयसीमा भी देनी होगी.

यह महज सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे कुछ छात्रों की खबर नहीं है, यह हर उस मध्यमवर्गीय परिवार की अंतःकथा है, जो अपने बच्चे की उच्च शिक्षा के लिए अपनी जीवनभर की पूंजी दांव पर लगा देता है. यह पूरी व्यवस्था उस दौर से गुजर रही है जहां एक परीक्षा का नतीजा सीधे रसोई के बजट, फीस, और भविष्य की उम्मीदों को हिला कर रख देता है.

जेन-जी राजनीति को खत्म करने नहीं आई है, वह तो बस दशकों से चले आ रहे खोखले वादों का हिसाब मांगने उतरी है. यदि राजनीतिक दल इसे केवल सोशल मीडिया के ‘व्यूज’ और ‘लाइक’ तक सीमित समझते रहे, तो वे युवाओं की भीड़ तो गिन लेंगे, लेकिन उनके भीतर सुलगती बेचैनी को कभी नहीं पढ़ पाएंगे. लोकतंत्र में जब लोगों का यह दर्द लंबे समय तक अनसुना रहता है, तो वह व्यवस्था के भीतर अपना रास्ता खुद तलाश लेता है.



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