Headlines

Xप्लेन: महिला वोट बैंक पर सरकारें मेहरबान क्यों? BJP का ‘वादा निभाने’ का गणित


इन दिनों देशभर में महिलाओं के लिए सरकारी योजनाओं की बाढ़ आ गई है. उत्तर प्रदेश में बुजुर्ग महिलाओं के लिए फ्री बस की सुविधा शुरू हो गई है, बिहार सरकार ने रक्षाबंधन के मौके पर बेटियों के लिए बड़े ऐलान किए हैं और दिल्ली में महिलाओं को लक्ष्मी योजना के तहत पैसे मिलना शुरू हो रहे हैं. एक तरफ बीजेपी वादा निभाने का है संदेश दे रही है, तो दूसरी तरफ महिलाएं वफादार वोटर्स साबित हो रही हैं. आखिर इसके पीछे बड़ा खेल क्या है…

BJP का वादा, BJP की निभाने की सियासत

देखिए, भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह चुनाव से पहले जो वादा करती है, उसे पूरा करने की कोशिश जरूर करती है. चाहे वह राम मंदिर का मुद्दा हो या फिर महिलाओं से जुड़ी योजनाएं. अब फिर 3 बड़े वादे पूरे हो रहे हैं:

1. उत्तर प्रदेश: बुजुर्ग महिलाओं को मुफ्त बस सफर

योगी आदित्यनाथ सरकार ने ‘लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति यात्रा’ योजना के तहत 60 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं को रोडवेज बसों में मुफ्त सफर देने का ऐलान किया है. इस योजना के लिए सरकार ने 100 करोड़ रुपए का बजट प्रावधान किया है. रक्षा बंधन के मौके पर सरकार ने सभी उम्र की महिलाओं को भी मुफ्त सफर देने का एलान किया है. इसमें एक साथ चलने वाले शख्स को भी यह सुविधा मिलेगी. यह स्कीम BJP के ‘लोक कल्याण संकल्प पत्र’ का हिस्सा थी, जिसे अब पूरा किया जा रहा है.

2. बिहार: रक्षा बंधन पर बड़ा तोहफा

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 27 और 28 अगस्त को महिलाओं के लिए राज्य परिवहन निगम की बसों में मुफ्त सफर का एलान किया है. इसके अलावा, ‘बिहार की बेटी स्टार्टअप चैलेंज योजना’ के तहत महिलाओं को 50,000 से लेकर 2 लाख रुपए तक की वित्तीय सहायता दी जाएगी. ‘मुख्यमंत्री बालिका पीएचडी फेलोशिप’ के तहत 1000 छात्राओं को 4 साल तक हर महीने 10,000 रुपए की सहायता दी जाएगी. महिला सुरक्षा के लिए 4700 ‘पुलिस दीदी’ को स्कूटी और मोटरसाइकिल भी दी जाएंगी.

3. दिल्ली: महिलाओं के खाते में आएंगे पैसे

‘मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना’ (अब महिला समृद्धि योजना) के तहत पात्र महिलाओं को हर महीने 2500 रुपए की वित्तीय सहायता दी जाएगी. सरकार ने होली और दिवाली के मौके पर 2500-2500 रुपए की दो किस्तें देने का भी एलान किया है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मौजूदगी में CM रेखा गुप्ता ने ‘सशक्त नारी समृद्ध दिल्ली’ कार्यक्रम में ‘लखपति बिटिया योजना’ के तहत बेटियों को 21 साल की उम्र में 1 लाख रुपए से ज्यादा देने की भी घोषणा की.

कैसे BJP ‘वादा निभाने’ का संदेश दे रही?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई के मुताबिक, BJP के लिए ‘वादा निभाना’ सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित राजनीतिक रणनीति है. इसका केंद्र बिंदु ‘महिला सशक्तिकरण’ है. पार्टी ने धीरे-धीरे अपनी छवि ‘महिला-केंद्रित विकास’ से बढ़कर ‘महिला-नेतृत्व वाले विकास’ की बनाई है:

1. ‘मोदी की गारंटी’ का क्रेडिट बढ़ाने का फॉर्मूला

BJP की हर महिला-केंद्रित योजना ‘मोदी की गारंटी’ के ब्रांड के तहत पेश की जाती है. चाहे दिल्ली में 2500 रुपए महीना देने का वादा हो या पश्चिम बंगाल में 3000 रुपए महीना का ऐलान. हर स्कीम को ‘गारंटी’ के रूप में पेश किया जाता है, जिसे सरकार बनने पर पूरा किया जाना है. यह पार्टी को ‘वादा करो और निभाओ’ वाली विश्वसनीय छवि देता है.

