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Chaturmas 2026: सावन से कार्तिक तक, भूलकर भी न खाएं ये 4 चीजें, सेहत और ग्रह दोनों पर पड़ता है असर!


चातुर्मास के दौरान शास्त्रों और आयुर्वेद में बताए गए इन आहार नियमों का पालन करने से स्वास्थ्य और किस्मत दोनों में सुधार होता है. सनातन धर्म और आयुर्वेद में मौसम के अनुसार हमारे खान-पान को ढालने पर विशेष बल दिया गया है. विशेषकर सावन से लेकर कार्तिक तक के चार महीनों (चातुर्मास) में धार्मिक नियमों और सेहत को ध्यान में रखते हुए कुछ खाद्य पदार्थों को वर्जित माना गया है. ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार, इन नियमों का पालन करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं. आप भी वर्ष 2026 में शुभ फल और उत्तम स्वास्थ्य पाना चाहते हैं, तो इन 4 महीनों में 4 चीजों से दूरी बना लें:

कुंवार (आश्विन) माह: दूध का त्याग,  आश्विन का महीना धार्मिक नजरिए से बहुत पवित्र माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान पितृ पक्ष और नवरात्रि जैसे बड़े पर्व आते हैं. इस समय आहार की शुद्धता बनाए रखना बहुत जरूरी होता है. आयुर्वेद के अनुसार, आश्विन के मौसम में शरीर में 'पित्त' दोष काफी तेजी से बढ़ता है. मौसम के इस बदलाव के कारण दूध पचाने में भारी (गरिष्ठ) हो जाता है और हमारा पाचन तंत्र इसे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता. दूध न पचने से पेट की कई तरह की बीमारियां पनप सकती हैं, इसीलिए इस महीने में दूध का त्याग करना ही सबसे बेहतर माना जाता है.

कुंवार (आश्विन) माह: दूध का त्याग, आश्विन का महीना धार्मिक नजरिए से बहुत पवित्र माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान पितृ पक्ष और नवरात्रि जैसे बड़े पर्व आते हैं. इस समय आहार की शुद्धता बनाए रखना बहुत जरूरी होता है. आयुर्वेद के अनुसार, आश्विन के मौसम में शरीर में ‘पित्त’ दोष काफी तेजी से बढ़ता है. मौसम के इस बदलाव के कारण दूध पचाने में भारी (गरिष्ठ) हो जाता है और हमारा पाचन तंत्र इसे आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता. दूध न पचने से पेट की कई तरह की बीमारियां पनप सकती हैं, इसीलिए इस महीने में दूध का त्याग करना ही सबसे बेहतर माना जाता है.

भादो (भाद्रपद) माह: दही का सेवन,  भाद्रपद के महीने में शरीर और मन को पूरी तरह स्वस्थ रखने के लिए शास्त्रों में कड़े नियम बताए गए हैं. अगर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से देखें, तो इस मौसम में तापमान और हवा की नमी में लगातार उतार-चढ़ाव होता रहता है. ऐसे समय में दही खाने से शरीर के अंदर कफ और वात दोष का संतुलन बिगड़ने लगता है. इसका सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ता है, जिससे खांसी, जुकाम, गले में खराश और जोड़ों के दर्द जैसी परेशानियां बढ़ने लगती हैं. यही कारण है कि भादों में दही के सेवन से दूर रहने को कहा जाता है.

भादो (भाद्रपद) माह: दही का सेवन, भाद्रपद के महीने में शरीर और मन को पूरी तरह स्वस्थ रखने के लिए शास्त्रों में कड़े नियम बताए गए हैं. अगर आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से देखें, तो इस मौसम में तापमान और हवा की नमी में लगातार उतार-चढ़ाव होता रहता है. ऐसे समय में दही खाने से शरीर के अंदर कफ और वात दोष का संतुलन बिगड़ने लगता है. इसका सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ता है, जिससे खांसी, जुकाम, गले में खराश और जोड़ों के दर्द जैसी परेशानियां बढ़ने लगती हैं. यही कारण है कि भादों में दही के सेवन से दूर रहने को कहा जाता है.

कार्तिक माह: दालों (द्विदल) से परहेज,  कार्तिक का महीना सनातन परंपरा में विशेष महत्व रखता है, जिसमें हल्का और संतुलित भोजन करने पर जोर दिया जाता है. वैज्ञानिक आधार पर देखा जाए, तो इस महीने में ऋतु परिवर्तन होता है, जिससे मौसम बदलने लगता है. इस बदलाव के दौरान शरीर की पाचन शक्ति स्वाभाविक रूप से थोड़ी सुस्त और धीमी हो जाती है. ऐसे समय में उड़द, मूंग और मसूर जैसी भारी दालों का सेवन करने से पेट पर अनावश्यक दबाव पड़ता है, जिससे गैस और एसिडिटी जैसी दिक्कतें बढ़ सकती हैं. इसलिए कार्तिक में दालों के परहेज की सलाह दी जाती है.

कार्तिक माह: दालों (द्विदल) से परहेज, कार्तिक का महीना सनातन परंपरा में विशेष महत्व रखता है, जिसमें हल्का और संतुलित भोजन करने पर जोर दिया जाता है. वैज्ञानिक आधार पर देखा जाए, तो इस महीने में ऋतु परिवर्तन होता है, जिससे मौसम बदलने लगता है. इस बदलाव के दौरान शरीर की पाचन शक्ति स्वाभाविक रूप से थोड़ी सुस्त और धीमी हो जाती है. ऐसे समय में उड़द, मूंग और मसूर जैसी भारी दालों का सेवन करने से पेट पर अनावश्यक दबाव पड़ता है, जिससे गैस और एसिडिटी जैसी दिक्कतें बढ़ सकती हैं. इसलिए कार्तिक में दालों के परहेज की सलाह दी जाती है.

सावन (श्रावण) माह: हरी पत्तेदार सब्जियां,  सावन का महीना केवल भगवान शिव की आराधना और भक्ति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे खान-पान में संयम रखने का एक महत्वपूर्ण समय भी माना जाता है. इस दौरान लगातार होने वाली मूसलाधार बारिश के कारण वातावरण में नमी बहुत बढ़ जाती है. इस वजह से पालक, मेथी और पत्तागोभी जैसी हरी पत्तेदार सब्जियों में सूक्ष्म कीड़े और बैक्टीरिया तेजी से पनपने लगते हैं. यदि इस मौसम में इनका सेवन किया जाए, तो पेट में गंभीर संक्रमण और पाचन की समस्याएं पैदा हो सकती हैं. इसीलिए सावन में हरी सब्जियां न खाने की सलाह दी जाती है.

सावन (श्रावण) माह: हरी पत्तेदार सब्जियां, सावन का महीना केवल भगवान शिव की आराधना और भक्ति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे खान-पान में संयम रखने का एक महत्वपूर्ण समय भी माना जाता है. इस दौरान लगातार होने वाली मूसलाधार बारिश के कारण वातावरण में नमी बहुत बढ़ जाती है. इस वजह से पालक, मेथी और पत्तागोभी जैसी हरी पत्तेदार सब्जियों में सूक्ष्म कीड़े और बैक्टीरिया तेजी से पनपने लगते हैं. यदि इस मौसम में इनका सेवन किया जाए, तो पेट में गंभीर संक्रमण और पाचन की समस्याएं पैदा हो सकती हैं. इसीलिए सावन में हरी सब्जियां न खाने की सलाह दी जाती है.

Published at : 31 Jul 2026 11:42 AM (IST)

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