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सीवर सफाई से हर साल कितनी मौत? राहुल के सवाल पर सरकार ने दिया ये जवाब


देश में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. 1 जनवरी 2019 से लेकर 30 जून 2026 के बीच देश भर में 498 सफाई कर्मचारियों की सीवर में दम घुटने से मौत हो चुकी है. यह चौंकाने वाले आंकड़े खुद सरकार ने 4 अगस्त 2026 को लोकसभा में पेश किए हैं.

सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी के एक सवाल का लिखित जवाब देते हुए यह जानकारी साझा की. हालांकि इसी जवाब में सरकार ने एक हैरान करने वाला दावा भी किया है कि देश में ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ यानि हाथ से मैला उठाने की वजह से एक भी मौत दर्ज नहीं हुई है.

राहुल गांधी ने सरकार से क्या पूछा था?

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने लोकसभा में सरकार से पांच अहम सवाल पूछे थे. 
1- उन्होंने पूछा था कि देश में कितने लोग खतरनाक सफाई में लगे हैं ? 
2- 2019 से अब तक कितनी मौतें हुईं? 
3 – सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किया गया 30 लाख रुपये का मुआवजा कितने लोगों को मिला? 
4 – जिलों द्वारा दी गई शून्य मौतों की रिपोर्ट का कोई ऑडिट हुआ या नहीं ?
5 – क्या सीवर सफाई के पूरी तरह मशीनीकरण की कोई समयसीमा तय की गई है?

औसतन हर 11 दिन में एक कर्मचारी की मौत

सरकार ने राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के हवाले से जो आंकड़े संसद में रखे हैं वो डराने वाले हैं. 2019 में 132 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई. इसके बाद 2020 में 34, 2021 में 62, 2022 में 88, 2023 में 65, 2024 में 54 और 2025 में 47 कर्मचारियों की जान गई. चिंता की बात यह है कि साल 2026 में 30 जून तक 16 मौतें दर्ज हो चुकी हैं. इन आंकड़ों का सीधा मतलब है कि देश में औसतन हर 11वें दिन एक सफाई कर्मचारी सीवर के अंधेरे में अपनी जान गंवा रहा है.

30 लाख के मुआवजे की हकीकत क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने 20 अक्टूबर 2023 को एक अहम फैसला सुनाते हुए सीवर से होने वाली मौत पर मुआवजा 10 लाख से बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दिया था लेकिन जमीन पर यह आदेश पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन 498 मौतों में से सिर्फ 75 मामलों में ही 30 लाख रुपये का पूरा मुआवजा दिया गया. 345 परिवारों को पुराने नियम के तहत 10 लाख रुपये ही मिले.

22 मामलों में आंशिक मुआवजा मिला जबकि 56 मामले ऐसे हैं जिनमें मुआवजा दिए जाने की सरकार के पास कोई पक्की जानकारी या पुष्टि ही नहीं है. 2026 के पहले छह महीनों में हुई 16 मौतों में से भी केवल 6 मामलों में पूरा मुआवजा दिया गया है.

498 मौतें फिर भी सरकार का जवाब ‘शून्य’ क्यों?

सरकार का जवाब विरोधाभासी लग सकता है लेकिन इसके पीछे कानून की दो अलग-अलग परिभाषाएं हैं.’मैनुअल स्कैवेंजर्स अधिनियम 2013 के मुताबिक हाथ से मैला उठाने (खुली नाली या गड्ढे से) वाले को मैनुअल स्कैवेंजर माना जाता है. सरकार का कहना है कि इस वजह से कोई मौत नहीं हुई. वहीं बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर या सेप्टिक टैंक में उतरने को ‘खतरनाक सफाई’ की श्रेणी में रखा गया है. सीवर में होने वाली मौतें इसी दूसरी श्रेणी में गिनी जाती हैं. इसीलिए सरकार 498 मौतों का आंकड़ा भी देती है और यह भी कहती है कि मैनुअल स्कैवेंजिंग से कोई नहीं मरा.

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‘जीरो’ रिपोर्ट का नहीं हुआ कोई ऑडिट

राहुल गांधी ने पूछा था कि जिन जिलों ने खुद को मैनुअल स्कैवेंजर मुक्त घोषित किया है क्या उनकी रिपोर्ट का कोई ऑडिट हुआ? सरकार ने इसका जवाब स्पष्ट रूप से ‘ना’ में दिया. 2024-25 में हुए नए सर्वे में जिलों ने खुद को मुक्त बताया और सरकार ने बिना अलग से ऑडिट कराए उसे ही अंतिम मान लिया जबकि 2013 और 2018 के सर्वे में देश भर में 58,098 मैनुअल स्कैवेंजर पहचाने गए थे जिनमें सबसे ज्यादा (32,473) उत्तर प्रदेश से थे.

मशीनीकरण की कोई डेडलाइन नहीं

अपने जवाब में सरकार ने यह नहीं बताया कि सीवर में इंसान के उतरने की मजबूरी पूरी तरह कब खत्म होगी. मशीनीकरण के लिए कोई तय समयसीमा (डेडलाइन) नहीं दी गई. हालांकि मंत्री ने बताया कि जुलाई 2023 में शुरू हुई ‘नमस्ते योजना’ के तहत अब तक 89,915 सीवर कर्मचारियों का सत्यापन हो चुका है. सरकार इन्हें सुरक्षा किट, ट्रेनिंग, मशीन खरीदने के लिए सब्सिडी और स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाएं मुहैया करा रही है.

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