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Xप्लेन: क्या भारत से खत्म हो रही है छुआछूत? आंकड़े, कानून और जमीनी हकीकत


भारतीय संविधान ने 1950 में ही छुआछूत को खत्म घोषित कर दिया था. इसके बावजूद यह सवाल आज भी प्रासंगिक है कि क्या समाज से यह कुप्रथा वास्तव में समाप्त हो चुकी है? आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि छुआछूत से जुड़े मामलों की संख्या कम दिखाई देती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल दर्ज मामलों के आधार पर सामाजिक बदलाव का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा. इसकी वजह यह है कि बड़ी संख्या में मामले दर्ज ही नहीं हो पाते या फिर उन्हें दूसरे कानूनों के तहत दर्ज किया जाता है.

NCRB के आंकड़े क्या कहते हैं?

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) अपनी वार्षिक रिपोर्ट ‘क्राइम इन इंडिया’ में अपराधों के आंकड़े जारी करता है. फिलहाल 2023 तक की रिपोर्ट उपलब्ध है.

Protection of Civil Rights (PCR) Act, 1955 के तहत दर्ज मामलों की संख्या इस प्रकार रही है:

2020: 25 मामले
2021: 24 मामले
2022: 13 मामले
2023: 24 मामले

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि 2022 में मामलों में बड़ी गिरावट दर्ज हुई थी, लेकिन 2023 में संख्या फिर बढ़कर 24 हो गई. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि छुआछूत के मामले लगातार कम हो रहे हैं या यह समस्या समाप्ति की ओर है.

संविधान में क्या प्रावधान है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 छुआछूत को पूरी तरह समाप्त घोषित करता है. इसके अनुसार किसी भी व्यक्ति के साथ जाति के आधार पर छुआछूत करना या उसके कारण किसी नागरिक अधिकार से वंचित करना कानूनन अपराध है. यह प्रावधान समानता और गरिमा के संवैधानिक अधिकार को मजबूत करता है.

छुआछूत रोकने के लिए कौन-कौन से कानून हैं?

1. प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (PCR) एक्ट, 1955

यह कानून छुआछूत की प्रथा और उससे जुड़े भेदभाव को अपराध घोषित करता है. यदि कोई व्यक्ति किसी नागरिक को जाति के आधार पर सार्वजनिक स्थान, धार्मिक स्थल, जल स्रोत या अन्य सुविधाओं के उपयोग से रोकता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है.

Xप्लेन: क्या भारत से खत्म हो रही है छुआछूत? आंकड़े, कानून और जमीनी हकीकत

2. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989

यह कानून अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लोगों पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए बनाया गया है. इसे अधिक प्रभावी बनाने के लिए 2016 और 2018 में संशोधन भी किए गए. जातिगत अपमान, सामाजिक बहिष्कार, हिंसा और अन्य गंभीर अपराधों के मामलों में अक्सर इसी कानून के तहत मुकदमे दर्ज किए जाते हैं.

इन कानूनों की निगरानी कौन करता है?

केंद्र सरकार ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित की है. इसमें जनजातीय मामलों के मंत्री, गृह मंत्रालय, कानून मंत्रालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और कुछ गैर-सरकारी सदस्य शामिल होते हैं.

यह समिति राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में PCR Act और SC/ST (Prevention of Atrocities) Act के क्रियान्वयन की समीक्षा करती है और सुधार के लिए सुझाव देती है.

सरकार क्या करती है?

छुआछूत और जातिगत भेदभाव रोकने के लिए केंद्र सरकार समय-समय पर कई कदम उठाती है. जैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ नियमित समीक्षा बैठकें आयोजित की जाती हैं, राज्यों को कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और जातिगत भेदभाव रोकने के निर्देश दिए जाते हैं, कानूनों के पालन को मजबूत बनाने के लिए समय-समय पर एडवाइजरी जारी की जाती है, जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से प्रशासनिक व्यवस्था को संवेदनशील बनाने का प्रयास किया जाता है.

अदालतों में कितने मामले लंबित हैं?

NCRB की 2023 रिपोर्ट के अनुसार न्यायिक प्रक्रिया अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत 3,07,355 मामले अदालतों में लंबित हैं. Protection of Civil Rights Act, 1955 के तहत 965 मामले लंबित हैं.  इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में पीड़ितों को न्याय मिलने में लंबा समय लग रहा है.

क्या केवल आंकड़े पूरी तस्वीर बताते हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि नहीं. PCR Act के तहत दर्ज मामलों की संख्या कम होने का मतलब यह नहीं है कि समाज से छुआछूत समाप्त हो गई है. इसके पीछे कई कारण हैं जैसे- कई पीड़ित सामाजिक दबाव, डर, आर्थिक निर्भरता या पुलिस तक सीमित पहुंच के कारण शिकायत दर्ज ही नहीं कराते. बड़ी संख्या में घटनाएं SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज होती हैं, इसलिए केवल PCR Act के आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं दिखाते. वहीं कई मामलों में सामाजिक समझौते या स्थानीय दबाव के कारण कानूनी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाती.

जमीनी हकीकत क्या कहती है?

देश के कई हिस्सों से आज भी जातिगत भेदभाव की घटनाएं सामने आती रहती हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक जल स्रोतों के उपयोग, नाई की दुकान, सामूहिक भोज और श्मशान घाट के इस्तेमाल को लेकर विवादों की खबरें मिलती रहती हैं.

शिक्षा संस्थानों में भी जातिगत भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. विभिन्न अध्ययनों में कुछ राज्यों के स्कूलों में विद्यार्थियों के साथ अलग व्यवहार, बैठने की व्यवस्था और सामाजिक दूरी जैसी शिकायतें दर्ज की गई हैं.

इसी तरह सामाजिक शोध बताते हैं कि लोगों के व्यवहार में बदलाव जरूर आया है, लेकिन विवाह, सामाजिक रिश्तों और पारिवारिक स्तर पर जाति का प्रभाव अब भी काफी मजबूत बना हुआ है. कई सर्वेक्षणों में लोगों ने स्वीकार किया कि उनके परिवारों में किसी न किसी रूप में छुआछूत या जातिगत दूरी का पालन अब भी किया जाता है.

क्या Gen Z और Gen Alpha भी छुआछूत का बोझ ढोएंगी?

इस सवाल का उत्तर पूरी तरह “हां” या “नहीं” में देना आसान नहीं है. एक ओर आज की नई पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक शिक्षित, डिजिटल और विविध सामाजिक वातावरण में रह रही है. सोशल मीडिया, शिक्षा, संवैधानिक मूल्यों और कानूनी जागरूकता ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने का दायरा बढ़ाया है.

दूसरी ओर, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जातिसूचक टिप्पणियां, सामाजिक मीडिया पर नफरत फैलाने वाली भाषा, विवाह में जातिगत प्राथमिकताएं और कई ग्रामीण क्षेत्रों में जारी सामाजिक भेदभाव यह संकेत देते हैं कि समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है.

इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि नई पीढ़ी दोहरी भूमिका निभा रही है. उसे एक ओर समाज से मिली पुरानी सोच का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर वही पीढ़ी इसे बदलने की सबसे बड़ी संभावना भी है.



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