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US का नया बिल, रूस से तेल-गैस खरीदा तो लगेगा 100% टैरिफ! भारत समेत किस पर होगा असर


अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ पास किया. यह दोनों अमेरिकी पार्टियों के समर्थन वाला एक बड़ा प्रतिबंध पैकेज है, जिसका मकसद मॉस्को और तेहरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना है. इसके अलावा ये बिल उन देशों को भी निशाना बनाता है जो ऊर्जा खरीद के जरिए रूस के युद्ध प्रयासों को आर्थिक मदद देना जारी रखे हुए हैं. 

इस बिल का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के सम्मान में रखा गया है, जो इस कानून को बनाने वाले मुख्य लोगों में से एक थे. यह बिल अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों पर टैरिफ और प्रतिबंध लगाने का अधिकार देता है जो बड़ी मात्रा में रूसी तेल और गैस का आयात जारी रखते हैं.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हस्ताक्षर के लिए व्हाइट हाउस भेजे जाने से पहले यह प्रस्ताव अब हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जाएगा. यह कानून पहले के उन प्रस्तावों की तुलना में नरम रुख है, जिनमें रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों से होने वाले आयात पर 500% तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी. इसमें अधिकतम टैरिफ को घटाकर 100% कर दिया गया है. 

अमेरिकी राष्ट्रपति को दिए गए कई अधिकार
इस बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि अगर राष्ट्रीय हित में हो, तो वे इन पेनल्टी को माफ कर सकते हैं, उनमें देरी कर सकते हैं या उनमें बदलाव कर सकते हैं. 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में से एक है, जिससे पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद मॉस्को को तेल से होने वाली कमाई बनाए रखने में मदद मिली है.

प्रस्तावित कानून के तहत नई दिल्ली उन देशों में शामिल हो गई है जिन पर कड़ी नज़र रखी जाएगी. हालांकि अगर यह बिल कानून बन जाता है, तो भारत पर अपने आप टैरिफ नहीं लगेगा. यह बिल अमेरिकी प्रशासन को यह तय करने की काफी छूट देता है कि इन उपायों को लागू किया जाए या नहीं. 

वॉशिंगटन और नई दिल्ली में बढ़ेंगी दूरियां 
जानकारों का कहना है कि कोई भी फैसला लेते समय वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच रणनीतिक साझेदारी को ध्यान में रखा जाएगा, जिसमें इंडो-पैसिफिक में सहयोग, रक्षा, टेक्नोलॉजी और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने की कोशिशें शामिल हैं. अगर टैरिफ लगाए जाते हैं, तो इससे अमेरिका को होने वाले अरबों डॉलर के भारतीय निर्यात पर असर पड़ सकता है, जिसमें इंजीनियरिंग का सामान, दवाएं, केमिकल, टेक्सटाइल और ऑटो पार्ट्स शामिल हैं. 

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