सऊदी अरब ने मक्का की एक मस्जिद के अंदर ‘नाजायज हरकत’ के इल्जाम में बांग्लादेशी मूल के नजरुल इस्लाम अब्दुल बसीर और सिती अख्तर को फांसी पर लटका दिया. सऊदी गृह मंत्रालय के मुताबिक, यह सजा इस्लामी शरिया के उस बाब में दी गई, जिसे ‘ताजीर’ कहा जाता है. यानी ऐसा जुर्म, जिसकी कोई तयशुदा सजा कुरान में नहीं लिखी है. जज अपने इल्म और विवेक से सजा तय करता है. मामला सामने आते ही ढाका में हंगामा मच गया, क्योंकि बांग्लादेश सरकार का कहना है कि उसे फांसी से पहले कोई इत्तिला नहीं दी गई.
आखिर इस्लामी कानून में मौत की सजा किन-किन मामलों में है और यह मामला इस्लाम के खिलाफ कैसे बन गया?
शरिया में सजा के तीन बुनियादी दरवाजे
इस्लामी फिकह (कानून) में जुर्म को मोटे तौर पर तीन हिस्सों में बांटा गया है. तीनों में ही जान लेने का हुक्म मौजूद है, लेकिन शर्तें और तरीके अलग-अलग हैं:
- हुदूद: ये वो जुर्म हैं, जिन्हें ‘अल्लाह के खिलाफ’ माना जाता है और जिनकी सजा कुरान में पहले से तय है. इनमें जिना (व्यभिचार), इर्तिदाद (इस्लाम छोड़ना) और डकैती जैसे मामले शामिल हैं. इनमें मौत की सजा लाजिमी होती है, यानी जज के पास इसे बदलने का इख्तियार नहीं होता.
- किसास: यह ‘बदले’ का उसूल है, जो सिर्फ कत्ल या जिस्मानी नुकसान पर लागू होता है. इसमें मारे गए शख्स के वारिस चाहें तो मौत की सजा (किसास) की मांग कर सकते हैं या फिर ‘दीया’ (खूनबहा/मुआवजा) लेकर मामला खत्म कर सकते हैं. यानी यहां फैसला पीड़ित परिवार के हाथ में होता है.
- ताजीर: यह ‘विवेकाधीन सजा’ है. इसमें न जुर्म की तारीफ पहले से तय होती है, न सजा. जज अपनी समझ से तय करता है कि किसी हरकत को जुर्म मानना है या नहीं. अगर मानना है तो सजा क्या होगी. डांट, कोड़े, जेल या मौत. सऊदी अरब में कोई लिखित पीनल कोड नहीं है, इसलिए जज ताजीर के तहत बहुत बड़ी इख्तियारात रखते हैं.
मक्का के मामले में सजा ‘ताजीर’ में क्यों?
सऊदी गृह मंत्रालय ने साफ कहा कि दोनों को ताजीर के तहत मौत की सजा दी गई. मंत्रालय के बयान के मुताबिक, यह फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि जुर्म ‘बहुत संगीन’ था, मस्जिद की हुरमत को ठेस पहुंची थी और ‘वक्त और जगह’ दोनों की पाकीजगी का उल्लंघन हुआ था.
यानी सऊदी हुकूमत का तर्क है कि मक्का की मस्जिद में नाजायज हरकत करना आम जुर्म नहीं, बल्कि मुकद्दस जगह की बेहुरमती है, इसलिए सबसे बड़ी सजा जायज है.
तो यह इस्लाम के खिलाफ कैसे है?
यहां यह समझना जरूरी है कि आलोचक इसे इस्लाम के ‘खिलाफ’ नहीं, बल्कि इस्लामी इंसाफ के उसूलों के खिलाफ मान रहे हैं:
- ताजीर में मौत की सजा का जौज ही मश्कूक: इस्लामी उलेमा का एक बड़ा तबका मानता है कि ताजीर का मकसद सुधार और रोकथाम है, बदला लेना नहीं. मौत की सजा सिर्फ हुदूद और किसास तक महदूद होनी चाहिए, जहां सबूत के सख्त मयार (जैसे जिना के लिए चार गवाह) तय हैं. ताजीर में जज को इतनी छूट कि वह मौत की सजा सुना दे, कई मुफ्तियों के लिए इस्लामी न्यायशास्त्र के तहत जायज नहीं.
- पारदर्शिता और प्रक्रिया का अभाव: इस्लामी कानून में सजा से पहले सबूत पेश करने, गवाहों को सुनने और मुलजिम को अपनी सफाई का पूरा मौका देने पर जोर है. इस मामले में न तो यह बताया गया कि ‘नाजायज हरकत’ क्या थी, न मस्जिद की तारीफ और न गिरफ्तारी की तारीख. बांग्लादेशी दूतावास को तो सुनवाई और सजा की इत्तला तक नहीं दी गई. यह पारदर्शिता का अभाव इस्लामी इंसाफ की रूह के खिलाफ माना जा रहा है.
- सजा की शिद्दत और जुर्म का ताल्लुक: इस्लामी कानून में सजा जुर्म के मुताबिक होनी चाहिए. आलोचक पूछते हैं कि क्या एक ‘नाजायज हरकत’ के लिए मौत की सजा सबसे मुनासिब है? जबकि कत्ल जैसे संगीन जुर्म में भी किसास के तहत पीड़ित पक्ष मुआवजा लेकर मामला खत्म कर सकता है, तो फिर एक गैर-हिंसक जुर्म में जज की मर्जी से फांसी देना कई लोगों को इस्लामी इंसाफ के खिलाफ लगता है.
सऊदी अरब की नहीं, पूरे इस्लामी न्यायशास्त्र की बहस
यह मामला सिर्फ एक फांसी की खबर नहीं है. यह उस बहस का हिस्सा है कि ताजीर की तफसीर कितनी वसीह होनी चाहिए. सऊदी अरब जैसे मुल्कों में जहां काजियों के पास बेलगाम इख्तियारात हैं, वहां इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है, यही आलोचना का मरकज है.
बांग्लादेश ने सऊदी अरब से पूरे मामले की जानकारी मांगी है और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी सजा की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं. सवाल यह नहीं कि इस्लाम में मौत की सजा है या नहीं, बल्कि यह है कि किस जुर्म में, किस प्रक्रिया से और किस हद तक उसे लागू किया जाए. मक्का का यह मामला इसी सवाल का सबसे ताजा और सबसे विवादास्पद उदाहरण बन गया है.
