- बच्चों के स्वास्थ्य, मोबाइल-AI उपयोग पर कोर्ट ने चिंता जताई.
राजस्थान हाईकोर्ट ने बच्चों और जेन-जी के स्वास्थ्य को लेकर सख्त रुख अपनाया है. कोर्ट ने स्कूलों के अंदर और स्कूल गेट से 50 मीटर के दायरे में जंक फूड की बिक्री पर रोक के नियमों को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने हर स्कूल में फूड सेफ्टी एंड न्यूट्रिशन कमेटी बनाने को भी कहा है, जो बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और पोषण पर नजर रखेगी.
यह मामला सिर्फ पिज्जा, बर्गर और चिप्स की बिक्री तक सीमित नहीं है. राजस्थान हाईकोर्ट ने बच्चों के स्वास्थ्य के साथ मोबाइल स्क्रीन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के बढ़ते इस्तेमाल, सरकारी स्कूलों की सुविधाओं और आने वाली पीढ़ी के भविष्य से जुड़े कई मुद्दों पर चिंता जताई है.
स्कूल गेट से 50 मीटर तक जंक फूड पर रोक
जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति अनूप कुमार धांड की अदालत ने 24 अगस्त 2026 को जेन-जी और बच्चों के कल्याण से जुड़े मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज किया. कोर्ट ने स्कूलों के भीतर और स्कूल गेट से 50 मीटर तक के दायरे में हाई फैट, शुगर और साल्ट यानी HFSS वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर प्रभावी रोक लगाने के निर्देश दिए.
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इसमें पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइज, चिप्स, कार्बोनेटेड ड्रिंक और ज्यादा फैट, चीनी या नमक वाले दूसरे खाद्य पदार्थ शामिल हैं. स्कूल कैंटीन में उपलब्ध खाने की कैलोरी, सामग्री और पोषण संबंधी जानकारी भी प्रदर्शित करने को कहा गया है.
बच्चों की सेहत को लेकर कोर्ट चिंतित
कोर्ट ने कम उम्र में जंक फूड के ज्यादा सेवन को लेकर चिंता जताई. लगातार ज्यादा फैट, चीनी और नमक वाला खाना बच्चों की खान-पान की आदतों को प्रभावित कर सकता है. इससे मोटापा समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.
अदालत का जोर इस बात पर है कि बच्चों को सिर्फ पौष्टिक भोजन के बारे में जानकारी देना काफी नहीं है. उनके आसपास का माहौल भी ऐसा होना चाहिए, जहां आसानी से मिलने वाला भोजन सुरक्षित और पौष्टिक हो.
चार हफ्ते में हर स्कूल में बनेगी कमेटी
हाईकोर्ट ने प्रत्येक स्कूल में चार सप्ताह के भीतर स्कूल फूड सेफ्टी एंड न्यूट्रिशन समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं. इसमें शिक्षक, अभिभावक और छात्र प्रतिनिधि शामिल होंगे. यह कमेटी स्कूल में मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और पोषण संबंधी व्यवस्था पर नजर रखेगी.
मिड-डे मील और दूसरी पोषण योजनाओं के तहत मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी इसकी जिम्मेदारी का हिस्सा होगा. इसका मतलब है कि स्कूल में बच्चों को क्या खाना दिया जा रहा है, इसकी निगरानी अब ज्यादा व्यवस्थित तरीके से होगी.
स्कूलों की हर महीने होगी जांच
कोर्ट के निर्देशों के बाद स्कूलों और उनके आसपास बिकने वाले खाद्य पदार्थों की जांच के लिए टीमें गठित की जाएंगी. ये टीमें स्कूल कैंटीन और परिसर में उपलब्ध खाद्य पदार्थों की जांच करेंगी.
स्कूल गेट के आसपास जंक फूड बेचने वालों के खिलाफ भी नियमों के मुताबिक कार्रवाई की जाएगी. जिला मजिस्ट्रेट और ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों को मासिक निरीक्षण करने के निर्देश दिए गए हैं. इससे यह सुनिश्चित करने की कोशिश होगी कि हाईकोर्ट के निर्देश सिर्फ कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि स्कूलों के आसपास भी उनका असर दिखाई दे.
