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‘बिस्मिल्लाह से ले तेनैब्रे’ फ्रांस के आंदोलन में क्यों गूंज रहा ये नारा, क्या है इसका असली मतलब?


फ्रांस में इन दिनों छात्रों का उग्र प्रदर्शन एक अजीबो-गरीब और रहस्यमयी नारे की वजह से दुनिया भर में सुर्खियों में है. स्कूलों के बाहर लगी नाकेबंदी से लेकर सोशल मीडिया के वायरल वीडियो और मशहूर जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थुनबर्ग के बयानों तक, हर तरफ ‘बिस्मिल्लाह, से ले तेनैब्रे’ नामक एक अजीबोगरीब नारा काफी वायरल हो रहा है. यह नारा फ्रांस से निकलकर अब बेल्जियम और इटली के प्रदर्शनों तक पहुंच चुका है और युवाओं का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक स्लोगन बन गया है.

इस रहस्यमयी नारे की शुरुआत अक्टूबर की शुरुआत में स्नैपचैट (Snapchat) पर शेयर किए गए एक स्क्रीनशॉट से हुई थी, जब छात्र स्कूल बंद कराने और नाकेबंदी की प्लानिंग कर रहे थे. ‘मामादौ’ नाम के एक अकाउंट से मैसेज आया, ‘हाय, बिस्मिल्लाह, से ले तेनेब्र. ब्लॉकेड कब है, वल्लाह, ब्रो?’ छात्रों का मानना है कि यह मैसेज किसी अंडरकवर पुलिस अफसर ने उनके प्राइवेट ग्रुप में घुसपैठ करने के लिए भेजा था, जो युवाओं की भाषा और स्लैंग बोलने की नाकाम कोशिश कर रहा था. फ्रांस पुलिस या गृह मंत्रालय ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन सोशल मीडिया यूज़र्स का दावा है कि इस अकाउंट की लोकेशन पुलिस स्टेशन के पास की थी.

यूरो न्यूज़’ के मुताबिक, छात्र इसका इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति को चिढ़ाने के लिए कर रहे हैं, जो युवाओं की तरह बोलने की नाकाम कोशिश करता है. द न्यू यॉर्क टाइम्स’ के अनुसार, यह नारा दो पीढ़ियों के बीच के अंतर को दर्शाने का एक प्रतीक बन चुका है.

इस नारे के शाब्दिक और सांस्कृतिक अर्थ की बात करें तो ‘बिस्मिल्लाह’ एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ ‘ईश्वर के नाम पर’ होता है, जिसे आम फ्रेंच स्लैंग में ‘चलो शुरू करें’ के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है. वहीं ‘से ले तेनेब्र’ का अनुवाद ‘यह अंधकार है’ होता है, जिसे युवा किसी बहुत खराब या विकट परिस्थिति को दर्शाने के लिए बोलते हैं. कुल मिलाकर इसका अर्थ ‘ईश्वर के नाम पर, यह अंधकार  है’ बनता है. 

छात्रों के इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन की शुरुआत 18 सितंबर को पेरिस के दक्षिण-पूर्व में स्थित क्रेटेल से हुई थी. छात्र पढ़ाई के लंबे घंटों, भीड़भाड़ वाली क्लास, जर्जर इमारतों और शिक्षकों की भारी कमी के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं. उनका आरोप है कि इन अव्यवस्थाओं का सबसे ज्यादा खामियाजा कामकाजी वर्ग के इलाकों और अल्पसंख्यक समुदायों को भुगतना पड़ रहा है. आंदोलन की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि केवल 2 अक्टूबर को ही लगभग 400 स्कूल नाकेबंदी के कारण पूरी तरह बंद रहे. आगे चलकर 17 अक्टूबर को यह छात्र आंदोलन देशव्यापी महंगाई विरोधी प्रदर्शनों से जुड़ गया, जिसके बाद कई इलाकों में हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आई.



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