शुक्रवार को ‘यूनाइटेड फोरम ऑफ़ बैंक यूनियंस’ (UFBU) के आह्वान पर 24 घंटे की राष्ट्रव्यापी हड़ताल के कारण पूरे भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकिंग सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित रहेगी. यह हड़ताल एक ऐसे समय पर हुई है, जब इसके तुरंत बाद महीने का दूसरा शनिवार, रविवार और गणेश चतुर्थी का त्योहार पड़ रहा है. इस तरह एक साथ लगातार चार दिनों तक देश के अधिकांश हिस्सों में बैंक शाखाओं के किवाड़ बंद रहने की स्थिति बन गई है. इस लंबी तालाबंदी के कारण रिटेल ग्राहकों, व्यापारियों और छोटे-बड़े उद्योगों को भारी वित्तीय असुविधा का सामना करना पड़ेगा.
ब्रिक्स सम्मेलन और सरकार की अपील
यह राष्ट्रव्यापी आंदोलन ऐसे संवेदनशील समय में हुआ है जब देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है. इस सम्मेलन में दुनिया भर के प्रमुख राष्ट्रों के शीर्ष नेता और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल हिस्सा ले रहे हैं. वैश्विक स्तर पर भारत की साख और कूटनीतिक गतिविधियों को देखते हुए केंद्र सरकार और बैंक प्रबंधन ने यूनियनों से हड़ताल को टालने या बातचीत के माध्यम से रास्ता निकालने की सीधी अपील की थी. हालांकि, यूनियन नेताओं ने सरकार की इस अपील को खारिज कर दिया और लंबे समय से लंबित ‘पांच दिन के कार्य सप्ताह’ को तुरंत अधिसूचित करने की अपनी मांग पर अड़े रहे.
सार्वजनिक बनाम निजी क्षेत्र के बैंक: असर का अंतर
हड़ताल का प्रभाव बैंकिंग क्षेत्र के अलग-अलग ढांचों पर अलग-अलग रूप में दिखाई दे रहा है, जिसने भारतीय वित्तीय प्रणाली के विभाजन को उजागर किया है:
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (PSBs): स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), पंजाब नेशनल बैंक (PNB), बैंक ऑफ बड़ौदा और केनरा बैंक जैसे बड़े सरकारी बैंकों में कामकाज लगभग पूरी तरह ठप रहा. इन बैंकों के क्लर्क और अधिकारी वर्ग के कर्मचारियों में यूनियनों की मजबूत पकड़ के कारण शाखाओं में सन्नाटा पसरा रहा. नगद जमा और निकासी, ड्राफ्ट जारी करने, नए खाते खोलने, संस्थागत ट्रेड क्लीयरेंस और चेक ट्रंकेशन सिस्टम (CTS) जैसी शाखा-आधारित सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हैं.
-निजी और विदेशी बैंक: HDFC बैंक, ICICI बैंक और एक्सिस बैंक जैसे बड़े निजी बैंकों का कामकाज काफी हद तक सामान्य रूप से चलता रहा. इन बैंकों में कर्मचारियों की संगठित यूनियन न होने के कारण शाखाएं खुली रहीं और काउंटर सेवाएं चालू रहीं. हालांकि, सरकारी बैंकों में क्लियरिंग-हाउस बंद रहने और चेक प्रोसेसिंग की गति धीमी होने के कारण अंतर-बैंक लेन-देन और चेक सेटलमेंट की गति पर भी अप्रत्यक्ष असर देखने को मिला.
डिजिटल बैंकिंग ढांचा: शाखाओं में ताले लटके होने के बावजूद देश का डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर सुचारू रूप से काम करता रहा. UPI (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस), IMPS, NEFT/RTGS और नेट बैंकिंग सेवाएं सामान्य रूप से जारी रहीं. इससे आम नागरिकों को रोजमर्रा की खरीदारी और ट्रांसफर में बड़ी राहत मिली, हालांकि शाखाओं के बंद रहने से कई एटीएम में कैश खत्म होने की शिकायतें सामने आईं.
