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झगड़े में पत्नी को ‘बांझ’ कहना क्रूरता नहीं, HC का फैसला


इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने वैवाहिक विवादों और दहेज प्रताड़ना के मामलों से जुड़ा एक बेहद अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि संतान न होने को लेकर हुई आपसी कहासुनी के दौरान पति द्वारा अपनी पत्नी को ‘बांझ’ (निसंतान) कह देना, अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498-ए के तहत ‘क्रूरता’ का अपराध नहीं माना जा सकता. इस महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने पति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को भी पूरी तरह से रद्द कर दिया है.

न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पति हिरेंद्र कुशवाहा द्वारा दायर की गई याचिका को स्वीकार कर लिया. कोर्ट ने उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 498-ए (विवाहिता के साथ क्रूरता), धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), धारा 504 (जानबूझकर अपमान करना) और धारा 506 (आपराधिक धमकी) के साथ-साथ दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत चल रहे मुकदमे को निरस्त कर दिया. यह पूरा विवाद लखनऊ के गाजीपुर पुलिस स्टेशन से जुड़ा हुआ था.

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बच्चा न होने पर प्रताड़ना

जानकारी के अनुसार, इस जोड़े की शादी दिसंबर 2015 में हुई थी. विवाह के कई साल बीत जाने के बाद भी उनके कोई संतान नहीं हुई, जिसके चलते दोनों के बीच तनाव रहने लगा. पत्नी का आरोप था कि उसे बच्चा न पैदा कर पाने के लिए ताने दिए जाते थे और 23 नवंबर 2020 को विवाद के दौरान उसके साथ मारपीट कर उसे कमरे में बंद कर दिया गया. पत्नी ने अपनी शिकायत में ससुर और देवर पर दुष्कर्म जैसे संगीन आरोप भी लगाए थे. लेकिन, मजिस्ट्रेट ने प्रारंभिक जांच के बाद केवल पति को आरोपी मानते हुए समन जारी किया था, जिसे पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.

‘बांझ कहना असंवेदनशील, लेकिन धारा 504 का अपराध नहीं’

हाईकोर्ट ने पूरे मामले का अवलोकन करने के बाद कहा कि यह विवाद मुख्य रूप से संतान न होने से उत्पन्न हताशा और वैवाहिक झगड़े का ही परिणाम है. अदालत ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि पत्नी को ‘बांझ’ कहना निश्चित रूप से असंवेदनशील और सामाजिक रूप से निंदनीय है, लेकिन कानूनी तौर पर यह आईपीसी की धारा 504 (शांति भंग करने के इरादे से अपमान) के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है. केवल अपशब्द या अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल तब तक धारा 504 का अपराध नहीं बनता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि ऐसा जानबूझकर शांति भंग करने या कोई अन्य अपराध भड़काने के लिए किया गया था.

दहेज की मांग बाद में जोड़ी गई, प्रक्रिया का दुरुपयोग

पीठ ने यह भी पाया कि पत्नी द्वारा दी गई मूल शिकायत (FIR) में दहेज की मांग का कोई भी जिक्र नहीं था. पुलिस को दिए गए बाद के बयान में इस आरोप को जानबूझकर जोड़ा गया. अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि बाद के बयानों से मूल शिकायत की कमियों की भरपाई नहीं की जा सकती. इन सभी आरोपों को सामान्य और ठोस आधार से रहित मानते हुए अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि इस मुकदमे को आगे जारी रखना केवल ‘आपराधिक न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग’ (Abuse of process of law) होगा, इसलिए इसे तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाता है.

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