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Explained: 9% लोग बस-मेट्रो और 43% दोपहिया से करते सफर! NSO रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे


देश में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत का सीधा जवाब सरकार के पहले ‘नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे’ (NHTS) में मिल गया है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की ओर से जारी इस सर्वे में यह खुलासा हुआ है कि देश में काम पर जाने वाले सिर्फ 9% लोग ही बस, मेट्रो या ट्रेन जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं. इसके उलट 43% कर्मचारी टू-व्हीलर पर निर्भर हैं और सिर्फ 3% लोग कार से ऑफिस जाते हैं. तो जानते हैं इस रिपोर्ट में कौन से चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं…

यह आंकड़ा साफ बताता है कि भारत की आबादी ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट बनने से पहले ही प्राइवेट वाहनों को अपना लिया है.

सर्वे क्या है और कैसे हुआ?

NSO ने यह सर्वे जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच किया. इसमें देशभर के 14,274 गांवों और 10,377 शहरी ब्लॉक्स को कवर किया गया. इसमें 4,92,023 परिवारों और 20,34,371 लोगों से जानकारी जुटाई गई. यानी यह देश का अब तक का सबसे बड़ा और पहला ऐसा सर्वे है, जिसमें लोग कहां से कहां, कैसे और क्यों आते-जाते हैं, इसका पूरा लेखा-जोखा है.

सबसे पहले यह समझ लें कि ‘यात्रा’ किसे माना गया है. सर्वे में सिर्फ 1 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी वाली ट्रिप को ही यात्रा माना गया है. 1 किलोमीटर से कम की दूरी को गिना ही नहीं गया. यही वजह है कि पैदल जाने वालों की संख्या कम दिखती है, क्योंकि बहुत से लोग 1 किलोमीटर से भी कम दूर काम करते हैं.

पब्लिक ट्रांसपोर्ट का असली हाल: सिर्फ 9% हिस्सेदारी

सर्वे के मुताबिक, 1 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करके काम पर जाने वाले कुल कर्मचारियों में सिर्फ 9% लोग बस, मेट्रो, ट्रेन या ट्राम का इस्तेमाल करते हैं. इसमें भी बसों की हिस्सेदारी 6.7% है, जबकि मेट्रो, मोनोरेल, ट्राम और उपनगरीय रेल मिलाकर सिर्फ 2.3% है.

शहरों में तो हाल और भी खराब

शहरी इलाकों में तो हालत और चिंताजनक है. पूरे देश में शहरी कर्मचारियों के सिर्फ 5% लोग मेट्रो, मोनोरेल, उपनगरीय रेल या ट्राम से काम पर जाते हैं. हालांकि कुछ राज्यों में यह संख्या ज्यादा है:

  • महाराष्ट्र: 20.7%
  • पश्चिम बंगाल: 16.5%
  • दिल्ली: 14.4%

इन राज्यों में भी मेट्रो और लोकल ट्रेन का जाल बड़ा है, लेकिन पूरे देश की तस्वीर देखें तो सिर्फ 5% का आंकड़ा यह बताता है कि मेट्रो पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी आम आदमी तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं पहुंच पाया है.

छात्रों की हालत थोड़ी बेहतर

स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्रों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल थोड़ा ज्यादा है. 37% छात्र पैदल जाते हैं, 29.5% बस पकड़ते हैं और 15.8% साइकिल चलाते हैं. यानी छात्रों में लगभग एक तिहाई बसों पर निर्भर हैं, जो कर्मचारियों के मुकाबले काफी बेहतर है.

टू-व्हीलर क्यों हावी हैं?

इसकी 4 बड़ी वजहें हैं:

  • वजह- 1: पब्लिक ट्रांसपोर्ट की पहुंच ही नहीं है. देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा गांवों और कस्बों में रहता है, जहां बसें भी नियमित नहीं चलतीं. ग्रामीण इलाकों में 37.1% कर्मचारी टू-व्हीलर इस्तेमाल करते हैं, जबकि शहरों में यह आंकड़ा 52.3% है.
  • वजह- 2: एक टू-व्हीलर चलाने की लागत प्रति किलोमीटर 50-70 पैसे पड़ती है, जो बस या मेट्रो के किराए से कम हो सकती है. साथ ही टू-व्हीलर से आप कहीं भी, कभी भी जा सकते हैं. बस स्टॉप तक पैदल जाने की जरूरत नहीं, बस का इंतजार नहीं.
  • वजह- 3: लास्ट-माइल कनेक्टिविटी की कमी है. मेट्रो या बस से उतरने के बाद घर या ऑफिस तक पहुंचने का कोई साधन नहीं होता, तो लोग पूरे सफर के लिए ही टू-व्हीलर चुन लेते हैं.
  • वजह- 4: महिलाओं के लिए बसें अहम हैं. सर्वे में यह भी सामने आया कि शहरी महिलाओं में 21.7% बस से काम पर जाती हैं, जबकि शहरी पुरुषों में यह आंकड़ा सिर्फ 6.9% है. यानी बसें महिलाओं के लिए सबसे बड़ा सहारा हैं. केरल में तो 46.8% शहरी महिलाएं बस से काम पर जाती हैं. यही वजह है कि तमिलनाडु जैसे राज्यों में महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा की योजनाएं चल रही हैं.

