स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) से लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष का लगातार दूसरे दिन प्रदर्शन जारी रहा. एक बार फिर कांग्रेस नेता और सांसद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को लगातार दूसरे दिन हिरासत में लिया गया. ऐसे में एक सवाल उठता है कि सांसदों-विधायकों को प्रोटेस्ट के दौरान हिरासत में लेने का कानूनी नियम क्या हैं. आइए आज इस स्टोरी में इसपर चर्चा करते हैं.
क्या विरोध प्रदर्शन के दौरान सांसदों/विधायकों को हिरासत में लिया जा सकता है?
मंगलवार को भी गांधी परिवार के सदस्यों और सांसदों को आकाशवाणी भवन के पास उस समय हिरासत में लिया गया था, जब वे दिल्ली में चुनाव आयोग के दफ्तर की ओर मार्च करने का प्रयास कर रहे थे. इसके बाद बुधवार को विपक्षी सांसद जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे. अब ऐसे में सवाल है कि क्या विरोध प्रदर्शन के दौरान सांसदों/विधायकों को हिरासत में लिया जा सकता है?
इसका जवाब है हां, विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस अधिकारी कानूनी तौर पर सांसदों और विधायकों को हिरासत में ले सकते हैं या गिरफ्तार कर सकते हैं.
जनप्रतिनिधियों की पुलिस हिरासत से जुड़े 5 मुख्य नियम
विशेषाधिकार केवल दीवानी (सिविल) मामलों पर लागू: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 (सांसदों के लिए) और अनुच्छेद 194 (विधायकों के लिए) के तहत जनप्रतिनिधियों को सत्र से 40 दिन पहले, सत्र के दौरान और सत्र के 40 दिन बाद तक गिरफ्तारी से छूट मिलती है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फैसले (केरल राज्य बनाम के. अजित) के अनुसार, यह छूट केवल दीवानी (सिविल) मामलों पर लागू होती है. एहतियाती हिरासत (प्रिवेंशन डिटेंशन, गैर-कानूनी जमावड़े, दंगे या विरोध प्रदर्शन के दौरान किए गए आपराधिक अपराधों पर यह छूट लागू नहीं होती.
सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियातन हिरासत: यदि कोई सांसद/विधायक अनधिकृत प्रदर्शन में भाग लेता है, धारा 144 / BNSS की धारा 163 का उल्लंघन करता है या शांति भंग करता है, तो पुलिस के पास (BNSS की धारा 170/172 के तहत) उन्हें एहतियाती हिरासत में लेने का पूरा कानूनी अधिकार है.
स्थान का महत्व भी है
सड़कों या सार्वजनिक स्थानों पर किसी जनप्रतिनिधि को हिरासत में लेने के लिए पुलिस को स्पीकर या चेयरमैन से पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती. वहीं सदन के अंदर पीठासीन अधिकारी (स्पीकर/चेयरमैन) की स्पष्ट अनुमति के बिना संसद या विधानसभा परिसर के अंदर कोई पुलिस कार्रवाई या गिरफ्तारी नहीं की जा सकती.
जब भी किसी सांसद या विधायक को गिरफ्तार या हिरासत में लिया जाता है, तो पुलिस के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य है कि वह तुरंत लोकसभा अध्यक्ष/राज्यसभा सभापति (या राज्य विधानसभा के अध्यक्ष) को सूचित करे. सूचना में हिरासत का कारण, स्थान और आरोपों की प्रकृति का विवरण होना चाहिए.
हिरासत के दौरान भी पुलिस जरूरत से ज़्यादा या बिना उकसावे के बल प्रयोग नहीं कर सकती. यदि एहतियातन हिरासत को औपचारिक गिरफ्तारी में बदला जाता है, तो पुलिस को 24 घंटे के भीतर सांसद/विधायक को न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है.
जब नेता विपक्ष को हिरासत में लिया जाता है, तो क्या कानूनी प्रक्रिया होती है?
जब किसी सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शन के दौरान संसद सदस्य (MP) या विपक्ष के नेता (LoP) को हिरासत में लिया जाता है, तो निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाती है:
शारीरिक प्रोटोकॉल और अलगाव: अनधिकृत सभाओं को तितर-बितर करने के लिए पुलिस नेताओं को ट्रांज़िट वाहनों (जैसे पुलिस वैन या बस) में बिठाकर ले जाती है. सामान्य जेल सेल में बंद करने के बजाय, हाई-प्रोफाइल जनप्रतिनिधियों को पास के पुलिस स्टेशनों या तय अस्थायी होल्डिंग साइटों पर रखा जाता है.
पीठासीन अधिकारी को औपचारिक सूचना: स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के तहत स्थानीय पुलिस तुरंत लोकसभा अध्यक्ष/राज्यसभा सभापति को सूचना भेजती है, जिसमें हिरासत के कारण, स्थान और समय का उल्लेख होता है. सूचना न देना संसदीय विशेषाधिकार का उल्लंघन माना जाता है.
कम समय की हिरासत और रिहाई: एहतियातन हिरासत का उद्देश्य मुकदमा चलाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना और रास्ता खाली कराना होता है. इसलिए प्रदर्शन खत्म होने पर अधिकांश नेताओं को कुछ ही घंटों में छोड़ दिया जाता है.
आपराधिक रिकॉर्ड का नियम: जब तक पुलिस गैर-कानूनी तरीके से घुसने, सरकारी कर्मचारी पर हमला करने या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी हरकतों के लिए औपचारिक FIR दर्ज नहीं करती, तब तक कोई स्थायी आपराधिक रिकॉर्ड नहीं बनता.
