छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड ने एक ऐसा एलान किया है जिसने सबको चौंका दिया है. बोर्ड ने कहा है कि अगस्त 2026 से अगर कोई मुस्लिम लड़का या लड़की किसी गैर-मुस्लिम से निकाह करना चाहेगा, तो उसे पहले वक्फ बोर्ड की इजाजत लेनी होगी. यानी बोर्ड की इजाजत के बिना शादी नहीं हो सकती. इतना ही नहीं, निकाह पढ़ाने वाले सभी मौलानाओं को अब रजिस्टर कराना होगा. बिना रजिस्टर के कोई मौलाना निकाह नहीं करा सकेगा. अगर कोई इन नियमों को तोड़ेगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई भी होगी. आखिर क्या वक्फ बोर्ड को सच में यह हक है, क्या संविधान इजाजत देता है और बोर्ड की दिलचस्पी किसी की शादी में क्यों है…
क्या वक्फ बोर्ड शादी में दखल दे सकता है?
इस सवाल का जवाब देने के लिए ABP न्यूज ने सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील मुकेश किशोर से बात की. मुकेश का कहना है- ‘ऐसा कतई नहीं हो सकता.’
मुकेश ने कहा, ‘वक्फ बोर्ड का यह प्रस्ताव अपनी सीमा से बाहर जाने जैसा है. वक्फ एक्ट 1995 के तहत बोर्ड को सिर्फ मस्जिद, कब्रिस्तान और दान की जमीन जैसी मुस्लिम संपत्तियों के मैनेजमेंट का हक है. इस एक्ट में कहीं नहीं लिखा कि बोर्ड शादियों को कंट्रोल कर सकता है या किसी को इजाजत देने का हक रखता है.
मुकेश किशोर ने आगे कहा, ‘अगर बोर्ड अनुमति को शादी की शर्त बनाता है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवनसाथी चुनने के अधिकार पर सीधा हमला है. इसके अलावा यह अनुच्छेद 25 और 26 में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता में भी बेवजह दखल है.’
क्या संविधान इसकी इजाजत देता है?
बिल्कुल नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई फैसलों में साफ कहा है कि किसी भी वयस्क को अपनी मर्जी से शादी करने का पूरा अधिकार है. यह अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की आजादी का हिस्सा है. कोई बोर्ड, कोई संस्था, कोई सरकार इस अधिकार में कानूनी आधार के बिना दखल नहीं दे सकती.
मुकेश किशोर ने एक और अहम बात बताई, ‘अनुच्छेद 25 और 26 पर दो तरह की बहस हो सकती है. एक पक्ष कहेगा कि बोर्ड सिर्फ मुस्लिम कानून के पालन की निगरानी कर रहा है. दूसरा पक्ष कहेगा कि बोर्ड किसी की धार्मिक आजादी में दखल नहीं कर सकता है. लेकिन मेरा मानना है कि यह प्रस्ताव कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा और लागू नहीं हो पाएगा.’
पहले भी कोर्ट में आ चुका ऐसा मामला
नवंबर 2024 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक ऐसा ही मामला देखा था. वहां भी सरकार ने वक्फ बोर्ड को शादी के प्रमाणपत्र जारी करने का अधिकार दे दिया था. लेकिन कोर्ट ने उस अधिसूचना पर तुरंत रोक लगा दी. कोर्ट ने साफ कहा, ‘वक्फ बोर्ड को शादी रजिस्ट्रेशन का कोई हक नहीं है. यह कानून के खिलाफ है और पहले कभी ऐसा नहीं हुआ.’ यानी छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड जो करने की कोशिश कर रहा है, वह कर्नाटक में पहले ही कोर्ट से खारिज किया जा चुका है.
गैर-मुस्लिम पक्ष को क्या हक होगा?
यह सबसे बड़ा उलझन भरा सवाल है. मान लीजिए कोई हिंदू लड़की किसी मुस्लिम लड़के से शादी करना चाहती है. तो क्या उस हिंदू लड़की को भी वक्फ बोर्ड की इजाजत लेनी पड़ेगी? या सिर्फ मुस्लिम पक्ष को? बोर्ड के प्रस्ताव में इसका कोई साफ जवाब नहीं है.
मुकेश किशोर कहते हैं, ‘बोर्ड अपने आप कोई नया नियम नहीं बना सकता. जब संसद ने वक्फ एक्ट में ऐसा कोई कानून नहीं बनाया, तो बोर्ड खुद से इजाजत की शर्त नहीं जोड़ सकता.’
क्या मौलानाओं का रजिस्ट्रेशन गलत है?
यहां बात थोड़ी अलग है. मुकेश किशोर कहते हैं, ‘मौलानाओं का रजिस्ट्रेशन और निकाहनामे को मानक बनाने का काम वक्फ बोर्ड अपनी हैसियत से कर सकता है, क्योंकि मस्जिदें और धार्मिक संस्थाएं वक्फ संपत्ति हैं. बोर्ड उनका रिकॉर्ड रख सकता है.’
