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Xप्लेन: कैसे होती है मानसून की भविष्यवाणी, बारिश अर्थव्यवस्था के लिए क्यों है जरूरी?


भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी ‘स्टेट ऑफ द इकोनॉमी’ रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि अगर दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर रहता है, तो इसका असर देश की आर्थिक वृद्धि और महंगाई के अनुमान पर पड़ सकता है.

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की 29 मई 2026 को जारी संशोधित भविष्यवाणी के मुताबिक, इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून से होने वाली बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना है. मानसून को लेकर यह अनुमान ऐसे समय आया है जब देश की खेती, खाद्य कीमतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसकी भूमिका एक बार फिर चर्चा में है.

लेकिन आखिर मानसून काम कैसे करता है? इसकी भविष्यवाणी कब से की जा रही है? आज मौसम वैज्ञानिक किन तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मानसून इतना महत्वपूर्ण क्यों है? इसे सिलसिलेवार समझते हैं.

मानसून क्या है और भारत में बारिश कैसे होती है?

मानसून मूल रूप से मौसम के साथ हवाओं की दिशा में होने वाला बदलाव है. इसकी सबसे बड़ी वजह जमीन और समुद्र का अलग-अलग गति से गर्म और ठंडा होना है.

गर्मियों में जमीन समुद्र की तुलना में तेजी से गर्म होती है. इससे जमीन के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र बनने लगता है. इसके मुकाबले समुद्र के ऊपर अपेक्षाकृत अधिक दबाव रहता है. नतीजतन, समुद्र से ठंडी और नमी से भरी हवाएं जमीन की ओर बढ़ती हैं. भारत में पहुंचने के बाद यही हवाएं बड़े पैमाने पर बारिश कराती हैं. इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून कहा जाता है.

सर्दियों में स्थिति उलट जाती है. जमीन समुद्र की तुलना में जल्दी ठंडी होती है और हवाएं जमीन से समुद्र की ओर चलने लगती हैं. इन्हें उत्तर-पूर्वी मानसूनी हवाएं कहा जाता है.

भारत में मानसून के दो प्रमुख प्रकार

भारत की मानसूनी व्यवस्था को मुख्य रूप से दो हिस्सों में समझा जाता है, पहला दक्षिण-पश्चिम मानसून और दूसरी उत्तर-पूर्वी मानसून. आइए एक-एक कर के समझते हैं.

दक्षिण-पश्चिम मानसून

दक्षिण-पश्चिम मानसून आमतौर पर जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है. यह केरल के दक्षिण-पश्चिमी तट से भारत में प्रवेश करता है और धीरे-धीरे देश के दूसरे हिस्सों तक फैलता है.

यह भारत का मुख्य मानसून है. गर्मी से राहत देने के अलावा खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी इसका खास महत्व है. खासकर खरीफ फसलों की खेती काफी हद तक इसी बारिश पर निर्भर करती है.

देश में होने वाली कुल वार्षिक बारिश का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा जून से सितंबर के मानसून सीजन में मिलता है. इस अवधि में भारत में होने वाली औसत बारिश का दीर्घकालिक औसत यानी LPA 880 मिलीमीटर है.

LPA क्या होता है?

LPA यानी Long Period Average. इसका इस्तेमाल यह बताने के लिए किया जाता है कि सामान्य तौर पर जून से सितंबर के बीच देश में कितनी बारिश होती है.

इसके लिए लंबी अवधि के दौरान दर्ज बारिश के आंकड़ों का औसत निकाला जाता है. मानसून के पूर्वानुमान में इसी आंकड़े को एक मानक (Benchmark) के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

उत्तर-पूर्वी मानसून

उत्तर-पूर्वी मानसून आमतौर पर अक्टूबर से दिसंबर के बीच सक्रिय रहता है. इसका नाम हवाओं की दिशा के आधार पर पड़ा है, जो उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर चलती हैं.

इसका असर मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत में देखने को मिलता है. दक्षिण-पश्चिम मानसून की तुलना में यह कम व्यापक होता है, लेकिन दक्षिण भारत के कई हिस्सों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी, कराईकल, तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा और यनम में इसका खास असर होता है. अक्टूबर से दिसंबर के बीच तमिलनाडु में होने वाली वार्षिक बारिश का लगभग 43 प्रतिशत हिस्सा इसी मानसून से मिलता है.

उत्तर-पूर्वी मानसून को शीतकालीन मानसून, लौटता मानसून (Retreating Monsoon) या रिवर्स मानसून भी कहा जाता है.

भारत में मानसून की भविष्यवाणी कब शुरू हुई?

भारत में मानसून की बारिश का व्यवस्थित पूर्वानुमान लगाने की कोशिश 1877 में शुरू हुई. यह भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की स्थापना से करीब दो साल पहले की बात है.

उस समय ब्रिटिश मौसम विज्ञानी और जीवाश्म विज्ञानी हेनरी फ्रांसिस ब्लैनफोर्ड (Henry Francis Blanford) भारत सरकार के मौसम विज्ञान रिपोर्टर थे.

1876-77 के दौरान पड़े अकाल और उसके बाद फसल खराब होने से मानसून को समझने की जरूरत और बढ़ गई. 1877 तक अकाल का असर देश के बड़े हिस्से में दिखाई देने लगा था. प्रशासन के लिए यह समझना जरूरी हो गया था कि मानसून कब आएगा और बारिश देश के अलग-अलग हिस्सों में किस तरह होगी.

1882 से 1885 के बीच ब्लैनफोर्ड ने मानसून की शुरुआती प्रायोगिक भविष्यवाणियां कीं. उन्होंने हिमालय में होने वाली बर्फबारी और भारत में बाद में होने वाली मानसूनी बारिश के बीच संबंध तलाशने की कोशिश की.

ब्लैनफोर्ड की थ्योरी क्या थी?

ब्लैनफोर्ड का अनुमान हिमालय में सर्दियों और वसंत के दौरान जमा होने वाली बर्फ तथा उसके बाद भारत में होने वाली गर्मियों की बारिश के बीच संबंध पर आधारित था.

उनका मानना था कि हिमालय में बर्फ की मात्रा और उसके पिघलने का असर बाद में मानसून पर पड़ सकता है. IMD के अनुसार, यह भारत में आधुनिक मौसम विज्ञान के शुरुआती महत्वपूर्ण विचारों में से एक था.

ब्लैनफोर्ड के बाद क्या हुआ?

मई 1889 में ब्लैनफोर्ड के बाद सर जॉन एलियट को भारत का पहला Director General of Indian Observatories नियुक्त किया गया. यह पद आज के IMD प्रमुख के पद के समान माना जाता है.

एलियट ने ब्लैनफोर्ड के काम को आगे बढ़ाया. उन्होंने हिमालय की बर्फबारी के साथ-साथ अप्रैल-मई के स्थानीय मौसम, हिंद महासागर और ऑस्ट्रेलिया की परिस्थितियों जैसे दूसरे कारकों को भी मानसून के पूर्वानुमान में शामिल करने की कोशिश की.

हालांकि, इन शुरुआती तरीकों से सूखे या उसके बाद पड़ने वाले अकाल का सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सका. 1899-1900 का भारतीय अकाल इसका बड़ा उदाहरण था. इसमें अनुमान के मुताबिक करीब 4.5 करोड़ से 5 करोड़ लोग प्रभावित हुए.

सर गिल्बर्ट वॉकर ने मानसून की भविष्यवाणी में क्या बदला?

1904 में सर गिल्बर्ट वॉकर ने मानसून पूर्वानुमान की जिम्मेदारी संभाली. उन्होंने मानसून की बारिश और वैश्विक वायुमंडलीय, समुद्री तथा भूमि संबंधी परिस्थितियों के बीच सांख्यिकीय संबंधों का अध्ययन किया.

वॉकर ने मानसून के पूर्वानुमान के लिए 28 पैरामीटर या संकेतक पहचाने. इनमें वैश्विक वायुदाब में होने वाले बदलाव से जुड़े प्रमुख पैटर्न भी शामिल थे.

उनका एक महत्वपूर्ण योगदान यह था कि उन्होंने पूरे भारत को मानसून के लिहाज से एक समान क्षेत्र नहीं माना. उन्होंने देश को तीन हिस्सों—Peninsula, Northeast और Northwest India—में बांटकर पूर्वानुमान पर काम किया.

आजादी के बाद मानसून की भविष्यवाणी कैसे बदली?

1987 तक IMD ने वॉकर के मॉडल में कई बदलाव करते हुए उसी आधार पर मानसून का पूर्वानुमान जारी किया. लेकिन समय के साथ मॉडल में शामिल कई पैरामीटर कमजोर पड़ गए. मानसून के साथ उनका संबंध पहले जैसा नहीं रहा.

IMD ने मॉडल में बदलाव किए, लेकिन पूर्वानुमान की सटीकता में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ.

1988 में IMD ने मानसून का परिचालन पूर्वानुमान जारी करने के लिए पावर रिग्रेशन मॉडल अपनाया. इसके बाद 2003 में वैज्ञानिक वी.के. गोविंदराजन के नेतृत्व में विकसित मॉडल के आधार पर दो नए मानसून पूर्वानुमान मॉडल पेश किए गए.

समूह पूर्वानुमान प्रणाली ने कैसे बदली तस्वीर?

2007 में IMD ने Statistical Ensemble Forecasting System (SEFS) अपनाया.

इस प्रणाली में मानसून का अनुमान लगाने के लिए अलग-अलग संकेतकों और संभावित परिस्थितियों से मिलने वाले नतीजों को एक साथ देखा जाता है. फिर इन सभी परिणामों को मिलाकर एक सामूहिक पूर्वानुमान तैयार किया जाता है.

इससे पूर्वानुमान की सटीकता में सुधार हुआ.

1995-2006: औसत त्रुटि 7.94% LPA
2007-2018: औसत त्रुटि घटकर 5.95% LPA

यानी इस अवधि में पूर्वानुमान की औसत त्रुटि करीब 2 प्रतिशत अंक कम हुई.

मानसून की भविष्यवाणी में आधुनिक तकनीक की भूमिका

मानसून पूर्वानुमान में एक और बड़ा बदलाव 2012 में मानसून मिशन कपल्ड फोरकास्टिंग सिस्टम (MMCFS) की शुरुआत के साथ आया. यह एक कपल्ड डायनेमिक सिस्टम मॉडल है. इसमें समुद्र, वायुमंडल और जमीन से जुड़े आंकड़ों को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है. इसका उद्देश्य मानसून की अधिक सटीक भविष्यवाणी करना है.

इसके बाद 2021 में मल्टी-मॉडल एनसेंबल (MME) प्रणाली शुरू की गई. इसमें दुनिया के अलग-अलग जलवायु पूर्वानुमान और शोध केंद्रों से प्राप्त युग्मित वैश्विक जलवायु मॉडल (CGCMs) के आंकड़ों को शामिल किया जाता है. इसमें भारत का अपना MMCFS मॉडल भी शामिल है.

2007 में SEFS और 2021 में MME जैसी प्रणालियों के आने के बाद IMD के मानसून पूर्वानुमान की सटीकता में सुधार हुआ है. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने भी फरवरी में संसद को इसकी जानकारी दी थी.

मानसून को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक

भारतीय मानसून सिर्फ भारत के ऊपर होने वाली मौसमी गतिविधियों से तय नहीं होता. समुद्र और वायुमंडल में होने वाली कई दूरगामी घटनाओं का भी इस पर असर पड़ता है.

इनमें प्रमुख हैं:

-अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO)
-मैडेन-जूलियन दोलन (MJO)
-इंटर-ट्रॉपिकल कन्वर्जेंस ज़ोन (ITCZ)
-हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD)

Xप्लेन: कैसे होती है मानसून की भविष्यवाणी, बारिश अर्थव्यवस्था के लिए क्यों है जरूरी?

इन घटनाओं के कारण बारिश के समय, उसकी तीव्रता और देश के अलग-अलग हिस्सों में उसके वितरण में बदलाव हो सकता है.

भारतीय मानसून को अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा क्यों कहा जाता है?

भारतीय मानसून का असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है. इसका सीधा संबंध खेती, ग्रामीण आय, खाद्य उत्पादन, मांग और आर्थिक गतिविधियों से है.

ब्रिटिश मौसम विज्ञानी सर गिल्बर्ट वॉकर ने 1909 में भी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए मानसून के महत्व को रेखांकित किया था.

भारत की करीब 64 प्रतिशत आबादी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है. ऐसे में मानसून की बारिश का प्रदर्शन किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए काफी मायने रखता है.

मानसून मिशन क्या है?

मानसून मिशन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) का एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है. इसका उद्देश्य मानसून की अधिक सटीक भविष्यवाणी के लिए आधुनिक जलवायु पूर्वानुमान प्रणाली विकसित करना है.

मानसून और खेती का रिश्ता

भारत की केवल 55 प्रतिशत कृषि भूमि के पास सिंचाई की सुविधा है. बाकी 45 प्रतिशत कृषि भूमि बारिश पर निर्भर है. इसका मतलब है कि देश के एक बड़े हिस्से में खेती की सफलता सीधे मानसून पर निर्भर करती है.

अच्छा मानसून रहने पर कृषि उत्पादन और किसानों की आय को फायदा हो सकता है. इसके उलट कमजोर मानसून से फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है और किसानों की आय पर दबाव पड़ सकता है.

मानसून और GDP का क्या संबंध है?

अच्छे मानसून का असर खेती से आगे जाता है. अच्छा मानसून यानी बेहतर कृषि उत्पादन और किसानों की आय में बढ़ोतरी. इससे मांग में वृद्धि होती है और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है.

Xप्लेन: कैसे होती है मानसून की भविष्यवाणी, बारिश अर्थव्यवस्था के लिए क्यों है जरूरी?

अगर मानसून कमजोर रहता है तो स्थिति इसके उलट हो सकती है. कृषि उत्पादन घट सकता है, खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है और ग्रामीण इलाकों में मांग कमजोर पड़ सकती है. इसी वजह से मानसून को भारत की अर्थव्यवस्था की ‘जीवनरेखा’ कहा जाता है.

भारत की फसल विविधता में मानसून की भूमिका

भारत में बारिश का वितरण हर जगह एक जैसा नहीं है. उत्तर-पूर्व के अत्यधिक बारिश वाले इलाकों से लेकर दक्कन के अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्रों तक मौसम और बारिश में बड़ा अंतर है.

यही विविधता अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग फसलों की खेती को संभव बनाती है. किसान स्थानीय मौसम और बारिश के हिसाब से फसल का चुनाव करते हैं. चावल, गेहूं, दालें, कपास, गन्ना, बाजरा और मसाले जैसी कई फसलें देश के अलग-अलग हिस्सों में उगाई जाती हैं.

दक्षिण-पश्चिम मानसून मुख्य रूप से खरीफ फसलों के लिए पानी उपलब्ध कराता है. दूसरी ओर, पश्चिमी विक्षोभ सर्दियों में उत्तर भारत के कई हिस्सों में बारिश लाते हैं, जिससे गेहूं, सरसों और दूसरी रबी फसलों को फायदा होता है. इसलिए भारतीय कृषि के लिए सिर्फ मानसून ही नहीं, बल्कि पश्चिमी विक्षोभ जैसी दूसरी मौसमी प्रणालियां भी महत्वपूर्ण हैं.

भारत में सालभर खेती कैसे संभव होती है?

भारत के अधिकांश हिस्सों में साल के अलग-अलग समय पर खेती की जा सकती है. हालांकि, हिमालयी क्षेत्रों में कड़ाके की सर्दी खेती के मौसम को सीमित करती है.

दुनिया के कई समशीतोष्ण देशों की तुलना में भारत का खेती का मौसम लंबा है. इसकी एक वजह देश की मानसूनी जलवायु और अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग मौसम का होना है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मानसून का असर

मानसून का असर खेत से निकलकर गांव के बाजार तक पहुंचता है. अच्छी बारिश से फसल बेहतर होती है. फसल अच्छी होने पर किसानों की आय बढ़ सकती है. आय बढ़ने पर ग्रामीण इलाकों में खर्च भी बढ़ता है. इससे स्थानीय दुकानों, कारोबार और सेवाओं को फायदा मिलता है.



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