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Xप्लेन: हिमालय में अलर्ट सिस्टम हर मोर्चे पर कमजोर क्यों? नेपाल बाढ़ में ‘चेतावनी’ खुद बही


26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत बॉर्डर पर ग्लेशियर ढहने से जबरदस्त बाढ़ आई. इसमें 475 से ज्यादा लोग मारे गए, लेकिन क्या इस तबाही को टाला जा सकता था. एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर सही समय पर सही चेतावनी मिलती, तो सैकड़ों जानें बच सकती थीं. आखिर हिमालय में चेतावनी प्रणालियां इतनी कमजोर क्यों हैं और हर मोर्चे पर ये सिस्टम फेल कैसे हो रहे हैं…

बाढ़ के लिए अलर्ट सिस्टम क्यों काम नहीं करता?

काठमांडू पोस्ट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, ‘हम नदियों में आने के बाद बाढ़ को ट्रैक करने में बेहतर हैं, लेकिन ऊंचे हिमालयी इलाकों में पैदा होने वाले खतरों को पहचानने में नाकाम.’ जब तक नीचे के स्टेशनों में पानी बढ़ता दिखता है, तब तक चेतावनी का सबसे कीमती समय निकल चुका होता है.

रसुवा बाढ़ में भी यही हुआ. बाढ़ पैदा हुई तिब्बत में 5,000 मीटर से ऊंचाई पर, लेकिन नेपाल के मौसम विभाग ने सुबह 9:15 बजे अलर्ट जारी किया. जब बाढ़ पहले ही कई इलाकों में तबाही मचा चुकी थी.

ऊंचाई पर सेंसर लगाना आसान क्यों नहीं?

हिमालय में अलर्ट सिस्टम की सबसे बड़ी चुनौती लॉजिस्टिक्स है. 5,000 मीटर से ऊंचाई पर सेंसर लगाना, उन्हें मेंटेन करना और डेटा इकट्ठा करना बहुत महंगा और मुश्किल है. इतनी ऊंचाई पर काम सिर्फ गर्मियों के कुछ महीनों में ही मुमकिन है. जमीन पर सेंसर का नेटवर्क बिछाना इतना महंगा और श्रम-गहन है कि हिमालय, कराकोरम और एंडीज जैसे बड़े पहाड़ी इलाकों के लिए यह नामुमकिन है.

सिस्टम बने, लेकिन जंग लग गई

सबसे दर्दनाक मामला एवरेस्ट इलाके का है. इम्जा हिमनद झील के लिए करीब 3.5 मिलियन डॉलर का अर्ली वॉर्निंग सिस्टम बनाया गया था. लेकिन इस सिस्टम को सालों से कोई मेंटेन नहीं किया गया. सायरन टावरों में जंग लग गई है और कुछ की बैटरियां चोरी हो गई हैं. सैटेलाइट डेटा रिसीव करने वाला सिस्टम भी ठीक से काम नहीं कर रहा.

स्थानीय लोग बताते हैं कि सरकारी अधिकारी सिस्टम की जांच करने कभी नहीं आए. एक गांव के मुखिया ने कहा मीडिया से कहा, ‘सायरन टावर में जंग लग गई है और वह झुक गया है, कभी भी गिर सकता है.’ अधिकारी खुद मानते हैं, ‘हम यकीन से नहीं कह सकते कि सायरन काम करते हैं या नहीं.’

भूस्खलन के लिए अलर्ट और भी मुश्किल

हिमालय में भूस्खलन की भविष्यवाणी बाढ़ से भी ज्यादा मुश्किल है. पहाड़ों की ढलानें पहले से ही अस्थिर हैं. बारिश, बर्फ पिघलना और भूकंपीय गतिविधियां मिलकर भूस्खलन को ट्रिगर कर सकते हैं.

CSIR-CBRI के डायरेक्टर प्रोफेसर प्रदीप कुमार रमनचार्ला के मुताबिक, ‘हिमालयी क्षेत्र में कई भूस्खलन बारिश से ट्रिगर होते हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि बारिश का पैटर्न बदल रहा है. कम समय में बहुत ज्यादा बारिश हो रही है.’

जोखिम वाले इलाकों में बस्तियां, लेकिन कोई अलर्ट नहीं

डेली पायनियर की चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, ‘हाइड्रोपावर स्टेशन, सड़कें और बस्तियां अस्थिर घाटियों में धकेल दी गई हैं. यहां लगभग कोई अर्ली-वॉर्निंग कवर नहीं है.’

CBRI वर्तमान में उत्तराखंड में दो पायलट लोकेशन पर एक्सपेरिमेंटल मॉनिटरिंग और अर्ली वॉर्निंग सिस्टम पर काम कर रहा है. ये सिस्टम अभी तक ऑपरेशनल पब्लिक वॉर्निंग सर्विसेज में तब्दील नहीं हुए हैं.

सेंसर-बेस्ड सिस्टम सभी घाटियों में नहीं

एक्सपर्ट्स का कहना है कि सेंसर-बेस्ड वॉर्निंग सिस्टम को कुछ पायलट घाटियों से बढ़ाकर हर ग्लेशियर के नीचे बसी हर बस्ती तक पहुंचाना होगा. इसके लिए पैमाना और पैसा दोनों की कमी है.

मौसम विभाग की सीमाएं बारिश और बादल

बारिश की भविष्यवाणी तो होती है, लेकिन…

नेपाल के जल और मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, अगर एक घंटे में 60 मिमी, तीन घंटे में 80 मिमी, छह घंटे में 100 मिमी, 12 घंटे में 120 मिमी और 24 घंटे में 140 मिमी से ज्यादा बारिश होती है, तो बाढ़ और भूस्खलन की चेतावनी जारी की जाती है.

