भारत की राजनीति में जब परिवार और पार्टी आमने-सामने आ जाएं, तो रिश्ते अक्सर वहीं टूटते हैं जहां सबसे मजबूत होने चाहिए थे. बहुत समाज पार्टी यानी बसपा में मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. इसके पीछे की वजह थी उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ का राजनीति में बने रहना. यह कोई पहला मामला नहीं है. बिहार में लालू प्रसाद यादव के साले से लेकर महाराष्ट्र में पवार और ठाकरे परिवारों तक, हर जगह परिवार के लोग सियासी विलेन बनते रहे हैं. तो आइए जानते हैं कि कैसे रिश्तेदार बन जाते हैं सबसे बड़े विलेन…
मायावती का परिवार: भतीजे को ससुर की कीमत चुकानी पड़ी
बात 10 सिंबर 2026 की है. मायावती ने अपने भतीजे और बसपा के पूर्व राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद को पार्टी से ‘पूरी तरह मुक्त’ कर दिया. यह फैसला उस दिन आया जब आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ ने राजनीति से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया.
3 सितंबर 2026 को मायावती ने आकाश को राष्ट्रीय संयोजक के पद से हटाकर कार्यकर्ता बना दिया था, क्योंकि उनके मुताबिक आकाश में ‘राजनीतिक परिपक्वता’ की कमी थी. फिर 9 सितंबर को मायावती ने सब के सामने शर्त रखी कि अगर अशोक सिद्धार्थ अपने दामाद के भविष्य की चिंता करते हैं, तो उन्हें राजनीति से पूरी तरह संन्यास ले लेना चाहिए, ताकि आकाश पार्टी में आजादी से काम कर सकें.
अशोक सिद्धार्थ उस वक्त पहले ही 2 अगस्त 2026 को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में बसपा से निष्कासित किए जा चुके थे. अशोक ने मायावती की बात मानकर संन्यास की घोषणा कर दी, लेकिन मायावती ने फिर भी आकाश को बाहर कर दिया. दरअसल, आकाश ने मायावती के उस पोस्ट को रीपोस्ट नहीं किया जिसमें अशोक सिद्धार्थ के संन्यास की बात थी.
यह आकाश आनंद का तीसरा निष्कासन था. पहले मई 2024 में और फिर मार्च 2025 में उन्हें पार्टी से निकाला गया था. हर बार एक महीने के अंदर वापस भी ले लिया गया और प्रोमशन भी मिला था. हालांकि, इस बार मामला अलग रहा.
इस बीच आकाश के भाई ईशान आनंद ने मायावती के उस पोस्ट को रीपोस्ट किया जिसमें उनके ही भाई की आलोचना हुई थी. ईशान ने लिखा, ‘बहुजन आंदोलन किसी व्यक्ति या परिवार से नहीं, बल्कि त्याग, संघर्ष और विचारधारा से आगे बढ़ता है.’ यानी भाई ने भाई के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.
लालू यादव परिवार: बगावत की पुरानी कहानी
बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव के परिवार में ससुराल पक्ष का बड़ा दबदबा रहा है. लालू के साले साधु यादव और सुभाष यादव ने अलग-अलग समय पर लालू के खिलाफ मोर्चा खोला.
शुरुआत 2005 से मानी जाती है, जब राष्ट्रीय जनता दल बिहार की सत्ता से बाहर हुआ. इसी साल साधु यादव की पत्नी इंदिरा देवी को गोपालगंज सीट से टिकट नहीं मिला, तो उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया.
जुलाई 2005 में साधु यादव ने खुलकर लालू के खिलाफ बगावत का झंडा उठा दिया और कहा कि लालू अब ‘गरीबों के मसीहा’ नहीं रहे, बल्कि अपराधियों और अमीरों के साथ मिल गए हैं. सितंबर 2005 में एक और साला सुभाष यादव भी बगावत कर बैठे.
2025 में यह कहानी और गहरी हो गई. बिहार विधानसभा चुनाव में राजद की करारी हार के बाद लालू की बेटी रोहिणी आचार्य ने 15 नवंबर 2025 को राजनीति के साथ-साथ परिवार से भी नाता तोड़ने का ऐलान कर दिया. रोहिणी ने आरोप लगाया कि उन्हें अपमानित किया, गालियां दीं और चप्पल भी उठाई.
इस पर लालू के साले साधु यादव ने तेजस्वी यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि तेजस्वी में ‘बहुत ज्यादा अहंकार’ आ गया है और रोहिणी के साथ ‘अन्याय’ हुआ है. साधु यादव ने यहां तक मांग कर दी कि तेजस्वी को नेता प्रतिपक्ष से हटा दिया जाए.
17 नवंबर 2025 को लालू प्रसाद यादव ने पहली बार इस पूरे विवाद पर चुप्पी तोड़ी और तेजस्वी का पक्ष लेते हुए कहा कि वे ‘कड़ी मेहनत कर रहे हैं’ और ‘पार्टी को आगे ले जाएंगे.’
पासवान का परिवार: टिकट नहीं मिला तो टीवी पर रो पड़े
रामविलास पासवान के परिवार में दामाद ने जब बगावत की, तो मामला टीवी पर सबके सामने आ गया. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले पासवान के दामाद अनिल कुमार साधु को टिकट नहीं मिला. वे कुटुंबा (आरक्षित) सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन टिकट हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को दे दिया गया. इससे नाराज होकर साधु ने 19 सितंबर 2015 को पार्टी के खिलाफ बगावत कर दी और सभी जिलों में दलित सेना के उम्मीदवार उतारने की बात कही.
असली तमाशा 21 सितंबर 2015 को हुआ, जब अनिल कुमार साधु टीवी चैनल पर रोते हुए दिखाई दिए. साधू ने रामविलास पासवान और चिराग पासवान दोनों पर निशाना साधते हुए चिराग को ‘फ्लॉप हीरो’ कहा और कहा कि वे दलित नेता नहीं हैं.
साधू ने कहा, ‘चिराग पासवान जैसे फिल्म में फ्लॉप हुए, वैसे ही बिहार के दलित उन्हें फ्लॉप करके दिल्ली भेज देंगे.’ अनिल साधु ने यह भी कहा कि उन्हें टिकट इसलिए नहीं मिला क्योंकि चिराग पासवान चाहते थे कि पार्टी में सिर्फ उनका चलें.
हालांकि, यह बगावत ज्यादा दिन नहीं चली. अक्टूबर 2015 में अनिल कुमार साधु ने अपने बयान वापस ले लिए और कहा कि जो कहा था वह ‘भावनात्मक विस्फोट’ था. साधू ने कहा, ‘परिवार में अब सब ठीक है’ और पासवान को अपना ‘संरक्षक’ बताया.
इसके बाद 2025 में पासवान परिवार में ‘दामाद आयोग’ का मुद्दा उठा. बिहार सरकार ने अनुसूचित जाति आयोग और महादलित आयोग का गठन किया. इसमें चिराग पासवान के बहनोई मृणाल पासवान को अध्यक्ष बनाया गया. इस पर तेजस्वी यादव ने ‘नेशनल दामाद आयोग’ कहकर हमला बोला.
बता दें कि चिराग के दो जीजा हैं- मृणाल पासवान और अरुण भारती. जब एक को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया, तो दूसरा नाराज हो गया.
पवार-ठाकरे के परिवार: चाचा-भतीजे की लड़ाई और विरासत
महाराष्ट्र में पवार परिवार की कहानी 2026 में अजित पवार की मौत के बाद और उलझ गई. 28 जनवरी 2026 को अजित पवार का विमान बारामती एयरपोर्ट के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें उनकी मौत हो गई. अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार ने तेजी से कमान संभाली और उपमुख्यमंत्री बन गईं. शरद पवार और परिवार के बाकी सदस्यों ने कहा कि सुनेत्रा के उपमुख्यमंत्री बनने से पहले उनसे कोई सलाह नहीं ली गई.
इस बीच अजित पवार के भतीजे रोहित पवार ने उनकी मौत की जांच को लेकर सवाल उठाना शुरू कर दिए. फरवरी 2026 में रोहित पवार ने आरोप लगाया कि पायलट पर दबाव डाला गया था और विमान को जबरन लैंडिंग के लिए मजबूर किया गया. रोहित ने अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से जांच की मांग की. मई 2026 में रोहित पवार ने CBI हेडक्वार्टर के बाहर ताला और जंजीर लेकर प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन भी किया.
पवार परिवार में यह टकराव सिर्फ जांच तक सीमित नहीं रहा. अप्रैल 2026 में NCP के दोनों गुटों के विलय की बात फिर उठी, लेकिन पारिवारिक खींचतान के चलते यह मामला अटक गया. सूत्रों के मुताबिक, अजित पवार के बेटों ने संगठन पर कब्जा जमाने की कोशिशें तेज कर दीं, जिससे पुराने नेताओं के साथ टकराव बढ़ गया.
ठाकरे परिवार में भी चाचा-भतीजे की जंग 20 साल से चल रही है. 2005 में जब बाल ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को शिवसेना का नेता चुना, तो राज ठाकरे ने पार्टी से अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली. 2024 के विधानसभा चुनाव में यह जंग चचेरे भाइयों तक पहुंच गई. उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे और राज के बेटे अमित ठाकरे दोनों मैदान में थे. आदित्य वर्ली से जीते, जबकि अमित महीम से तीसरे नंबर पर रहे.
दिलचस्प बात यह रही कि वर्ली में राज ठाकरे की MNS ने उम्मीदवार खड़ा किया, जिसने शिवसेना के मिलिंद देवड़ा का वोट काटा और आदित्य को जिता दिया. वहीं महीम में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के उम्मीदवार ने अमित ठाकरे का वोट काटा और अमित हार गए. यानी चाचा की पार्टी ने भतीजे को हराया और चाचा की पार्टी ने भतीजे को जिताया. अक्टूबर 2024 में अमित ठाकरे ने साफ कह दिया था कि राज और उद्धव के बीच दोबारा मेल-मिलाप नहीं होगा.
तो आखिर रिश्तेदार विलेन क्यों बनते हैं?
इन सभी किस्सों को जोड़कर देखें तो एक बात साफ होती है कि राजनीति में परिवार बढ़ने पर अपेक्षाएं भी बढ़ती हैं. हर रिश्तेदार को लगता है कि उसका हक है और उसकी बारी आनी चाहिए. हक मिलने तक वही रिश्तेदार विरोध का चेहरा बन जाता है. एक्सपर्ट्स 5 बड़ी वजहें बताते हैं:
- उत्तराधिकारी पैटर्न: पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई ने कहा, ‘दूसरी पीढ़ी के नेताओं में रिटर्न डिमिनिशिंग होता है. ज्यादातर मामलों में वे राजनीति में मजबूरी में आते हैं और उन्हें कभी चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ता. जब शीर्ष पद के लिए एक से ज्यादा दावेदार होते हैं, तो प्रतिस्पर्धा अनिवार्य हो जाती है. जब एक ही परिवार के भीतर दो-तीन लोग खुद को ‘असली वारिस’ मानते हैं, तो टकराव बढ़ जाता है.
- शून्य-योग खेल: CSDS के संजय कुमार कहते हैं कि राजनीतिक परिवारों में सत्ता सिर्फ पद नहीं होती. वह संपत्ति, ठेके और स्थानीय पहचान से सीधे जुड़ी होती है. जब पार्टी एक ‘पारिवारिक फर्म’ बन जाती है, तो हर पद और हर टिकट एक सीमित संसाधन बन जाता है. अगर भतीजे को टिकट मिला, तो बेटे को कुछ नहीं मिलेगा. यह सीधा-सीधा शून्य-योग का खेल है, जहां एक की जीत दूसरे की हार है.
- व्यक्तिगत ख्वाहिशें: हर राजनीतिक वारिस पार्टी में अपनी जगह बनाना चाहता है, लेकिन जब परिवार का मुखिया किसी एक को तरजीह देता है, तो बाकी लोग खुद को ‘नजरअंदाज’ किया हुआ महसूस करते हैं. समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव ने अपने भतीजे शिवपाल यादव के बजाय बेटे अखिलेश यादव को आगे बढ़ाया, तो शिवपाल ने बगावत कर दी. इनेलो में ओम प्रकाश चौटाला ने बेटे और पोते दोनों को पार्टी से बाहर कर दिया. इसके बाद पोते दुष्यंत चौटाला ने अलग पार्टी बना ली. जब ख्वाहिशें और पारिवारिक निष्ठा आमने-सामने आती हैं, तो परिवार टूटता है.
- आंतरिक लोकतंत्र: एक्सपर्ट्स का मानना है कि वंशवादी राजनीति सिर्फ सामंती अवशेष नहीं है, बल्कि ‘आधुनिक पार्टी संरचनाओं और कमजोर आंतरिक लोकतंत्र का उत्पाद’ है. जब पार्टी में कार्यकर्ताओं के लिए आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं होता, तो सारी उम्मीदें परिवार के भीतर ही सिमट जाती हैं. जब परिवार में भी जगह नहीं मिलती, तो बगावत ही इकलौता रास्ता बचता है.
- बदलता वोटर: आज का वोटर पहले से ज्यादा शिक्षित और जागरूक हो रहा है. वह ‘वंश’ से ज्यादा ‘प्रदर्शन’ को तरजीह देने लगा है. जब किसी वारिस को जनता का समर्थन नहीं मिलता, तो परिवार में साख गिरती है और बाकी दावेदार उसे हटाने की कोशिश करते हैं. 2025 के बिहार चुनाव में राजद की करारी हार के बाद लालू परिवार में जो टूट सामने आई, वह इसी दबावज का नतीजा था.
इन सभी वजहों को जोड़कर देखें तो एक बात साफ होती है कि राजनीति में रिश्तेदार तभी तक साथ रहते हैं, जब तक हितों का टकराव न हो. जिस दिन सत्ता, टिकट या संपत्ति का बंटवारा करना पड़ता है, उस दिन अपना ही पराया बन जाता है.
