लगातार हो रही मूसलाधार बारिश के कारण नेपाल की उफान पर चल रही काली गंडकी नदी में पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा ढहकर गिर गया. यह दर्दनाक हादसा देश के कई जिलों में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बीच हुआ है, जिसमें अब तक कम से कम 24 लोगों की मौत हो चुकी है और 14 लोग लापता हैं.
यह ताजा घटना अगस्त के अंत में ग्लेशियर और चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने की उस विनाशकारी आपदा के बाद हुई है, जिसमें 1,300 से अधिक लोगों की जान चली गई थी. यह लगातार होती घटनाएं संपूर्ण हिमालयी पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र में भारी अस्थिरता की ओर इशारा करती हैं.
वास्तव में क्या हुआ था?
नेपाल के मुस्तांग जिले में लेटे के पास जबरदस्त भूस्खलन के कारण पहाड़ का एक पूरा हिस्सा ढह गया और सीधे काली गंडकी नदी में जा गिरा. यह घटना रविवार, 27 सितंबर को स्थानीय समय के अनुसार शाम करीब 5:30 बजे खराब मौसम के दौरान हुई. चारधाम यात्रा पर निकले तीर्थयात्रियों और स्थानीय निवासियों ने इस भयानक दृश्य का वीडियो भी बनाया.
लगातार हो रही भारी मानसूनी बारिश ने पहाड़ी मिट्टी को पूरी तरह जलमग्न कर दिया है, जिससे पहाड़ों का भूवैज्ञानिक ढांचा बेहद कमज़ोर हो गया है. विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ ही सेकंडों में पहाड़ की ढलान का एक बड़ा हिस्सा टूटकर अलग हो गया और तेजी से कीचड़, मलबे, बड़े पत्थरों और पेड़ों की एक खौफनाक दीवार में बदलकर नीचे घाटी की ओर बहने लगा.
मलबे का यह विशाल ढेर सीधे काली गंडकी नदी में गिरा, जिससे कुछ समय के लिए एक प्राकृतिक बांध बन गया और नदी का बहाव रुक गया. हालांकि, रिपोर्टों के अनुसार कुछ ही मिनटों में बढ़ते जलस्तर के दबाव ने मलबे के किनारे को तोड़ दिया, जिससे नदी का बहाव पुनः शुरू हो गया और तत्काल नदी फटने का बड़ा खतरा फिलहाल टल गया.
इसके साथ ही, इसी तीव्र मौसम प्रणाली के कारण मनांग जिले के चामे में एक अन्य बड़ी चट्टान ढह गई. वहीं, माउंट हिमलुंग पर आए घातक हिमस्खलन ने पर्वत गाइडों के एक बेस कैंप को तिनके की तरह बहा दिया.
अधिकारियों ने सोमवार को बताया कि मनांग जिले में हिमलुंग हिमाल पर बर्फीले तूफान के बाद लापता हुए 12 नेपाली मजदूरों और गाइडों की तलाश के लिए 14 सदस्यों की एक बचाव टीम भेजी गई है. नार फू इलाके में 7,126 मीटर ऊंची हिमलुंग चोटी के बेस कैंप पर आए इस हिमस्खलन ने एक टेंट को मलबे में दबा दिया, जिसमें 9 पर्वतारोही और 13 सपोर्ट स्टाफ रुके हुए थे.
‘द काठमांडू पोस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार, ‘इमेजिन नेपाल ट्रेक एंड एक्सपेडिशन’ के ऑपरेटर व अंतरराष्ट्रीय माउंटेन गाइड मिंगमा जी शेरपा की अगुवाई में खोज दल को रवाना किया गया. टीम रविवार को काठमांडू से निकलकर रात में चामे में रुकी थी और सोमवार सुबह उन्हें हेलीकॉप्टर से हिमलुंग बेस कैंप ले जाया गया, जहां सघन खोज अभियान शुरू किया गया.
इस आपदा के पीछे के संकेत
‘वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन’ जैसे वैश्विक समूहों के वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों का पीछे खिसकना और ‘पर्माफ्रॉस्ट’ (हमेशा जमी रहने वाली बर्फ और मिट्टी की परत) का पिघलना पहाड़ों की टूटी-फूटी चट्टानों को आपस में बांधकर रखने वाले प्राकृतिक बंधन को कमजोर कर रहा है.
मुस्तांग के लेटे और मनांग के चामे में हुए अचानक भूस्खलन के कारण भारी मात्रा में मलबा काली गंडकी और मार्स्यांगडी नदियों में जा गिरा, जिससे कुछ समय के लिए उनका स्वाभाविक प्रवाह अवरुद्ध हो गया था.
हाल ही में आई इस बाढ़ और भूस्खलन में 24 लोगों की जान जा चुकी है और 14 लोग अब भी लापता हैं. अकेले गंडकी प्रांत में 747 से अधिक परिवार सीधे तौर पर प्रभावित हुए हैं और लगभग 1,500 लोगों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा है. खराब मौसम और मलबे के बहाव ने कम से कम 143 घरों को तबाह कर दिया है, कई कंक्रीट के पुलों को क्षतिग्रस्त कर दिया है, प्रमुख सड़कें बंद कर दी हैं और स्थानीय जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया है.
राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) ने पुष्टि की है कि जलस्तर बढ़ने और ज़मीन खिसकने के खतरे को देखते हुए आपातकालीन टीमों ने लगभग 3,000 निवासियों को उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया है. सशस्त्र पुलिस बल की टुकड़ियों और स्थानीय अधिकारियों द्वारा चलाए गए राहत व बचाव अभियानों के ज़रिए विस्थापित परिवारों तक भोजन और ज़रूरी सामग्री पहुंचाई जा रही है. जाजरकोट, म्याग्दी और संखुवासभा जैसे बुरी तरह प्रभावित पहाड़ी ज़िलों में फंसे लोगों को आपातकालीन हेलीकॉप्टरों की मदद से निकाला गया.
आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, भारी बारिश के दौरान नेपाल में लगभग 9,000 विदेशी पर्यटक और ट्रेकर्स मौजूद थे. नेपाल पर्यटन बोर्ड और स्थानीय एजेंसियों के सहयोग से NDRRMA ने अंग्रेजी में सुरक्षा परामर्श जारी किया है, जिसमें जोखिम वाले इलाकों में मौजूद पर्यटकों से सुरक्षित स्थलों पर रहने और स्थिति सामान्य होने तक अपनी यात्रा स्थगित करने का आग्रह किया गया है.
क्या सबसे बुरा दौर अभी आना बाकी है?
यह क्षेत्र अभी भी एक बड़े खतरे की चपेट में है. इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं के बाद पहाड़ी इलाके तुरंत सामान्य नहीं होते, बल्कि वे एक के बाद एक कई नए खतरों को जन्म देते हैं.
अस्थायी बांधों का खतरा: टूटे हुए मलबे से बने अस्थिर प्राकृतिक बांध यदि अचानक टूटते हैं या पानी उनके ऊपर से बहने लगता है, तो नीचे की ओर पानी, कीचड़ और मलबे की अति-विनाशकारी लहरें तबाही मचा सकती हैं.
चट्टानों की अस्थिरता: भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि जब पहाड़ का कोई एक हिस्सा ढहता है, तो उससे आसपास की चट्टानें और बर्फ वाली ढलानें भी कमज़ोर हो जाती हैं, जिससे निकट भविष्य में और अधिक भूस्खलन का खतरा बना रहता है.
मौसम की मार: मानसून का मौसम अभी भी जारी है और भारी बारिश की संभावना को देखते हुए अधिकारियों ने निचले इलाकों के निवासियों को हाई अलर्ट पर रखा है और कई परिवहन सेवाओं को स्थगित कर दिया है.
क्या भारत को चिंतित होना चाहिए?
नेपाल में जिस स्थान पर पहाड़ का हिस्सा ढहा, वह सीधे काली गंडकी नदी में गिरा. यह नदी दक्षिण दिशा की ओर बहते हुए भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा में प्रवेश करती है, जहां इसे गंडक नदी के नाम से जाना जाता है.
वाल्मीकिनगर बैराज पर जलस्तर: भारी बारिश और नेपाल के पहाड़ों से आए भारी जलप्रवाह के कारण भारत-नेपाल सीमा पर स्थित वाल्मीकिनगर बैराज में इस साल का सबसे ज़्यादा यानी 5.44 लाख क्यूसेक जल बहाव दर्ज किया गया.
बिहार में हाई अलर्ट: बिहार सरकार ने उत्तरी बिहार के 17 जिलों को हाई अलर्ट पर रखा है. पानी का यह विकराल रूप पहले ही पश्चिमी चंपारण के बगहा अनुमंडल के बड़े भू-भाग को जलमग्न कर चुका है.
चौबीसों घंटे निगरानी: जल संसाधन विभाग ने तटबंधों और स्लुइस गेट्स की 24 घंटे (रात में भी) सघन निगरानी का आदेश दिया है, ताकि किसी भी कटाव या दरार का समय रहते पता लगाया जा सके.
भारत के लिए दीर्घकालिक चेतावनी
बाढ़ के तत्काल प्रभाव के अलावा, भू-वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि नेपाल में पहाड़ों के ढहने का मूल कारण भारत के भूगोल के लिए भी एक सीधा इशारा है. भारत और नेपाल दोनों ‘हिंदू कुश-हिमालय’ क्षेत्र का हिस्सा हैं, जहां 63,000 से अधिक ग्लेशियर मौजूद हैं.
इस क्षेत्र में बढ़ता तापमान ऊंचाई वाले इलाकों के ‘परमाफ्रॉस्ट’ को पिघला रहा है. यह जमी हुई परत प्राकृतिक सीमेंट की तरह काम करती है और पहाड़ की चट्टानों को आपस में जोड़े रखती है. इसके पिघलने से ढलानें अत्यधिक अस्थिर हो रही हैं.
नेपाल की यह घटना भारत में हाल के वर्षों में हुई त्रासदियों जैसी ही है जैसे 2021 में उत्तराखंड की चमोली आपदा और 2023 में सिक्किम में साउथ ल्होनक झील का फटना. भारत का संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र (जम्मू-कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक) इसी प्रकार के गंभीर संकट का सामना कर रहा है.
नेपाल की तर्ज़ पर ही भारत ने भी तंग और संवेदनशील पहाड़ी घाटियों में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का निर्माण किया है. ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जरा सा भी बड़ा भूस्खलन या ग्लेशियर का टूटना नदियों को अचानक मलबे और पानी की विनाशकारी दीवार में बदल सकता है, जो निचले क्षेत्रों में अरबों रुपये के बुनियादी ढांचे को पल भर में ध्वस्त कर सकता है.
भारत पर मानसूनी असर
जिस मानसून प्रणाली ने नेपाल में भारी तबाही मचाई है, उसी के प्रभाव से उत्तरी भारत में भी बेमौसम और मूसलाधार बारिश दर्ज की गई है. उत्तर प्रदेश में सप्ताहांत के दौरान 66.5 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो इस समय के सामान्य औसत से लगभग नौ गुना अधिक है. पिछले कुछ ही दिनों में भारत भर में बाढ़ और भूस्खलन के कारण दुखद रूप से कम से कम 56 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है.
