अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 6 अक्टूबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट किया. ट्रंप ने फ्रांस में चल रहे स्कूली छात्रों के विरोध प्रदर्शनों को ‘इस्लाम का फ्रांस पर कब्जा करने की कोशिश’ बताया. ट्रंप ने लिखा, ‘फ्रांस में जो हो रहा है, वह बेकाबू सामूहिक आप्रवासन से कम नहीं है. यह स्कूलों का मामला नहीं है, यह इस्लाम का एक ऐसे देश पर कब्जा करने का मामला है जो कभी महान था.’ ट्रंप ने अपने इस दावे के समर्थन में कोई सबूत नहीं दिया. तो क्या वाकई फ्रांस पर इस्लाम का कब्जा हो रहा है या फिर कोई नैरेटिव है…
ट्रंप का कहना है कि फ्रांस में जो छात्र आंदोलन हो रहा है, वह शिक्षा व्यवस्था की समस्याओं को लेकर नहीं है, बल्कि इस्लाम फ्रांस पर कब्जा करना चाहता है. उन्होंने इसे ‘बेकाबू आप्रवासन’ का नतीजा बताया.
फ्रांस में छात्र आंदोलन का माजरा क्या है?
फ्रांस में यह छात्र आंदोलन सितंबर 2026 के अंत में शुरू हुआ था. छात्र स्कूलों में बढ़ते काम के बोझ, शिक्षकों की कमी और शिक्षा व्यवस्था की अन्य समस्याओं को लेकर सड़कों पर उतरे थे. 6 अक्टूबर 2026 को लगभग ढाई लाख लोगों ने फ्रांस भर में प्रदर्शन किया. फ्रांस में अब तक इस आंदोलन का किसी धार्मिक या पहचान से जुड़े मुद्दे से कोई संबंध स्थापित नहीं हुआ है.
फ्रांस में मुस्लिम आबादी कितनी है?
यह समझने के लिए कि क्या फ्रांस पर ‘कब्जा’ हो रहा है, हमें आंकड़े देखने होंगे.
फ्रांस के संविधान में धर्म के आधार पर जनगणना करने पर रोक है. इस वजह से वहां मुस्लिम आबादी का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है. प्यू रिसर्च सेंटर के फरवरी 2026 में छपी स्टडी के मुताबिक, फ्रांस की लगभग 9% आबादी मुस्लिम है.
Ifop की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस की वयस्क आबादी में मुसलमानों का अनुपात 1985 में 0.5% था, जो 2025 में बढ़कर 7% हो गया है. यह फ्रांस में कैथोलिक धर्म (43%) के बाद दूसरा सबसे बड़ा धर्म है.
कुछ और अनुमानों में यह संख्या 8% से 9% के बीच बताई जाती है. कुछ स्रोतों में 10% से 15% तक का आंकड़ा भी दिया जाता है, लेकिन इन अनुमानों को सटीक आंकड़ा नहीं माना जा सकता.
फ्रांस की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 9% है. यह संख्या बढ़ रही है, लेकिन यह ‘कब्जा’ कहने लायक नहीं है. फ्रांस की 91% आबादी अन्य धर्मों या नास्तिकता को मानती है.
क्या मुस्लिम आबादी बढ़ रही है?
हां, फ्रांस में मुस्लिम आबादी बढ़ रही है. Ifop की रिपोर्ट बताती है कि यह बढ़ोतरी धीमी लेकिन लगातार है. 1985 में यह 0.5% थी, जो 2025 में 7% हो गई. इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि फ्रांस के मुसलमानों में धार्मिकता का स्तर बढ़ रहा है, खासकर युवाओं में. 15 से 24 साल के 87% मुस्लिम युवा खुद को धार्मिक बताते हैं. मस्जिद जाने और नमाज पढ़ने वालों की संख्या भी पिछले 40 सालों में तेजी से बढ़ी है.
यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह बढ़ोतरी ‘कब्जा’ नहीं है. यह एक सामाजिक और जनसांख्यिकीय बदलाव है, जो आप्रवासन, जन्म दर और धार्मिक पहचान में बदलाव की वजह से हो रहा है.
lemonde.fr की रिपोर्ट, ट्रंप के बयान को ‘ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी’ बताती है.
‘ग्रेट रिप्लेसमेंट’ थ्योरी क्या है?
विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. राजन कुमार कहते हैं, ‘ट्रंप के बयान के पीछे वाले नैरेटिव को ग्रेट रिप्लेसमेंट थ्योरी कहा जाता है. यह एक साजिशी सिद्धांत है, जिसे फ्रांस में रेनॉड कामू नाम के एक लेखक ने मशहूर किया था. इस थ्योरी का दावा है कि यूरोप की मूल आबादी को गैर-यूरोपीय, खासकर मुस्लिम और आप्रवासी धीरे-धीरे बदल रहे हैं.’
हालांकि, इस थ्योरी को दुनिया भर में कई विद्वानों और शोधकर्ताओं खारिज कर चुके हैं. इसे ‘एक राजनीतिक मिथक, जनसांख्यिकीय वास्तविकता नहीं’ बताया जाता है. फ्रांसीसी मुस्लिम कल्ट काउंसिल (CFCM) ने भी इसे ‘नस्लवादी’ थ्योरी करार दिया है.
Ifop की रिपोर्ट भी कहती है कि उसके नतीजे ‘ग्रेट रिप्लेसमेंट’ का समर्थन नहीं करते. रिपोर्ट बताती है कि फ्रांस में मुसलमानों का वास्तविक अनुपात 7% है, जबकि फ्रांसीसी लोगों का एक बड़ा वर्ग इसे 31% तक आंकता है. यानी धारणा और वास्तविकता में बहुत बड़ा अंतर है.
तो फिर ट्रंप ने इस्लाम को टारगेट क्यों किया?
डॉ. राजन कुमार ने कहा, ‘ट्रंप के इस बयान के पीछे राजनीतिक कारण भी हैं. अमेरिका में नवंबर 2026 में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं. ट्रंप और उनके समर्थक आप्रवासन और इस्लाम के मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनाकर वोट बैंक साधने की कोशिश कर रहे हैं.’ ट्रंप के सहयोगियों ने फ्रांस के विरोध प्रदर्शनों के वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करते हुए इसे ‘पश्चिम के लिए चेतावनी’ बताया.
फ्रांस ने ट्रंप के इस बयान की तुलना ईरान से की है. इसने फ्रांस में छात्र आंदोलनों पर पेरिस की ‘हिंसक प्रतिक्रिया’ को लेकर फ्रांसीसी राजदूत को तलब किया था. यानी फ्रांस ने ट्रंप के बयान को गंभीरता से नहीं लिया.
आखिर फ्रांस में इस्लाम वाले दावे का सच क्या है?
तथ्य यह है कि फ्रांस में मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, लेकिन यह अभी भी कुल आबादी का लगभग 9% ही है. यह कब्जा नहीं है. फ्रांस में धार्मिक पहचान और आप्रवासन को लेकर बहस जरूर है, लेकिन ट्रंप का दावा इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है और इसके पीछे कोई ठोस सबूत नहीं है.
छात्र आंदोलन की असली वजह शिक्षा व्यवस्था की समस्याएं हैं, न कि इस्लाम. ट्रंप का बयान तथ्यों पर आधारित नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव है.