2. महिला सशक्तिकरण की चार दीवार

BJP अपनी महिला नीतियों को सिर्फ कागजी वादों तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें ‘पॉलिसी-ड्रिवन, आउटकम-ओरिएंटेड’ (नीति-आधारित, परिणाम-केंद्रित) योजनाओं के रूप में पेश करती है. पार्टी के आंकड़ों के मुताबिक, सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं ने महिलाओं की जिंदगी बदली है:

  • उज्ज्वला योजना: 10.33 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को मुफ्त LPG कनेक्शन देकर धुएं से मुक्ति दिलाई गई.
  • मुद्रा योजना: कुल लोन का 69% (23.2 लाख करोड़ रुपए) महिला उद्यमियों को दिया गया, जिससे वे अपना कारोबार शुरू कर सकीं.
  • लखपति दीदी: 1 करोड़ ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाया गया, अब 3 करोड़ का टारगेट है.

ये योजनाएं पार्टी के ‘महिला सशक्तिकरण’ के एजेंडे को मजबूती देती हैं और उसे ‘वादे के मुकाबले उपलब्धि’ के रूप में पेश करती हैं.

3. राजनीतिक होड़ का हथियार

महिला योजनाओं का इस्तेमाल सीधे विपक्षी पार्टियों को टक्कर देने के लिए भी होता है. दिल्ली में BJP ने AAP की 2100 रुपए योजना के मुकाबले 2500 रुपए देने का वादा किया. पश्चिम बंगाल में TMC की 1500 रुपए योजना के मुकाबले 3000 रुपए का ऐलान किया. यह सीधा ‘ज्यादा देने वाला’ बनने का खेल है, जो ‘हम आपके लिए ज्यादा करेंगे’ का संदेश देता है.

4. ‘वादा निभाने’ की छवि का चुनावी फायदा

BJP के इस ‘गारंटी’ मॉडल का सबसे बड़ा टारगेट महिला वोटर्स हैं. अब एक मजबूत और वफादार वोट बैंक बनती जा रही हैं. जब कोई पार्टी अपने चुनावी वादे पूरे करती है, तो उस पर भरोसा बढ़ता है. BJP इसी फॉर्मूले पर काम कर रही है. महिलाओं को लुभाने वाली योजनाओं का ऐलान करना, सरकार बनने पर उन्हें लागू करना और फिर अगले चुनाव में महिलाओं से वोट की उम्मीद करना.

महिलाएं कैसे बन जातीं वफादार वोटर्स?

महिला केंद्रित स्कीम्स और वोटिंग पैटर्न का गहरा कनेक्शन है. पोस्ट-पोल डेटा बताता है कि स्कीम का फायदा उठाने वाली महिलाएं सत्तारूढ़ पार्टी को ज्यादा वोट देती हैं:

  • पश्चिम बंगाल: लक्ष्मीर भंडार स्कीम की लाभार्थी महिलाओं में से 60% ने TMC को वोट दिया, जबकि गैर-लाभार्थियों में 75% ने BJP को वोट दिया.
  • महाराष्ट्र: मुख्यमंत्री लाडकी बहिन योजना के लिए आवेदन करने वाली 54% महिलाओं ने महायुति को वोट दिया.
  • केरल: WCD स्कीम्स की लाभार्थी महिलाओं में 68% ने LDF को वोट दिया, जबकि गैर-लाभार्थियों में UDF को ज्यादा समर्थन मिला.

भारत के चुनाव आयोग के मुताबिक, 2014 के लोकसभा चुनाव में देश की कुल महिला मतदाताओं में से 65.63% ने वोट किया. 2009 में यह आंकड़ा 55.82% था. इसके उलट पुरुषों का वोटिंग परसेंट 2014 में 67.09% रहा, जो 2009 में 60.24% था.

सबसे अहम बात यह है कि महिला मतदान में जो उछाल आया, वह पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा रहा. 2009 में महिला और पुरुष मतदान का गैप 4.5% था, जो 2014 में घटकर सिर्फ 1.5% रह गया. 2014 में 16 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रहा, जबकि 2009 में यह आंकड़ा सिर्फ 6 था.

महिलाओं की वोटिंग क्यों बढ़ी?

चुनाव आयोग ने 2009 के चुनावों के बाद सिस्टेमैटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्टोरल पार्टिसिपेशन (SVEEP) प्रोग्राम के तहत महिला मतदान में लैंगिक अंतर को दूर करने पर फोकस किया.

  • महिला बूथ: पश्चिम बंगाल में 2014 में शुरू हुआ ‘ऑल वुमन मैनेज्ड पोलिंग स्टेशन’ का आइडिया अब कई राज्यों में कॉपी किया जा रहा है. बिहार में 2015 में गया में ‘पिंक बूथ’ बनाए गए, जहां सारे स्टाफ, सुरक्षाकर्मी और एजेंट्स महिलाएं थीं.
  • जागरूकता अभियान: गुजरात के साबरकांठा में ‘महिला मतदाता रैलियां’ निकाली गईं. यहां 80,000 महिलाओं ने 826 रैलियों में हिस्सा लिया.
  • घर-घर संपर्क: जम्मू-कश्मीर के रियासी में ‘मदर इंडिया’ कैंपेन चलाया गया, जिसमें 942 वॉलंटियर्स ने घर-घर जाकर महिलाओं को वोटिंग के लिए प्रेरित किया.

