5 अक्टूबर 2026 को रियाद में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के विदेश मंत्रियों, रक्षा मंत्रियों और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की आपात बैठक हुई, जिसमें सामूहिक रक्षा समझौतों को जमीन पर उतारने का फैसला किया. इसके तहत पाकिस्तान और तुर्किये सऊदी अरब में अपनी सैन्य ताकत तैनात करेंगे. तीनों देशों ने 7 अगस्त 2026 को ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौता’ पर हस्ताक्षर किए थे. इसके तहत किसी एक देश पर हमला हुआ तो तीनों पर हमला माना जाएगा. हाल ही में यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब में कई जगहों को निशाना बनाया है. इसी के साथ सवाल उठ रहे हैं कि दुनिया भर में कौन से देश किन देशों को सिक्योरिटी देते हैं…
सऊदी-पाकिस्तान-तुर्किये का मक्का पैक्ट इस मायने में एक बड़ा बदलाव है. यह दिखाता है कि मिडिल ईस्ट के देश अब अमेरिका पर अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते. सऊदी अरब दशकों से अमेरिकी सुरक्षा छत्र के नीचे था, लेकिन अब उसने पाकिस्तान और तुर्किये के साथ एक नया रास्ता चुना है.
अब जानते हैं कि कौन से देश किन देशों को सुरक्षा देते हैं…
अमेरिका: दुनिया का सबसे बड़ा सुरक्षा देने वाला देश
अमेरिका का सबसे मजबूत हथियार है नाटो का अनुच्छेद 5. इसके मुताबिक, नाटो के किसी एक सदस्य देश पर हमला सभी 32 सदस्यों पर हमला माना जाएगा. नाटो में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, पोलैंड, तुर्किये समेत कुल 32 देश शामिल हैं. फिनलैंड 2023 में और स्वीडन 2024 में नाटो का हिस्सा बने.
इसके अलावा अमेरिका ने जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया को ‘परमाणु छत्र’ भी दे रखा है, हालांकि इन देशों की धरती पर अमेरिकी परमाणु हथियार नहीं हैं. रूस के सुरक्षा परिषद सचिव सर्गेई शोइगु ने यहां तक दावा किया है कि जापान और दक्षिण कोरिया अमेरिकी परमाणु हथियारों की मेजबानी की तैयारी कर रहे हैं.
रूस: CATO और परमाणु गारंटी
रूस की सुरक्षा गारंटी का सबसे बड़ा जरिया सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन (CATO) है. इसमें छह पूर्व सोवियत देश रूस, बेलारूस, आर्मेनिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान शामिल हैं. CATO के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, अगर किसी सदस्य देश पर हमला होता है, तो रूस अपने परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर भी विचार कर सकता है.
रूस के पास दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु जखीरा है, जिसमें करीब 4,400 तैनात हैं. रूस और बेलारूस के बीच एक अलग सुरक्षा गारंटी संधि भी है, जिसके तहत दोनों देशों का एक साझा रक्षा क्षेत्र बनाया जा रहा है.
चीन: सिर्फ उत्तर कोरिया के साथ सैन्य संधि
चीन की सक्रिय सैन्य सहायता संधि सिर्फ उत्तर कोरिया के साथ है. 11 जुलाई 1961 को हस्ताक्षरित ‘मैत्री, सहयोग और पारस्परिक सहायता संधि’ आज भी चीन की इकलौती सक्रिय पारस्परिक रक्षा संधि है. इस संधि के तहत अगर उत्तर कोरिया पर हमला होता है, तो चीन को सैन्य सहायता देनी होगी.
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जुलाई 2026 में इस संधि की 65वीं वर्षगांठ के मौके पर कहा था कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भी चीन और उत्तर कोरिया को ‘रणनीतिक संकल्प’ बनाए रखना चाहिए.

यूरोप: फ्रांस और ब्रिटेन की परमाणु छत्रछाया
यूरोप में दो परमाणु शक्तियां हैं- फ्रांस और ब्रिटेन. फ्रांस ने मार्च 2026 में ‘फ्रंटियर न्यूक्लियर डिटरेंस’ योजना शुरू की. इसके तहत वह अपने परमाणु छत्र को यूरोप के अन्य देशों तक बढ़ाने की पेशकश कर रहा है.
इस योजना में अब तक नॉर्वे, बेल्जियम, डेनमार्क, जर्मनी, ग्रीस, नीदरलैंड, पोलैंड, स्वीडन, फिनलैंड और ब्रिटेन सहित 10 देश शामिल हो चुके हैं. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इसे ‘फॉरवर्ड डिटरेंस’ का नाम दिया है. इसका मतलब है कि फ्रांस अपने परमाणु हथियारों को साझेदार देशों की धरती पर तैनात कर सकता है.
ब्रिटेन भी अपने परमाणु छत्र को यूक्रेन, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और पश्चिमी बाल्कन तक बढ़ाने पर विचार कर रहा है. अफ्रीका में फ्रांस के कई देशों के साथ द्विपक्षीय रक्षा समझौते हैं, जिनके तहत वह बाहरी हमले की स्थिति में सैन्य सहायता देता है.
सुरक्षा गारंटी और सुरक्षा आश्वासन में फर्क
इस पूरे सिनेरियो को समझने के लिए एक बात याद रखना जरूरी है कि ‘सुरक्षा गारंटी’ और ‘सुरक्षा आश्वासन’ में फर्क होता है. सुरक्षा गारंटी कानूनी रूप से बाध्यकारी होती है, जैसे नाटो का अनुच्छेद 5 या चीन-उत्तर कोरिया संधि. वहीं, सुरक्षा आश्वासन सिर्फ राजनीतिक वादे होते हैं, जिन्हें तोड़ने पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती.
