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Explained: यूक्रेन ने पिस्तौल से तोप को दी मात! कैसे दुनिया का तीसरा सबसे ताकतवर देश घुटनों पर, रूस के लिए कितनी बड़ी हार?


दुनिया का तीसरा सबसे ताकतवर देश, जिसके पास परमाणु हथियार का सबसे बड़ा जखीरा है, हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं, S-400 और S-500 जैसे एडवांस्ड एयर डिफेंस सिस्टम हैं, वो एक ऐसे देश के सामने हार की कगार पर पहुंच जाए जिसकी अपनी कोई नेवी तक नहीं है. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, प्रतिबंधों और युद्ध की वजह से विदेशी मुद्रा का आना लगभग बंद हो गया. इससे रूबल पर दबाव लगातार बढ़ता गया. आखिर रूस चूक कहां रहा है, यूक्रेन ने कैसे पलटवार किया और इस हार के मायने रूस और दुनिया के लिए क्या हैं…

वो नौसैनिक बेड़ा जो सिर्फ 9 दिन में ध्वस्त हो गया

जुलाई 2026 में यह कहानी शुरू होती है समुद्र से. अजोव सागर और काला सागर में रूस का दबदबा था, लेकिन यूक्रेन ने महज 9 दिनों के अंदर 116 रूसी जहाजों और नौसैनिक ठिकानों पर हमले करके पूरी तस्वीर बदल दी. इन हमलों की खास बात ये रही कि इसमें यूक्रेन ने एक भी युद्धपोत का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि सिर्फ समुद्री ड्रोन और गाइडेड मिसाइलों से रूसी बेड़े की कमर तोड़ दी.

रूसी नौसेना अभी तक इस झटके से उठ नहीं पाई है. रूस का पूरा ब्लैक सी फ्लीट क्रीमिया के सेवास्तोपोल बंदरगाह से भागने को मजबूर हो गया और अब भी सुरक्षित ठिकाने की तलाश में है.

S-400 और S-500 का मिथक: क्यों फेल हुए दुनिया के सबसे महंगे डिफेंस सिस्टम?

रूस ने S-400 और S-500 को दुनिया का सबसे बेहतरीन एयर डिफेंस सिस्टम बताकर बेचा था, लेकिन यूक्रेन के खिलाफ ये सिस्टम बुरी तरह विफल रहे हैं. इसकी वजह बेहद दिलचस्प है. यूक्रेन ने इन अरबों डॉलर के सिस्टम को मात देने के लिए महज कुछ सौ डॉलर की कीमत वाले छोटे ड्रोन का इस्तेमाल किया. ये ड्रोन इतने छोटे और धीमे होते हैं कि S-400 के एडवांस्ड रडार इन्हें पकड़ ही नहीं पाते.

इसके अलावा यूक्रेन ने ‘स्वार्म अटैक’ यानी झुंड बनाकर हमला करने की तकनीक अपनाई. जब एक साथ 20-30 ड्रोन अलग-अलग दिशाओं से आते हैं, तो डिफेंस सिस्टम ओवरलोड हो जाता है और उनमें से कई बचकर निकल जाते हैं. सस्ते ड्रोन से करोड़ों के सिस्टम को ध्वस्त करना इस युद्ध की सबसे बड़ी सीख है.

सेना की हालत: आंकड़ों में देखिए पूरी बर्बादी

रूस अब तक अपनी सैन्य ताकत का एक बड़ा हिस्सा गंवा चुका है. मारे गए और घायल हुए रूसी सैनिकों की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है. हजारों टैंक और बख्तरबंद गाड़ियां नष्ट हो चुकी हैं. रूसी वायुसेना के सैकड़ों लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर मार गिराए गए हैं. आर्टिलरी सिस्टम और ड्रोन का तो जैसे सफाया ही हो गया है. रूस की नियमित सेना की कमर टूट चुकी है. अब वो जेलों से कैदियों को रिहा करके और विदेशी भाड़े के सैनिकों को भारी रकम देकर युद्ध में झोंक रहा है. एक सुपरपावर का इस स्तर तक गिर जाना अपने आप में हैरान करने वाला है.

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस का सैन्य खर्च 2024 में उसकी GDP का 7.1% यानी करीब 145 अरब डॉलर था. 2025 में यह बढ़कर GDP का 8.7% तक पहुंच गया, जो सोवियत संघ के पतन के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. इसकी तुलना में भारत अपनी GDP का सिर्फ 2% रक्षा पर खर्च करता है. रूस अपनी कमाई का हर ग्यारहवां रुपया सिर्फ युद्ध की भट्टी में झोंक रहा है.