फिर भी मुकेश साफ करते हैं, ‘अंतरधार्मिक निकाह के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य करना कानूनी रूप से बहुत कमजोर है और कोर्ट में टिक नहीं पाएगा.’
वक्फ बोर्ड को शादियों में दिलचस्पी क्यों होने लगी है?
इसके पीछे वक्फ बोर्ड की सोच शायद यह हो कि मस्जिदें और कब्रिस्तान वक्फ संपत्तियां हैं. निकाह जैसे धार्मिक आयोजन इन्हीं संपत्तियों पर होते हैं. बोर्ड को लगता है कि ‘गैर-मुस्लिम’ से निकाह के मामले में इन धार्मिक स्थलों का ‘दुरुपयोग’ रोकने या विवाद की स्थिति में अपनी जिम्मेदारी तय करने के लिए ऐसी इजाजत जरूरी है. लेकिन कानूनी तौर पर यह दलील बहुत कमजोर है क्योंकि निकाह एक व्यक्तिगत और धार्मिक काम है, न कि कोई प्रॉपर्टी मैनेजमेंट का मामला.
वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष सलीम राज का कहना है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि निकाह का रिकॉर्ड सुरक्षित रहे. आगे चलकर पहचान या वैवाहिक स्थिति को लेकर कोई विवाद न हो. बोर्ड एक समान निकाहनामा और द्विभाषी (हिंदी-अंग्रेजी) फॉर्म भी जारी करेगा.
तो क्या सहमति से बड़ी हो गई इजाजत?
इसी पर पूरा विवाद है. दो बालिग व्यक्तियों की आपसी सहमति से शादी करना उनका मौलिक अधिकार है. बोर्ड की ‘पूर्व अनुमति’ की शर्त इस सहमति को गौण बना देती है और एक प्रशासनिक अड़चन को बढ़ावा देती है. मुकेश किशोर इसे ‘एडमिनिस्ट्रेटिव ओवररीच’ यानी प्रशासनिक ज्यादती का एक बेहतरीन उदाहरण मानते हैं. कोई भी स्टेट्यूटरी बॉडी अपने मन से अपने अधिकार नहीं बढ़ा सकती और न ही ऐसे कानूनी बंधन बना सकती है, जिनकी इजाजत मूल कानून में ही न हो.
हालांकि, इस पूरे मामले में एक पेंच है. मुकेश किशोर यह भी कहते हैं कि अगर बोर्ड सिर्फ काजियों का रजिस्ट्रेशन करने, रिकॉर्ड को मेंटेन रखने या उसे स्टैंडर्डाइज करने की बात करता, तो यह कानूनी रूप से सही हो सकता था. लेकिन निकाह के लिए ‘इजाजत’ को अनिवार्य बनाना कानून की नजर में टिक नहीं पाएगा.
तो आखिर इस प्रस्ताव का क्या होगा?
अगर छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड इस नियम को लागू करने की कोशिश करता है, तो सबसे पहले कोर्ट में चुनौती दी जाएगी. सुप्रीम कोर्ट के वकील ए. पी. सिंह का मानना है कि कोर्ट इस पर रोक लगा देगा, क्योंकि:
- वक्फ एक्ट में बोर्ड को ऐसा कोई अधिकार नहीं.
- यह संविधान के अनुच्छेद 21, 25 और 26 का उल्लंघन करता है.
- कर्नाटक हाईकोर्ट पहले ही ऐसी ही कोशिश को खारिज कर चुका है.
ए. पी. सिंह कहते हैं, ‘एक बोर्ड अपनी मर्जी से अपने अधिकार नहीं बढ़ा सकता. अगर बोर्ड ने इजाजत देना शुरू कर दिया, तो पहला सवाल होगा कि आपको यह अधिकार किस कानून ने दिया? जब संसद ने नहीं दिया, तो आप कैसे दे सकते हैं.’
पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं, ‘यह मामला किसी साजिश से ज्यादा, एक ऐसे कानूनी भ्रम का नतीजा लगता है, जिसमें वक्फ बोर्ड ने अपने अधिकारों की सीमा लांघ दी. हां, इसमें कोई शक नहीं कि समय और हालात ऐसे हैं कि इस फरमान से सरकार को राजनीतिक फायदा जरूर होता दिख रहा है.’
यह फरमान ‘लव जिहाद’ के खिलाफ सख्ती के उसी नैरेटिव को मजबूत करता है जिसे सरकार लगातार उठाती रही है, लेकिन इसे एक सोची-समझी साजिश साबित करने के लिए कोई ठोस कड़ी मौजूद नहीं है. फिलहाल तो यह कानून बनाम राजनीति का एक ऐसा खेल है जिसका आखिरी फैसला अदालत की दहलीज पर ही होगा.
