Headlines

Explained: सूखे की गिरफ्त में पश्चिम भारत, राजस्थान के 14 जिले चपेट में, यूरिया की खपत-ट्रैक्टरों की बिक्री में गिरावट


भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था इस समय एक गंभीर और दोहरे संकट से गुजर रही है. मानसून के दौरान असमान, कमजोर और बेवक्त बारिश के कारण देश के बड़े हिस्से में सूखे जैसे हालात पैदा हो गए हैं. इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले क्षेत्रों पर पड़ा है. खेतों में नमी न होने के कारण यूरिया और अन्य उर्वरकों की खपत में भारी गिरावट दर्ज की गई है, किसानों की क्रय शक्ति कमजोर होने से ट्रैक्टरों की बिक्री मंद पड़ गई है, और विशेष रूप से पश्चिम भारत व प्रायद्वीपीय राज्यों में सूखे ने विकराल रूप धारण कर लिया है.

राजस्थान सरकार द्वारा हाल ही में राज्य के 14 जिलों की 80 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किए जाने के बाद इस संकट ने राष्ट्रीय स्तर पर नीति निर्माताओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. आइए जानते हैं कि इस संकट के जमीनी आंकड़े क्या हैं, यह कृषि बाजार को कैसे प्रभावित कर रहा है और इसके दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे.

 

राजस्थान में सूखा,14 जिले और 80 तहसीलें चपेट में

पश्चिम भारत में मानसूनी बेरुखी का सबसे ज्यादा शिकार राजस्थान हुआ है. राज्य सरकार ने खरीफ सीजन के दौरान स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आधिकारिक तौर पर 14 जिलों की 80 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है.

 

प्रशासनिक रिपोर्टों के मुताबिक, इन 80 तहसीलों में से 69 तहसीलें गंभीर सूखे की श्रेणी में आती हैं, जबकि 11 तहसीलों में मध्यम स्तर का सूखा दर्ज किया गया है.

इस सीजन में राजस्थान में सामान्य से लगभग 22 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई. राज्य के जल संसाधन निगरानी वाले 693 बांधों में जलस्तर गिरकर कुल क्षमता का मात्र 62.16% रह गया है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 90% से अधिक था. जोधपुर जैसे क्षेत्रों में तो बांधों का जलस्तर मात्र 15-16% तक सिमट गया है, जिससे पीने के पानी और मवेशियों के लिए चारे का गंभीर संकट खड़ा हो गया है.

पश्चिम भारत और देश के अन्य हिस्सों का बुरा हाल

सिर्फ राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरा पश्चिम और दक्षिण भारत इस बार मानसूनी घाटे और सूखे की मार झेल रहा है: महाराष्ट्र ने अपनी 358 में से 265 तालुकों में सूखे की घोषणा कर दी है. राज्य के कई हिस्सों में बारिश इतनी कम रही कि खेतों में खड़ी फसलें शुरुआती दौर में ही सूख गईं. जिला प्रशासनों को युद्धस्तर पर पंचनामा और फसल नुकसान के आंकलन के निर्देश दिए गए हैं.

दक्षिण भारत में कर्नाटक ने अपने 240 में से 217 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है, वहीं आंध्र प्रदेश ने 21 जिलों के 388 मंडलों में सूखे का ऐलान किया है.

इस वर्ष पूरे देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून दीर्घकालिक औसत (LPA) से लगभग 13 प्रतिशत कम दर्ज किया गया, जिसके चलते 741 में से 300 से अधिक जिलों में सूखे जैसे हालात बने.

कृषि इनपुट पर मार, क्यों घटी यूरिया की खपत?

 

खेती में सूखे और पानी की कमी का सबसे पहला असर उर्वरकों की मांग पर पड़ता है. आंकड़ों के अनुसार, देश में प्रमुख उर्वरकों की घरेलू बिक्री में भारी गिरावट आई है.

देश के सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले उर्वरक यूरिया की घरेलू बिक्री में लगभग 3.6% से 10% तक की गिरावट दर्ज की गई है. नियम के मुताबिक, यूरिया का छिड़काव तभी प्रभावी होता है जब खेतों में पर्याप्त नमी या सिंचाई का पानी हो. सूखे और मानसूनी ठहराव के कारण किसानों ने खाद और यूरिया की खरीद सीमित कर दी है. कई इलाकों में फसल की बुआई न होने या फसल के शुरुआती दौर में ही सूख जाने के कारण उर्वरकों की खपत स्वतः कम हो गई है.

हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया के दाम नरम होने से सरकार के सब्सिडी बिल को थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन घरेलू मांग का गिरना कृषि क्षेत्र की मंदी का संकेत है.

ट्रैक्टर बिक्री में गिरावट

ऑटोमोबाइल और कृषि बाजार विश्लेषकों के अनुसार, सूखे और खराब मानसूनी हालात का सीधा असर ट्रैक्टरों की बिक्री पर पड़ा है. ट्रैक्टर किसी भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में किसान की आर्थिक सेहत और भविष्य के प्रति उसके आत्मविश्वास का पैमाना होते हैं. जब फसल के मारे जाने का जोखिम हो और भूजल स्तर लगातार नीचे गिर रहा हो, तो किसान भारी कर्ज लेकर ट्रैक्टर या अन्य महंगे कृषि यंत्र खरीदने से बचते हैं.

पश्चिमी और मध्य भारत के कई जिलों में ट्रैक्टरों की खुदरा बिक्री में दहाई अंकों की गिरावट देखी गई है. ग्रामीण क्षेत्रों में नकदी प्रवाह कम होने से ऑटोमोबाइल सेक्टर के इस अहम सेगमेंट की रफ्तार थम गई है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और भविष्य की चुनौतियां

इस कृषि संकट के दूरगामी आर्थिक और सामाजिक परिणाम हो सकते हैं. पानी और चारे की भारी कमी के कारण किसानों को अपने मवेशियों को कम दामों पर बेचने जैसी मजबूरियों का सामना करना पड़ रहा है. फसल उत्पादन घटने से ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति आय गिरेगी, जिससे गैर-कृषि क्षेत्रों (FMCG और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स) की मांग पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा.

केंद्र और राज्य सरकारों के सामने अब सूखा राहत पैकेजों, मनरेगा के तहत काम के दिन बढ़ाने और किसानों के ऋण पुनर्गठन जैसी बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं.

राजस्थान के 14 जिलों में सूखा घोषित होने की यह घटना और पूरे पश्चिम भारत में कृषिगत मांग (यूरिया और ट्रैक्टर) का घटना यह बताता है कि भारतीय कृषि आज भी जलवायु और मानसून की अनिश्चितताओं पर कितनी गहराई से निर्भर है. यह संकट सिर्फ एक सीजन का नुकसान नहीं है, बल्कि यह भविष्य की जल सुरक्षा और कृषि को मौसम के अनुकूल बनाने के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक बदलाव की सख्त मांग करता है.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *