आपको स्कूल के दिन याद होंगे. एग्जाम में 33% नंबर आते ही हम कहते थे, ‘शुक्र है पास हो गए’. लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यही 33% उनकी सबसे बड़ी मुसीबत बन गया है. ताजा आंकड़े बताते हैं कि ट्रंप की लोकप्रियता (जिसे अप्रूवल रेटिंग कहते हैं) अब 33% पर आ गिरी है. यानी अमेरिका की सिर्फ एक-तिहाई जनता ही उनके काम से खुश और 64% लोग नाखुश हैं. आखिर ऐसा क्यों हुआ और इसका आने वाले चुनावों पर क्या असर पड़ेगा…
पहले पूरा आंकड़ा साफ-साफ देख लें
यह रेटिंग रॉयटर्स और इप्सोस ने मिलकर निकाली है. दोनों ने 14 से 17 अगस्त 2026 के बीच 1,166 अमेरिकी नौजवानों से बात की.
- 33% लोगों ने कहा कि वे ट्रंप के काम से खुश हैं (अप्रूव).
- 64% लोगों ने कहा कि वे उनके काम से नाखुश हैं (डिसअप्रूव).
- इस सर्वे में गलती की गुंजाइश यानी मार्जिन ऑफ एरर सिर्फ 3% है. ये आंकड़े काफी सटीक हैं.
बात सिर्फ इस एक पोल की नहीं है. दूसरे बड़े पोल भी यही तस्वीर दिखा रहे हैं:
- इकोनॉमिस्ट/यूगोव ने भी ट्रंप को 33% ही बताया है.
- पोल्स का औसत डेटा निकालने वाला रियलक्लियरपॉलिटिक्स के मुताबिक, अप्रूवल 39.2% है और डिसअप्रूवल 58.6% है.
- न्यूयॉर्क टाइम्स का पोल कहता है कि 37% लोग सहमत हैं और 59% नहीं हैं.
यह नंबर कोई पहली बार नहीं आया है. ट्रंप के पहले कार्यकाल (दिसंबर 2017) में भी यह रेटिंग 33% पर आ गई थी. मतलब, यह उनके दोनों कार्यकालों का संयुक्त रिकॉर्ड निचला स्तर है.
डोनाल्ड ट्रंप की रेटिंग्स इतनी क्यों गिरीं?
एक्सपर्ट्स ट्रंप की रेटिंग गिरने की दो बड़ी वजहें बताते हैं:
1. ईरान युद्ध: ‘कुछ हफ्तों’ वाला वादा टूटा
ट्रंप ने 2024 के चुनाव में वादा किया था कि वे अमेरिका को नई और लंबी जंगों में नहीं उलझने देंगे. 2026 में उन्होंने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला कर दिया. शुरुआत में यह कहा गया कि यह संघर्ष कुछ हफ्तों में खत्म हो जाएगा. ऐसा नहीं हुआ, यह जंग लंबी खिंच गई.
ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते पर कंट्रोल कर लिया. इस वजह से दुनिया का 20% तेल व्यापार रुक गया. इसका सीधा असर अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों पर पड़ा और कीमतें आसमान पर पहुंच गईं. सर्वे के मुताबिक,
- 80% अमेरिकियों (जिनमें 71% रिपब्लिकन भी शामिल हैं) को लगता है कि ईरान के साथ यह युद्ध बहुत लंबा चलेगा.
- सिर्फ 16% लोग ही मानते हैं कि यह जल्दी खत्म हो सकता है.
- सिर्फ 20% लोगों को ही यह युद्ध सही लगता है. बाकी 80% इसे गलत मानते हैं.
ट्रंप ने एक रैली में कहा था, ‘पेट्रोल के लिए थोड़ा ज्यादा पैसा देना ठीक है, ताकि ईरान परमाणु बम न बना सके.’ यह बात आम लोगों को बिल्कुल रास नहीं आई, क्योंकि उनकी जेब पर सीधा बोझ पड़ रहा था.
2. महंगाई: जेब पर लगा सीधा वार
जब पेट्रोल महंगा होता है, तो रोटी से लेकर कपड़े और सब्जी तक सब कुछ महंगा हो जाता है. यहां भी ऐसा ही हुआ.
- फाइनेंशियल टाइम्स के पोल में 53% वोटर्स ने साफ कहा कि ट्रंप के कार्यकाल में उनकी आर्थिक हालत पहले से खराब हो गई है.
