अगर आप भी पारंपरिक खेती के ढर्रे से हटकर कुछ ऐसा आजमाना चाहते हैं. जिसमें कम जमीन, कम रिस्क और तगड़ा रिटर्न मिले तो मशरूम फार्मिंग आपके लिए एक बढ़िया ऑप्शन बन सकती है. आजकल कई किसान गेहूं-धान की जगह दूसरी फसलों की ओर तेजी से मुड़ रहे हैं और इस लिस्ट में मशरूम सबसे ऊपर चल रही है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके लिए आपको कई एकड़ खुली जमीन की बिल्कुल जरूरत नहीं होती.
बल्कि सिर्फ एक बीघा जगह में बढ़िया शेड बनाकर आप शानदार कमाई शुरू कर सकते हैं. शहरों से लेकर कस्बों के होटलों, रेस्टोरेंट्स और आम घरों में मशरूम की डिमांड साल भर आसमान छू रही होती है. सही तकनीक और थोड़ी सी ट्रेनिंग के जरिए एक बीघा में की गई मशरूम की खेती आपकी इनकम को उम्मीद से कहीं ज्यादा रफ्तार दे सकती है. तो चलिए आपको बताते हैं कि इसमें लागत कितनी आएगी, खर्चा कितना होगा और मुनाफा कितना बचेगा.
कितना लगेगा पैसा?
एक बीघा जमीन पर मशरूम का सेटअप तैयार करने के लिए सबसे पहले आपको एक सेमी-कंट्रोल्ड शेड जो कि बैम्बू या पॉलीहाउस स्ट्रक्चर से तैयार करना होता है. इसमें वर्टिकल फार्मिंग के लिए मल्टी-लेयर रैक्स, भूसा या पुआल से बनने वाला कंपोस्ट, अच्छी क्वालिटी का मशरूम स्पॉन और केसिंग सॉइल का खर्च शामिल होता है. अगर आप 1 बीघा जगह में करीब 2500 से 3000 बैग्स का बटन या फिर ऑयस्टर मशरूम का सेटअप लगाते हैं. तो शेड का बेसिक ढांचा तैयार करने में लगभग 1.5 से 2 लाख रुपये का शुरुआती खर्च आता है.
जो कई सालों तक चलता है. इसके बाद कंपोस्ट, बीज, मजदूरी, बिजली, पानी और नमी मेंटेन करने वाले इक्विपमेंट्स को मिलाकर हर सीजन का ऑपरेशनल खर्च करीब 1.2 से 1.5 लाख रुपये के आसपास बैठता है. मशरूम की खेती में अच्छी बात यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत इस सेटअप पर 40% से 50% तक की सब्सिडी भी देती हैं. जिससे आपकी जेब पर पड़ने वाला बोझ काफी कम हो जाता है.
बाजार में कितने का बिकेगा माल?
मशरूम की खेती में लागत के हिसाब के बाद अब बात करते हैं इसकी खेती और उससे होने वाले टर्नओवर की. एक बीघा के कवर्ड एरिया में अगर सही तापमान और नमी मेंटेन की जाए तो एलगभग 2.5 से 3 महीने की फसल में 4000 से 5000 किलो तक फ्रेश मशरूम आसानी से निकल आता है. मार्केट रेट्स की बात करें तो थोक मंडियों में बटन मशरूम का एवरेज रेट 120 से 150 रुपये प्रति किलो के बीच आसानी से मिल जाता है.
जबकि सर्दियों के पीक सीजन या ऑफ-सीजन में यह दाम 180 से 200 रुपये प्रति किलो तक भी पहुंच जाता है. अगर हम एक एवरेज अनुमान भी लगाएं तो और 130 रुपये प्रति किलो का थोक भाव भी लेकर चलें तो 4500 किलो प्रोडक्शन पर आपकी पूरी कमाई करीब 5.8 लाख से 6 लाख रुपये तक पहुंच जाती है. अगर आप लोकल होटलों या सीधे कंज्यूमर्स को 200 ग्राम के पैकेट्स में ब्रांड बनाकर सप्लाई करते हैं तो यही रेवेन्यू और बढ़ सकता है.
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कितना हो सकता है कुल मुनाफा?
अब सबसे जरूरी सवाल कि सारे खर्चे काटकर किसान की जेब में मुनापा कितना बचेगा? अगर 6 लाख रुपये के कुल टर्नओवर में से कंपोस्ट, स्पॉन, बिजली और लेबर का 1.5 लाख रुपये का रनिंग खर्च पूरी तरह घटा दिया जाए तो भी लगभग 3 महीने में आपका सीधा मुनाफा 4 लाख से 4.5 लाख रुपये साफ निकलकर आता है.
साल में अगर आप इसकी 2 से 3 तरीके से मशरूम निकाल लेते हैं. तो सालाना कमाई 8 से 12 लाख रुपये के पार जा सकती है. इस प्रॉफिट को और बढ़ाने के किसान बिचौलियों के बजाय खुद लोकल सुपरमार्केट्स, ढाबों में डायरेक्ट सप्लाई कर सकते हैं. इसके अलावा बची हुई मशरूम को सुखाकर उसका पाउडर, अचार या पापड़ बनाकर प्रोसेस करके 20% तक और मुनाफा बढ़ा सकते हैं.

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