शहर बनाम गांव में कितना फर्क?

सर्वे में यह भी साफ हुआ कि शहर और गांव में सफर करने के तरीके में जमीन-आसमान का फर्क है.

गांवों में 36% लोग पैदल काम पर जाते हैं, जबकि शहरों में यह आंकड़ा सिर्फ 14% है. गांवों में लोग ज्यादा पैदल चलते हैं क्योंकि दूरियां कम होती हैं और पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी सीमित है.

शहरों में टू-व्हीलर और कार का इस्तेमाल ज्यादा है. शहरी क्षेत्रों में 58% लोग टू-व्हीलर या कार से काम पर जाते हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह आंकड़ा 39% है.

किराया कितना महंगा पड़ता है?

सर्वे के मुताबिक, औसतन एक कर्मचारी हर महीने 785 रुपये सिर्फ आने-जाने पर खर्च करता है. इसमें भी शहरी कर्मचारी 1,044 रुपये खर्च करते हैं, जबकि ग्रामीण कर्मचारी 612 रुपये खर्चते हैं. यानी शहरों में सफर करना 70% ज्यादा महंगा पड़ता है.

पुरुष और महिलाओं के खर्च में भी बड़ा अंतर है. पुरुष 835 रुपये खर्च करते हैं, जबकि महिलाएं सिर्फ 533 रुपये. इसकी वजह यह है कि महिलाएं कम दूरी तय करती हैं और बस जैसे सस्ते साधनों का इस्तेमाल ज्यादा करती हैं.

सफर में कितना समय लगता है?

एक औसत भारतीय कर्मचारी को काम पर पहुंचने में 25 मिनट लगते हैं. शहरों में 27 मिनट और गांवों में 23 मिनट. 83.4% कर्मचारी 30 मिनट के अंदर काम पर पहुंच जाते हैं.

सुबह की भीड़ सबसे ज्यादा 8 से 10 बजे के बीच होती है. इस दौरान 56.5% लोग घर से निकलते हैं. 94.9% कर्मचारी सुबह 10 बजे से पहले ही घर से निकल जाते हैं.

दूसरे सफर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का हाल बेहतर

अगर काम और पढ़ाई के अलावा दूसरे कामों की बात करें तो पब्लिक ट्रांसपोर्ट का हाल थोड़ा बेहतर दिखता है. रात भर की यात्राओं (ओवरनाइट ट्रिप) में 73.5% लोग बस और रेल का इस्तेमाल करते हैं. इसमें बसों की हिस्सेदारी 55.8% और रेल की 17.7% है.

लंबी दूरी की यात्रा में लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन रोज के ऑफिस-कॉलेज सफर में नहीं.

सरकार की योजनाएं और चुनौतियां

2014 में 5 शहरों में 248 किलोमीटर मेट्रो थी, जो 2026 तक 26 शहरों में 1,150 किलोमीटर हो गई है. सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ 5% शहरी कर्मचारी ही मेट्रो का इस्तेमाल करते हैं.

एक बड़ी अड़चन यह भी है कि भारत में अभी तक कोई एकीकृत ‘नेशनल स्मार्ट पब्लिक ट्रांसपोर्ट मिशन’ नहीं है, जो बस, मेट्रो, ट्रेन और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी को एक साथ जोड़ सके. सरकार अब इलेक्ट्रिक बसों को बढ़ावा दे रही है. लक्ष्य है कि 2035 तक बस बिक्री में इलेक्ट्रिक बसों की हिस्सेदारी 35-40% हो जाए.

कुल मिलाकर भारत में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की हालत कमजोर है और लोगों का भरोसा टू-व्हीलर जैसे प्राइवेट साधनों पर ज्यादा है. अगर सरकार को ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और सड़क हादसों से निपटना है, तो सिर्फ मेट्रो बनाना काफी नहीं है. बसों की संख्या बढ़ानी होगी, उनका नेटवर्क गांवों तक पहुंचाना होगा और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी को मजबूत करना होगा. तभी लोग टू-व्हीलर छोड़कर पब्लिक ट्रांसपोर्ट की तरफ लौटेंगे.



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