Headlines

SIR पूरा होते ही हटाया गया अतिरिक्त फॉर्म, अभिजीत दीपके ने EC से पूछा सवाल


SIR को लेकर चल रहे विवाद के बीच चुनाव आयोग ने फॉर्म 6 को लेकर बड़ा अपडेट दिया है. आयोग ने साफ किया है कि वैधानिक फॉर्म 6 के मूल प्रारूप में कोई बदलाव नहीं किया गया था. SIR के दौरान इसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा पत्र लिया जा रहा था. 

अब जिन राज्यों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां ऑनलाइन फॉर्म 6 से यह अतिरिक्त घोषणा पत्र हटा दिया गया है. इन राज्यों में नए मतदाताओं को अब केवल मूल फॉर्म 6 भरना होगा. इस पर CJP फाउंडर अभिजीत दीपके ने रिएक्शन दिया है. उन्होंने एक्स पर लिखा कि पहले क्यों जरूरी थी.

फॉर्म 6 को लेकर सवाल

SIR को लेकर फॉर्म 6 और घोषणा पत्र पर लगातार सवाल उठ रहे थे. चुनाव आयोग की 26 सितंबर की बैठक के बाद इस व्यवस्था को लेकर आयोग की ओर से जानकारी सामने आई थी. आयोग के मुताबिक SIR वाले राज्यों में नए मतदाता के Form 6 के साथ अलग घोषणा पत्र का इस्तेमाल किया गया. इसका मकसद पुराने वोटर रिकॉर्ड से नए मतदाता की मैपिंग यानी लिंक करना आसान बनाना था. हालांकि, 30 सितंबर को चुनाव आयोग ने SIR पूरा हो चुके राज्यों में फॉर्म 6 के साथ जुड़े इस अतिरिक्त  घोषणा पत्र को हटाने का फैसला किया है. यानी यह अतिरिक्त व्यवस्था SIR की जरूरत और प्रक्रिया से जुड़ी थी, इसे सामान्य फॉर्म 6 का स्थायी हिस्सा नहीं माना गया है.

घोषणा पत्र का मकसद क्या था?

आयोग की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक घोषणा पत्र का मुख्य मकसद नए मतदाता को उसके माता-पिता या दादा-दादी के पुराने वोटर रिकॉर्ड से जोड़ने में मदद करना था. अगर कोई नया मतदाता अपने माता-पिता या दादा-दादी से जुड़ी जानकारी घोषणा पत्र में दे देता है और उस जानकारी के आधार पर पुराने रिकॉर्ड में उसकी मैपिंग हो जाती है तो कई मामलों में अलग से दूसरे दस्तावेज देने की जरूरत नहीं पड़ सकती थी.

यानी घोषणा पत्र को एक तरह से पुराने वोटर रिकॉर्ड से संबंध जोड़ने के आसान रास्ते के तौर पर इस्तेमाल किया गया था. आयोग ने पहले स्पष्ट किया था कि फॉर्म 6 में बदलाव नहीं किया गया है, बल्कि SIR के तहत उसके साथ अतिरिक्त घोषणा पत्र जोड़ा गया है.

मैपिंग से क्या फायदा होता है?

SIR में पुराने मतदाता रिकॉर्ड और मौजूदा मतदाता की जानकारी को जोड़ने की कोशिश की जाती है. अगर किसी नए मतदाता का नाम पुराने रिकॉर्ड में सीधे या माता-पिता और दादा-दादी के रिकॉर्ड के जरिए जुड़ जाता है, तो उसकी पहचान और पुराने रिकॉर्ड से संबंध की जांच आसान हो सकती है. अगर मैपिंग नहीं हो पाती है तो बाद की प्रक्रिया में संबंधित मतदाता से पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेज मांगे जा सकते हैं.

इसी वजह से घोषणा पत्र के जरिए पहले ही परिवार से जुड़ी जानकारी लेने की व्यवस्था की गई थी. SIR के नियमों में पुराने रिकॉर्ड से लिंक नहीं होने वाले मतदाताओं के लिए बाद में नोटिस और सत्यापन की प्रक्रिया का भी प्रावधान है.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *