दिल्ली हाईकोर्ट ने सड़क हादसे में एक टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल वाहन की तेज रफ्तार को आधार बनाकर चालक को रैश या लापरवाह नहीं ठहराया जा सकता. दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि तेज रफ्तार और ओवर स्पीड अपने आप में सापेक्ष शब्द हैं. किसी चालक को दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि उसकी ड्राइविंग वास्तव में लापरवाही या खतरनाक तरीके से की गई थी.
जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने यह टिप्पणी दिल्ली सरकार की उस अपील को खारिज करते हुए की जिसमें 2009 के सड़क हादसे में एक महिला की मौत के मामले में टेंपो चालक को बरी किए जाने को चुनौती दी गई थी. चालक के खिलाफ आईपीसी की धारा 279 यानी लापरवाही से वाहन चलाना और 304ए यानी लापरवाही से मौत के तहत मामला दर्ज किया गया था.
सिर्फ तेज चलाने से चालक दोषी नहीं
दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा कि गाड़ी तेज गति से चलाने के लिए ही बनाए गए हैं. महज इसलिए कि वाहन तेज रफ्तार में था यह नहीं माना जा सकता कि चालक रैश या लापरवाह था. कोर्ट ने कहा कि किसी वाहन की स्पीड को परिस्थितियों के हिसाब से देखा जाना चाहिए.
गवाह के बयान पर भी उठे सवाल
इस मामले में एक गवाह ने दावा किया था कि वह सड़क के बाई ओर साइकिल चला रहा था और सामने से आ रहे टेंपो ने उसकी साइकिल को टक्कर मार दी. हालांकि कोर्ट ने गवाह के बयान और मेडिकल व मैकेनिकल साक्ष्यों में विरोधाभास पाया.
गवाह को चोट तक नहीं लगी थी
कोर्ट ने पाया कि गवाह के शरीर पर किसी तरह के खरोंच या चोट के निशान होने का कोई सबूत नहीं था. इतना ही नहीं हादसे के बाद उसका मेडिकल परीक्षण भी नहीं कराया गया था. इससे अभियोजन की कहानी पर सवाल खड़े हुए.
टेंपो की क्षति ने भी खोली कहानी
गाड़ी की मैकेनिकल जांच में टेंपो के बाएं कोने पर मामूली डेंट मिला था. कोर्ट ने कहा कि अगर हादसा गवाह के बताए तरीके से हुआ होता और सामने से आ रहे टेंपो ने साइकिल को टक्कर मारी होती तो सामान्य तौर पर टेंपो के दाहिने हिस्से में ज्यादा नुकसान होना चाहिए था..
अभियोजन नहीं साबित कर सका लापरवाही
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष चालक की जल्दबाजी या लापरवाही को पुख्ता तौर पर साबित करने में नाकाम रहा. लिहाजा कोर्ट ने निचली अदालत के चालक को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा और दिल्ली सरकार की अपील खारिज कर दी.