- महंगाई को संभालने में ट्रंप की रेटिंग सबसे खराब है. अगर हम ‘नेट अप्रूवल’ यानी जितने सहमत हैं, उनमें से जितने नहीं सहमत हैं, उन्हें घटा दें, तो महंगाई पर उनकी रेटिंग -42.4% है. यानी बहुत बुरी स्थिति है.
- अर्थव्यवस्था पर उनकी रेटिंग -29.6% और व्यापार पर -25.7% है.
- एक दूसरे पोल में 71% रजिस्टर्ड वोटर्स ने कहा कि वे ट्रंप के महंगाई वाले काम से बिल्कुल खुश नहीं हैं.
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के जानकार (वरिष्ठ फेलो) डैरेल वेस्ट ने कहा, ‘महंगाई इतनी बढ़ गई है कि लोगों की तनख्वाह काफी नहीं पड़ रही. उन्हें बिल चुकाने में मुश्किल हो रही है. खाने, पेट्रोल और इलाज के खर्चे उठाना भारी पड़ रहा है.’
क्या सिर्फ विरोधी ही नाराज हैं या अपने भी दूर हो रहे?
यहां सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रंप की रेटिंग सिर्फ डेमोक्रेट पार्टी वालों (उनके विरोधियों) में नहीं गिरी है, बल्कि उनके अपने ही समर्थकों (रिपब्लिकन) में भी बड़ी गिरावट आई है:
ट्रंप के सबसे कट्टर समर्थक, जिन्हें मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) कहते हैं, वे अब भी 92% तक ट्रंप के साथ डटे हैं. लेकिन जो रिपब्लिकन ‘MAGA’ नहीं हैं, उनमें रेटिंग 90% से गिरकर 51% पर आ गई है. यह एक बहुत बड़ा खतरा है.
मिडटर्म 2026 चुनाव में रेटिंग से क्या असर पड़ेगा?
नवंबर 2026 में अमेरिका में ‘मिडटर्म चुनाव’ होने वाले हैं. यानी कांग्रेस की सभी 435 सीटों और सीनेट की एक-तिहाई सीटों पर वोटिंग होगी:
- अमेरिका में पुराना नियम है कि जब राष्ट्रपति की रेटिंग इतनी खराब होती है, तो मिडटर्म में उनकी पार्टी (यानी रिपब्लिकन) को बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ता है.
- सबसे बड़ा संकेत यह है कि करीब 10 सालों में पहली बार, रजिस्टर्ड वोटर्स ने डेमोक्रेट्स को अर्थव्यवस्था को संभालने में ज्यादा सक्षम माना है. 38% लोगों ने डेमोक्रेट्स पर भरोसा जताया, जबकि सिर्फ 35% ने रिपब्लिकन पर.
- रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए अब अपने जिलों में यह कहना बहुत मुश्किल हो गया है कि ‘हम ट्रंप के साथ हैं, हमें वोट दो’.
क्या यह रेटिंग और गिर सकती है?
विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर ए. के. पाशा का कहना है कि ट्रंप की रेटिंग और भी नीचे जा सकती है:
- युद्ध का लंबा खिंचना: 17 अगस्त तक की 60 दिनों की समझौता अवधि खत्म हो गई है, लेकिन शांति की कोई उम्मीद नहीं दिख रही. यह युद्ध जितना लंबा चलेगा, जनता का गुस्सा उतना बढ़ेगा.
- महंगाई थमने का नाम नहीं: 58% मतदाताओं को लगता है कि ईरान की वजह से बढ़ी हुई कीमतें लंबे समय तक ऐसी ही रहेंगी और जल्दी वापस नहीं आएंगी. जब आम आदमी को लगे कि उसकी मुश्किलें लंबी चलेंगी, तो वह और गुस्सा हो जाता है.
- चुनाव का दबाव: जैसे-जैसे नवंबर करीब आएगा, नाराज वोटर (जो आमतौर पर ज्यादा उत्साह से वोट करते हैं) पोलिंग बूथ पर डेमोक्रेट्स को वोट देने उतरेंगे.
2017 में भी ट्रंप की रेटिंग 33% पर थी और फिर भी वे 2024 में दोबारा चुनाव जीत गए. इस बार बड़ा युद्ध चल रहा है और महंगाई अपनी चरम सीमा पर है.