तो क्या मान लें कि महिलाएं स्कीम्स के बदले वोट भी देती हैं?

इलेक्शन एनालिस्ट हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं कि महिलाओं का वोटिंग बिहेवियर वास्तव में स्कीम्स से प्रभावित होता है, लेकिन यह रिश्ता गहरा और जटिल है:

  • बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कुल मतदान 66.9% रहा. इसमें महिला मतदान 71.6% था, जबकि पुरुषों का मतदान सिर्फ 62.8% रहा. जिन 130 सीटों पर महिला मतदान पुरुषों से ज्यादा रहा, वहां NDA ने 114 सीटें जीतीं, यानी करीब 88% सीटें. यह कोई इत्तेफाक नहीं था.
  • चुनाव से ठीक पहले सरकार ने 1.2 करोड़ से ज्यादा महिलाओं के खाते में 10,000 रुपए ट्रांसफर किए थे. एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि इस स्कीम ने सत्तारूढ़ गठबंधन को करीब 20% सीटों का अतिरिक्त फायदा दिलाया होगा.
  • एक्सपर्ट्स इसे ‘फ्रीबीज पॉप्युलिज्म’ या ‘कल्याणकारी पॉप्युलिज्म’ कहते हैं. इसका मतलब है कि स्कीम्स अब सिर्फ विकास की नीति नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद का साधन बन गई हैं.

महिलाओं के लिए ये स्कीम्स अलग मायने रखती हैं:

  • आर्थिक मजबूरी: ideasforindia.in सर्वे के मुताबिक, 10% से भी कम महिलाएं कहती हैं कि वे ‘विचारधारा’ के आधार पर वोट देती हैं. पुरुषों की तुलना में महिलाएं पैसों से ज्यादा प्रभावित होती हैं. इसकी वजह यह है कि महिलाओं के पास पुरुषों की तुलना में रोजगार कम है. महिलाओं की ‘सर्वाइवल इंस्टिंक्ट’ ज्यादा मजबूत होती है.
  • सशक्तिकरण का अहसास: ideasforindia.in सर्वे के मुताबिक, स्कीम्स से महिलाओं को ‘सशक्तिकरण’ का अहसास होता है. वे इसे अपने बिना वेतन वाले घरेलू काम की ‘भरपाई’ के रूप में देखती हैं. यह भावना उन्हें ‘पूर्वव्यापी वोटिंग’ की ओर ले जाती है. यानी वे मूल्यांकन करती हैं कि सरकार ने उन्हें क्या दिया और उसी के आधार पर फैसला करती हैं.
  • ‘अपनेपन’ का एहसास: जब पैसा सीधे महिलाओं के बैंक खाते में आता है, तो बैंक नोटिफिकेशन और SMS खुद एक पॉलिटिकल कम्युनिकेशन का काम करते हैं. इससे उन्हें ‘सरकार ने मुझे देखा’ वाला अहसास होता है, जो एक मजबूत इमोशनल कनेक्शन बनाता है.

क्या यह ‘बदले’ में वोट देना है?

रशीद किदवई कहते हैं कि इसे पूरी तरह ‘रिश्वत’ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि:

  • सशक्तिकरण के सबूत: पश्चिम बंगाल की ‘लक्ष्मीर भंडार’ योजना पर एक रिपोर्ट में पाया गया कि 60% से ज्यादा महिलाओं ने कहा कि इस स्कीम ने घर में उनकी स्थिति मजबूत की. 87% महिलाओं ने कहा कि इससे वे अपने सपनों में निवेश कर पाईं, जैसे ट्रेनिंग लेना या छोटा कारोबार शुरू करना. यानी स्कीम्स का असल फायदा भी है.
  • बिहार का संदेश: बिहार में महिलाओं ने सिर्फ पैसे की वजह से वोट नहीं दिया. वहां महिला वोटर्स अब एक ‘डिसाइसिव ब्लॉक’ बन गई हैं और जो पार्टी उनकी आर्थिक चिंताओं को गंभीरता से लेती है, उसे फायदा होता है.

महिला शक्ति मुद्दा नहीं, निर्णायक ताकत

यूपी, बिहार और दिल्ली की ये स्कीम्स साफ करती हैं कि महिलाएं अब एक मजबूत वोट बैंक बन गई हैं. चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 2014 के बाद से महिला मतदान में लगातार इजाफा हो रहा है.

सरकारें चाहे BJP की हों या कोई और, वे महिलाओं को लुभाने के लिए नई-नई स्कीम्स ला रही हैं. BJP ‘वादा निभाने’ की बात करती है तो वहीं विपक्ष इसे ‘वोट बैंक की राजनीति’ बताता है. यह बदलाव भारतीय राजनीति का एक नया अध्याय है, जहां महिला शक्ति सिर्फ मुद्दा नहीं बल्कि निर्णायक ताकत बनती जा रही है.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *