NEET-UG पेपर लीक के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) आंदोलन की कामयाबी का शोर अभी थमा नहीं था कि एक नया नारा गूंजने लगा, ‘धर्मेंद्र प्रधान गए, अबकी बार गडकरी बाहर!’ दरअसल CJP के समापन के ठीक दो दिन बाद ही एक नए तरह के आंदोलन ने जोर पकड़ लिया है, जिसका केंद्र है E20 फ्यूल. सड़कों से लेकर संसद तक और इंस्टाग्राम से लेकर टाउन हॉल तक, यह मुद्दा तेजी से पांव पसार रहा है. क्या E20 के खिलाफ आक्रोश CJP की तरह एक बड़ा जन आंदोलन बन पाएगा…
आखिर E20 फ्यूल का विरोध खत्म क्यों नहीं हो रहा?
E20 एक तरह का पेट्रोल है जिसमें 20% इथेनॉल (गन्ने और मक्का जैसी फसलों से बना बायोफ्यूल) और 80% पारंपरिक पेट्रोल मिला होता है. केंद्र सराकर ने तेल आयात घटाने, प्रदूषण कम करने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए इसे अप्रैल 2025 से देश के हर पेट्रोल पंप पर ‘स्टैंडर्ड फ्यूल’ बना दिया. यहीं से पेच फंसता है, क्योंकि भारत में 75% से ज्यादा गाड़ियां तकनीकी रूप से E20 के लिए डिजाइन ही नहीं की गई हैं.
पुरानी गाड़ियों के मालिकों की शिकायत है कि इस फ्यूल से माइलेज में 4 से 12% तक की गिरावट आ रही है और इंजन के पुर्जों पर बुरा असर पड़ रहा है. सरकारी आंकड़ों में भी 3-3.5% माइलेज घटने की बात कही गई है.
विवाद तब और गहरा गया जब 18 मई 2026 को अदालत ने E20 से इंजन खराब होने के मामले में कार मालिक के पक्ष में फैसला सुनाया. लोगों का गुस्सा इस बात से है कि उन्हें E20 और शुद्द फ्यूल में से चुनने का ऑप्शन नहीं दिया जा रहा है. जो शुद्ध पेट्रोल मौजूद है, वो 40-50% तक महंगा है.
तीन मोर्चों पर एक साथ हो रही है लामबंदी
इस असंतोष ने अब एक संगठित रूप लेना शुरू कर दिया है. यह लड़ाई तीन अलग-अलग मोर्चों पर लड़ी जा रही है और तीनों की रणनीति एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा है:
1. अरविंद केजरीवाल का ‘नेशनल टाउन हॉल’
दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे को राजनीतिक धार देते हुए 1 अगस्त को दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में ‘नेशनल टाउन हॉल अगेंस्ट E20’ बुलाने का ऐलान किया है. केजरीवाल ने सीधे तौर पर CJP आंदोलन का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री से कहा है कि वे इस मामले को तब तक सुलझा लें, जब तक यह CJP जितना बड़ा न हो जाए.
केजरीवाल की ऑनलाइन पिटीशन पर 2 लाख से ज्यादा लोग हस्ताक्षर कर चुके हैं. टाउन हॉल के बाद वह इसे लेकर सीधे PM आवास जाने की योजना बना रहे हैं.
2. दिल्ली ट्रांसपोर्ट यूनियनों का संसद मार्च
दिल्ली टैक्सी एंड टूरिस्ट ट्रांसपोर्टर्स एंड टूर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ने 4 अगस्त को संसद मार्च का ऐलान किया है. संघ के अध्यक्ष संजय सम्राट का कहना है कि उनका मकसद सांसदों को जगाना है जो इस मुद्दे पर सो रहे हैं. यह बेहद दिलचस्प है कि ट्रांसपोर्ट यूनियनें जानबूझकर Gen Z का सहारा ले रही हैं.
सम्राट ने माना कि वे और उनके साथी तकनीक में माहिर नहीं हैं, इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को सोशल मीडिया पर प्रचार की जिम्मेदारी दी है. यूनियन की सबसे बड़ी मांग E20 नीति की स्वतंत्र वैज्ञानिक समीक्षा और पेट्रोल पंपों पर ऑप्शन देने की है, न कि पूरी तरह से E20 पर प्रतिबंध लगाने की.