रसुवा बाढ़ के दिन वहां हल्की और सामान्य बारिश हो रही थी. मौसम विभाग ने उसे सामान्य माना. बाढ़ का कारण बारिश नहीं, बल्कि ग्लेशियर का ढहना था. यानी मौसम विभाग उस खतरे को पहचान ही नहीं पाया जो बारिश से नहीं, बल्कि बर्फ पिघलने से पैदा हुआ था.

बादल फटने की घटनाएं और भी भयानक

बादल फटने और अत्यधिक वर्षा की घटनाएं अचानक आती हैं और अचानक बाढ़ का कारण बनती हैं. इनकी भविष्यवाणी करना मौजूदा सिस्टम के लिए लगभग नामुमकिन है.

पहाड़ों की बस्तियों के बीच दरार

हिमालयी इलाकों में बस्तियां अक्सर नदियों के किनारे और ढलानों पर बसी हैं. यहां खतरा सबसे ज्यादा है, लेकिन इन बस्तियों तक चेतावनी पहुंचाने का कोई भरोसेमंद सिस्टम नहीं है.

रसुवा बाढ़ में भी यही हुआ. नेपाल टेलिकॉम और एनसेल के जरिए 6,79,295 SMS भेजे गए. यह संदेश 9:15 बजे मिले, जब कई मापन केंद्र बाढ़ में बह चुके थे. सुबह 8:50 पर ही स्याफ्रुबेसी जल मापन केंद्र ने डेटा देना बंद कर दिया था.

डेटा शेयरिंग की सबसे बड़ी बाधा अंतरराष्ट्रीय सीमा

हिमालय की नदियां सीमाएं नहीं मानतीं, लेकिन चेतावनी सिस्टम सीमाएं मानते हैं. काठमांडू पोस्ट में छपे एक ऑपिनियन में साफ कहा गया, ‘बाढ़ ने सीमा पार कर ली, हमारी चेतावनी प्रणालियों को भी सीमा पार करनी चाहिए.’

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ‘हमें मल्टी-हाजर्ड डिटेक्शन चाहिए जो स्रोत पर शुरू हो और बाढ़ से पहले सीमाएं पार करे.’ लेकिन नेपाल और चीन के बीच कोई अंतरराष्ट्रीय सूचना आदान-प्रदान प्रणाली नहीं है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘ऊपर और नीचे वाले हिमालयी देशों के बीच सहयोग सिर्फ राहत और बचाव तक सीमित नहीं होना चाहिए.’ WMO का साउथ एशिया हाइड्रोमेट फोरम और साउथ एशिया फ्लैश फ्लड गाइडेंस सिस्टम जैसी व्यवस्थाएं हैं, लेकिन इन्हें बड़े पैमाने पर लागू करने की जरूरत है. इससे डेटा, फोरकास्टिंग एक्सपर्टाइज और EWS को साझा किया जा सके.

सबसे आम जवाब- ‘पैसा नहीं है’

नेपाल के जल और मौसम विज्ञान विभाग के एक वरिष्ठ मौसम विज्ञानी ने मीडिया को बताया, ‘केंद्र सरकार ने कोई बजट आवंटित नहीं किया.’ पायलट प्रोजेक्ट्स हैं, लेकिन उन्हें पूरे इलाके में लागू करने के लिए पैसा नहीं.

साइंस जर्नल नेचर के एक कमेंट्री में कहा गया कि रिमोट सेंसर, कैमरा और सैटेलाइट मॉनिटरिंग का इस्तेमाल नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और चीन के कुछ इलाकों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर हो रहा है. इसका दायरा अभी भी सीमित है.

क्या जलवायु परिवर्तन असल बड़ी वजह?

हिमालय में तापमान हर दशक में करीब 0.44°C बढ़ रहा है. यह दुनिया के औसत से दोगुना है. ग्लेशियर हर साल 15 मीटर तक पीछे हट रहे हैं.

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के मुताबिक, हिंदू कुश हिमालय में एक दशक में एक बार आने वाली GLOF घटनाएं, पिछले साल सिर्फ दो महीनों में तीन बार आईं. हिमालय में कम से कम 7,500 ग्लेशियर झीलें हैं. इनमें 200 से ज्यादा ऐसी झीलें हैं जो निचली बस्तियों के लिए गंभीर खतरा हैं.

बढ़ती आपदाएं पर सिस्टम वहीं के वहीं  

वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी दे रहे हैं कि ऐसी बर्फ-चट्टानी हिमस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं. 2021 की चमोली आपदा ने इन खामियों को बेहद साफ तरीके से उजागर कर दिया. फिर भी हिमालयी देश अभी भी बड़े पैमाने की घटनाओं से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ऑटोमेटेड डिटेक्शन और अलर्ट सिस्टम होता, तो बाढ़ के नीचे की बस्तियों तक पहुंचने से पहले लोगों को 5 से 30 मिनट का समय मिल सकता था. यही 30 मिनट सैकड़ों जानें बचा सकते थे.

नेपाल के राष्ट्रीय विपदा जोखिम न्यूनीकरण प्राधिकरण के पूर्व प्रमुख अनिल पोखरेल ने सही कहा, ‘इस घटना ने मिनट-मिनट और सेकंड-सेकंड का महत्व दिखा दिया. हमने देश के अंदर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चेतावनी प्रणाली में कई काम नहीं किए.’

सवाल यह है- क्या इस बार हम सीखेंगे?





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