जेन-जी के भविष्य को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा सवाल
राजस्थान हाईकोर्ट का यह मामला सिर्फ जंक फूड तक सीमित नहीं है. अदालत ने जेन-जी के भविष्य और उनके सामने आने वाली चुनौतियों पर भी चिंता जताई है.
कोर्ट के मुताबिक आज के बच्चे ही आने वाले समय में देश के कार्यबल, नेतृत्वकर्ता और राष्ट्र के जिम्मेदार नागरिक बनेंगे. ऐसे में उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा को नजरअंदाज करना भविष्य के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है.
अदालत ने तेजी से बदलती तकनीक और बच्चों की बदलती जीवनशैली के बीच उनके सर्वांगीण विकास पर ध्यान देने की जरूरत बताई है.
AI जरूरी, लेकिन कॉपी-पेन भी जरूरी
हाईकोर्ट ने शिक्षा में AI और डिजिटल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर भी अहम टिप्पणी की. कोर्ट का मानना है कि AI बच्चों की पढ़ाई में मददगार हो सकता है, लेकिन उन्हें पूरी तरह तकनीक पर निर्भर नहीं बनाया जा सकता.
अगर बच्चे हर काम के लिए AI से तैयार सामग्री, स्पीच-टू-टेक्स्ट और प्रिंटआउट पर निर्भर रहने लगेंगे तो उनकी स्वतंत्र सोच, विश्लेषण क्षमता, मौलिक लेखन और हाथ से लिखने की आदत प्रभावित हो सकती है.
इसीलिए कोर्ट ने AI के इस्तेमाल के साथ किताबें पढ़ने, हाथ से लिखने और लिखित परीक्षाओं जैसी गतिविधियों को भी मजबूत रखने की जरूरत बताई है.
मोबाइल स्क्रीन टाइम भी कोर्ट की चिंता
बच्चों के बढ़ते मोबाइल और स्क्रीन टाइम को लेकर भी हाईकोर्ट ने चिंता जताई. कोर्ट ने WHO की गाइडलाइन का उल्लेख करते हुए कहा कि एक साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम शून्य रखने और 1 से 4 साल की उम्र में इसे एक घंटे से कम रखने की सिफारिश की गई है.
अदालत ने राज्य सरकार को बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करने के लिए नीति तैयार करने की दिशा में कदम उठाने को कहा है. कोर्ट ने ज्यादा स्क्रीन टाइम को बच्चों की नींद, एकाग्रता, सामाजिक कौशल और मानसिक विकास से जुड़ी चिंताओं के संदर्भ में देखा है.
सरकारी स्कूलों की व्यवस्था पर भी सवाल
हाईकोर्ट ने ग्रामीण और सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी पर भी गंभीर चिंता जताई. अदालत ने स्कूलों में बेहतर बुनियादी ढांचे, तकनीकी सुविधाओं, शिक्षकों के प्रशिक्षण, चिकित्सा सुविधाओं और साफ-सफाई जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करने की जरूरत बताई.
सवाल यह है कि जब दुनिया AI और रोबोटिक्स की तरफ तेजी से बढ़ रही है, तब क्या ग्रामीण और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भी भविष्य की इस दुनिया के लिए जरूरी सुविधाएं मिल रही हैं?
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बच्चों का भविष्य सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं
राजस्थान हाईकोर्ट ने जेन-जी के भविष्य को लेकर व्यापक नजरिया अपनाया है. बच्चों की शिक्षा के साथ उनका खान-पान, स्वास्थ्य, मोबाइल स्क्रीन टाइम, तकनीक का इस्तेमाल और स्कूल का माहौल भी उनके भविष्य को प्रभावित करता है.
राजस्थान हाईकोर्ट की अधिवक्ता प्रियंका बोराणा के अनुसार, सुनवाई के दौरान जेन-जी के स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई और निरीक्षण व कार्रवाई को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए.
अब राज्य सरकार और संबंधित विभागों के सामने इन निर्देशों को जमीन पर लागू करने की चुनौती है. फिलहाल हाईकोर्ट के इस रुख से साफ है कि बच्चों के स्वस्थ भविष्य के लिए स्कूलों के अंदर ही नहीं, बल्कि स्कूलों के आसपास के माहौल को भी सुरक्षित और बेहतर बनाने पर जोर दिया जा रहा है.