5-दिन के कार्य सप्ताह की मांग का इतिहास और कानूनी गतिरोध
बैंक कर्मचारी पिछले दो सालों से 5-डे वर्क वीक लागू करने की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं. इस विवाद का मुख्य केंद्र मार्च 2024 में हुआ 12वां बाइपार्टाइट सेटलमेंट है.
इंडियन बैंक्स एसोसिएशन (IBA) और बैंक यूनियनों के बीच हुए इस ऐतिहासिक समझौते में सभी शनिवारों को आधिकारिक अवकाश घोषित करने पर सहमति बनी थी. इसके बदले में बैंक यूनियनें इस बात पर राजी हुई थीं कि कार्य दिवसों के नुकसान की भरपाई के लिए सोमवार से शुक्रवार तक रोजाना कामकाज के घंटों में 40 मिनट की बढ़ोतरी की जाएगी.
IBA की स्पष्ट सिफारिश और सहमति के बावजूद, केंद्रीय वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (DFS) द्वारा अभी तक इसकी अंतिम प्रशासनिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है. इस प्रशासनिक देरी के कारण बैंक कर्मचारी अब भी ‘अल्टरनेट-सैटरडे’ के पुराने नियम के तहत काम करने के लिए मजबूर हैं. यह स्थिति तब है जब रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI), सूचना प्रौद्योगिकी (IT) सेक्टर, केंद्र सरकार के अधिकांश मंत्रालयों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में 5-दिन का कार्य सप्ताह वर्षों से लागू है.
‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत: वित्तीय नुकसान के बावजूद कर्मचारियों का रुख
बैंकिंग सेवा नियमों और भारतीय श्रम कानूनों के अनुसार, हड़ताल पर जाने वाले कर्मचारियों पर “काम नहीं तो वेतन नहीं” का सिद्धांत सख्ती से लागू किया जाता है.
-वेतन कटौती: हड़ताल में भाग लेने वाले सभी बैंक कर्मचारियों के मासिक वेतन से एक दिन के मूल वेतन और महंगाई भत्ते (DA) की आनुपातिक कटौती की जाएगी.
-छुट्टियों का समायोजन नहीं: नियम के अनुसार, हड़ताल के दिन की अनुपस्थिति को कर्मचारी की अर्जित छुट्टी या आकस्मिक अवकाश में समायोजित करने की अनुमति नहीं होती है.
सीधे आर्थिक नुकसान के बावजूद, यूनियनों का मानना है कि कार्य-जीवन संतुलन (Work-Life Balance), मानसिक स्वास्थ्य में सुधार, और निष्पक्ष प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) ढांचे को लागू कराने के लिए यह वित्तीय त्याग और विरोध प्रदर्शन आवश्यक है.
ब्रिक्स सम्मेलन और हड़ताल का रणनीतिक संयोग
हालांकि UFBU के शीर्ष नेताओं का आधिकारिक बयान है कि मुख्य श्रम आयुक्त के साथ सुलह वार्ता विफल होने के बाद हड़ताल की तारीख तय की गई थी, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस तारीख का चयन ब्रिक्स सम्मेलन के साथ मेल खाना एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है.
जब दुनिया के शीर्ष नेता और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया राजधानी नई दिल्ली में मौजूद हैं, तब देशव्यापी हड़ताल करने से बैंक यूनियनों की आवाज अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर जोर-शोर से गूंजी है. सरकार पर अधिकतम दबाव बनाने के उद्देश्य से उठाया गया यह कदम दिखाता है कि भारत की वैश्विक आर्थिक साख और उसके सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों की आंतरिक मांगों के बीच एक स्पष्ट खींचतान बनी हुई है.
बैंकिंग सेवाओं में बार-बार आने वाले इस गतिरोध का सीधा नुकसान आम जनता और छोटे कारोबारियों को उठाना पड़ता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि जब IBA और यूनियनें काम के घंटे बढ़ाने पर सहमत हो चुकी हैं, तो वित्त मंत्रालय को जल्द से जल्द अधिसूचना जारी कर इस विवाद को समाप्त करना चाहिए, ताकि देश की अर्थव्यवस्था और बैंकिंग तंत्र सुचारू रूप से संचालित हो सके.