3. ‘E20 जनता पार्टी’ का सोशल मीडिया पर तूफान
यह तीसरा और शायद सबसे अनोखा मोर्चा है. CJP के बंद होने के फौरन बाद इंस्टाग्राम और X पर ‘E20 जनता पार्टी’ नाम का एक पेज वायरल हुआ, जिसने महज कुछ ही दिनों में 3.28 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स बटोर लिए. यह पेज खुद को कोई राजनीतिक दल नहीं बताता, बल्कि E20 ईंधन के खिलाफ एक जन अभियान बताता है. इसकी मांगें बिल्कुल साफ हैं:
- E20 और शुद्ध पेट्रोल के बीच चुनने की आजादी
- केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का इस्तीफा
- माइलेज पर पड़ने वाले असर की स्वतंत्र जांच.
CJP की तर्ज पर यह अभियान भी मीम्स, शॉर्ट वीडियो और व्यंग्य का भरपूर इस्तेमाल कर रहा है. इसके वायरल होने की रफ्तार ने सबको चौंका दिया है.
तो क्या ये CJP जैसा बड़ा आंदोलन बनेगा?
इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है:
- एक तरफ E20 का मुद्दा NEET पेपर लीक से कहीं ज्यादा व्यापक है, क्योंकि यह हर उस शख्स को प्रभावित करता है जो गाड़ी चलाता है. सोशल मीडिया पर तेजी से बढ़ता जनाधार और सड़कों पर उतरने को तैयार ट्रांसपोर्ट यूनियनें यह संकेत देती हैं कि आक्रोश गहरा है.
- दूसरी तरफ तीनों मोर्चे फिलहाल एक-दूसरे से अलग-थलग हैं. ट्रांसपोर्ट यूनियनों ने साफ कहा है कि उनका E20 जनता पार्टी या किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है. इसके अलावा खुद नितिन गडकरी ने इस नीति से खुद को अलग करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया है.
गडकरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करने की इजाजत ले ली है. उनका कहना है कि E20 नीति उनके मंत्रालय के अधीन नहीं, बल्कि पेट्रोलियम मंत्रालय के अधीन आती है. इस बयान ने आंदोलनकारियों के निशाने को थोड़ा धुंधला जरूर कर दिया है.
फिलहाल सबकी निगाहें 1 और 4 अगस्त की तारीखों पर टिकी हैं. अगर ये तीनों धाराएं एक साथ आकर बहने लगीं, तो यह आंदोलन CJP से भी बड़ा रूप ले सकता है. अगर ये अलग-अलग रहीं, तो सरकार के लिए इसे संभालना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा.
E20 फ्यूल पर बीजेपी सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार ने E20 को एडवांस्ड, सुरक्षित और क्लीनर ईंधन बताया है. पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा है कि कार निर्माताओं और उपभोक्ताओं दोनों ने इस फ्यूल पर हामी भरी है. सरकार का कहना है कि किसी भी लैब टेस्ट या रियल-वर्ल्ड यूसेज से साबित नहीं हुआ कि E20 से इंजन को कोई नुकसान या घिसाव होता है.
सरकार ने 27 जुलाई 2026 को संसद में कहा कि उसने यह आकलन नहीं किया है कि देश में कितनी गाड़ियां पूरी तरह E20-कंपैटिबल हैं. इससे यह सवाल उठता है कि बिना आकलन के इसे अनिवार्य कैसे कर दिया गया. मारुति सुजुकी ने अपनी तरफ से कहा है कि कंपनी ने डेढ़ करोड़ से ज्यादा पुरानी गाड़ियों की सर्विसिंग की जो E20-कंपैटिबल नहीं थीं. लेकिन उनमें ईंधन से जुड़ी कोई खराबी नहीं मिली और यह सर्वे कंपनी का अपना था.
नितिन गडकरी ने E20 से पल्ला झाड़ा
सबसे बड़ा खुलासा तो यह हुआ कि नितिन गडकरी ने खुद को E20 नीति से अलग कर लिया है. उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि सोशल मीडिया पर AI-जनरेटेड डीपफेक वीडियो और पोस्ट्स झूठे तरीके से उन्हें E20 कार्यक्रम से जोड़ रहे हैं. गडकरी पर आरोप लग रहे हैं कि उन्हें और उनके परिवार को इससे फायदा हुआ. बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन्हें मेटा, X, गूगल और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करने की अनुमति दे दी है.
गडकरी का दावा है कि E20 इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम उनके मंत्रालय (सड़क परिवहन) के अधीन नहीं आता, बल्कि पेट्रोलियम मंत्रालय के अधीन आता है, इसलिए वे इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं. वहीं कांग्रेस सांसद हिबी ईडन ने 28 जुलाई 2026 को लोकसभा में E20 के राष्ट्रव्यापी रोलआउट के खिलाफ स्थगन प्रस्ताव पेश किया है. इससे यह साफट है कि विपक्ष भी इस मुद्दे को संसद में उठाने की कोशिश कर रहा है.
