Asmita Dey Share Story With ABP: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत को पहली बार जूडो में गोल्ड मेडल मिला. त्रिपुरा की रहने वाली भारत की अस्मिता डे ने इतिहास रचते हुए जूडो की 48KG केटेगरी में गोल्ड मेडल जीता. पिता के साइकिल मैकेनिक होने के बावजूद भी अस्मिता ने अपनी आर्थिक तंगी को आड़े नहीं आने दिया और देश का मान बढ़ाया. CWG में गोल्ड जीतकर इतिहास रचने वाली अस्मिता डे ने ABP News Consultant रवीश बिष्ट से खास बातचीत की.
सवाल: सबसे पहले गोल्ड मेडल जीतने की बहुत-बहुत बधाई. अब आप कॉमनवेल्थ गेम्स की गोल्ड मेडलिस्ट बन चुकी हैं. कैसा महसूस हो रहा है?
अस्मिता डे: बहुत अच्छा महसूस हो रहा है. जब मैं यहां से ग्लास्गो के लिए निकली थी, तभी मैंने तय कर लिया था कि मुझे गोल्ड मेडल जीतकर ही लौटना है. यही मेरा सपना और लक्ष्य था. अब जब वो सपना पूरा हुआ है तो बेहद खुशी हो रही है. हालांकि, मैं इसे अपनी मंजिल नहीं मानती. यह सिर्फ एक लक्ष्य था, अभी मुझे बहुत आगे जाना है.
सवाल: नॉर्थ ईस्ट से बॉक्सिंग, वेटलिफ्टिंग और दूसरे खेलों में कई खिलाड़ी निकलते हैं, लेकिन आपने जूडो कैसे चुना?
अस्मिता डे: इसकी कहानी काफी दिलचस्प है. मेरे ताऊजी ने मेरे पापा को फोन करके बताया था कि अगरतला के एक स्पोर्ट्स स्कूल में ट्रायल्स चल रहे हैं. उन्होंने कहा कि मुझे वहां भेजा जाए. मैं ट्रायल देने गई और मेरा चयन हो गया. उस समय मेरी उम्र करीब 11-12 साल थी. वहीं से मेरा जूडो की ओर रुझान बढ़ा और धीरे-धीरे मैंने तय कर लिया कि इसी खेल में अपना करियर बनाऊंगी.
सवाल: कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए आपने तैयारी कैसे की?
अस्मिता डे: मैंने जर्मनी जाकर ट्रेनिंग की. वहां काफी समय तक हाई लेवल प्रैक्टिस की, जिससे मेरी तकनीक और फिटनेस दोनों में काफी सुधार हुआ. जर्मनी से लौटने के बाद भारत में भी लगातार ट्रेनिंग जारी रखी. उसी मेहनत का नतीजा है कि मैं कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीत सकी.
सवाल: भारत में जूडो अभी इतना बड़ा खेल नहीं माना जाता. ऐसे में आपको यह भरोसा कैसे आया कि आप गोल्ड मेडल जीत सकती हैं?
अस्मिता डे: यह भरोसा मेरी मेहनत और सेल्फ बिलीफ से आया. मुझे अपनी तैयारी पर पूरा विश्वास था. मुझे लगता था कि चाहे सामने कोई भी खिलाड़ी हो, अगर मैं अपना बेस्ट दूंगी तो उसे हरा सकती हूं. मेरी ट्रेनिंग बहुत अच्छी हुई थी और उसी ने मुझे आत्मविश्वास दिया.
सवाल: फाइनल में कनाडा की खिलाड़ी के खिलाफ मुकाबला काफी रोमांचक रहा. शुरुआती दौर में आप पिछड़ रही थीं. फिर आपने वापसी कैसे की?
कोच की आवाज से पलटी बाजी
अस्मिता डे: हां, शुरुआत में मैं पीछे चल रही थी और एक समय ऐसा लगा कि शायद गोल्ड मेडल हाथ से निकल जाएगा. तभी मेरे कोच लगातार मुझे आवाज देकर कह रहे थे, “अस्मिता, तुम जीत सकती हो. हार के बारे में मत सोचो, गोल्ड हमें जीतना ही है.”
उनकी बातें सुनकर मेरे अंदर एक अलग ही आत्मविश्वास आ गया. मैंने फिर लगातार अंक जुटाने शुरू किए. चार मिनट तक दोनों के अंक बराबर रहे. इसके बाद मुकाबला गोल्डन पॉइंट में गया, जहां जो पहला अंक बनाता है वही विजेता होता है. सौभाग्य से अगला पॉइंट मैंने बनाया और इसी तरह मैंने गोल्ड मेडल जीत लिया.
सवाल: गोल्ड जीतने के बाद आपने सबसे पहले किसे कॉल किया?
अस्मिता डे: सबसे पहले मैंने अपनी मां को फोन किया. लेकिन उस पल मैंने अपने पापा को सबसे ज्यादा मिस किया. दिसंबर में उनका निधन हो गया था. मेरे पापा साइकिल मैकेनिक थे, लेकिन उन्होंने हमेशा मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. आज अगर वो होते तो शायद सबसे ज्यादा खुश वही होते.
सवाल: अब आगे का लक्ष्य क्या है? एशियन गेम्स में जापान और दक्षिण कोरिया जैसे मजबूत देशों के खिलाड़ी भी होंगे.
अस्मिता डे: मैंने अगले लक्ष्य के लिए अभी से तैयारी शुरू कर दी है. मैं पहले भी जापान और दक्षिण कोरिया के कुछ शीर्ष खिलाड़ियों को हरा चुकी हूं. इसलिए मेरा पूरा ध्यान सिर्फ अपनी ट्रेनिंग पर रहेगा, विरोधी पर नहीं. अगर मैं अपनी तैयारी सही रखूं तो मुझे पूरा विश्वास है कि एशियन गेम्स में भी भारत के लिए मेडल जीत सकती हूं.
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