अर्थव्यवस्था की दुर्गति: युद्ध की आग में जलता खजाना

रूस की इकोनॉमी इस जंग की वजह से पूरी तरह चौपट हो चुकी है. पश्चिमी प्रतिबंधों ने तो जैसे उसकी कमर ही तोड़ दी है. तेल और गैस के राजस्व में भारी गिरावट आई है. देश की मुद्रा रूबल की कीमत लगातार गिर रही है. और इस सबसे बड़ी मार, ब्याज दरों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी ने आम रूसी नागरिक और कारोबारियों की नींद उड़ा दी है. बैंकों से कर्ज लेना मुश्किल हो गया है, निवेश ठप पड़ गया है और देश एक गहरी आर्थिक मंदी की तरफ बढ़ रहा है.

अक्टूबर 2024 में ब्याज दर 21% के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई, जो 2003 के बाद सबसे ज्यादा थी. 2025 के मध्य तक यह 23-24% के आसपास बनी रही. इसका मतलब ये हुआ कि कोई भी आम नागरिक होम लोन तो दूर, कार लोन तक नहीं ले पा रहा था. छोटे और मझोले कारोबारी तो जैसे तबाह ही हो गए, क्योंकि बैंकों से कर्ज लेकर धंधा चलाना नामुमकिन हो गया.

रूस में आधिकारिक महंगाई दर 2024 के अंत में 9.5% और 2025 के मध्य तक 10.2% थी. लेकिन खाद्य पदार्थों की महंगाई इससे कहीं ज्यादा रही. अंडे, दूध और सब्जियों जैसी बुनियादी चीजों की कीमतों में 30-40% तक की बढ़ोतरी हुई. मजदूरी भले ही 15-18% बढ़ी, लेकिन महंगाई के आगे वो बौनी साबित हुई.

यूक्रेन की रणनीति: पिस्तौल से तोप को मात देने की कला

यूक्रेन ने रूस जैसी बड़ी ताकत को हराने के लिए ‘कॉरोजिव स्ट्रैटेजी’ यानी क्षरण की नीति अपनाई. इसका मतलब होता है कि दुश्मन को एक बड़े झटके में हराने की बजाय, धीरे-धीरे काट-काटकर कमजोर करना. यूक्रेन ने रूसी सेना की सप्लाई चेन, ईंधन डिपो, गोला-बारूद के जखीरे और कमांड सेंटरों को लगातार निशाना बनाया. पीछे बैठे जनरलों और सप्लाई लाइन के बिना, आगे लड़ रहे रूसी सैनिक बिना हथियार और भोजन के रह गए. यही इस पूरी लड़ाई का सबसे बड़ा गेमचेंजर साबित हुआ.

हार की सबसे बड़ी गवाही: रूसी बेड़े का अपमानजनक पलायन

यूक्रेन के लगातार हमलों से तंग आकर रूस ने अपना पूरा ब्लैक सी फ्लीट क्रीमिया से हटाकर नोवोरोसिस्क भेज दिया है. अब तो नोवोरोसिस्क भी सुरक्षित नहीं रहा, क्योंकि यूक्रेनी ड्रोन वहां तक पहुंचकर हमले कर रहे हैं. रूस को अपने जहाज बचाने के लिए पूर्वी यूरोप के कालिनिनग्राद तक भेजने पड़ रहे हैं. यह जगह ब्लैक सी से करीब 2 हजार किलोमीटर दूर है. इस तस्वीर से बड़ी बेइज्जती क्या होगी कि दुनिया की सबसे बड़ी नौसैनिक शक्तियों में से एक को एक बिना नेवी वाले देश के सामने समंदर से भागना पड़ रहा है.

यूक्रेन ने अब तक रूसी ब्लैक सी फ्लीट के लगभग 30% जहाजों को या तो नष्ट कर दिया है या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त किया है. इनमें 1 क्रूजर, 4 लैंडिंग शिप, 1 सबमरीन, 10 से ज्यादा पैट्रोल बोट और सहायक पोत शामिल हैं. यह किसी बिना नेवी वाले देश के लिए असंभव सी लगने वाली उपलब्धि है.

नई दुनिया का नया सबक: पांच सीखें जो हर सेना को याद रखनी होंगी

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह युद्ध सिर्फ दो देशों के बीच की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की सैन्य सोच के लिए एक जीता-जागता सबक है:

  • सस्ते हथियार से महंगे सिस्टम तबाह: यूक्रेन ने रूस के करोड़ों डॉलर के S-400 और S-500 एयर डिफेंस सिस्टम को मात देने के लिए महज 500 से 2,000 डॉलर की कीमत वाले छोटे FPV ड्रोन का इस्तेमाल किया. रूस ने अब तक लगभग 15 S-400 लॉन्चर और कई रडार सिस्टम खो दिए हैं. वहीं, S-400 सिस्टम खरीदने में 1.2 अरब डॉलर से ज्यादा का खर्च आता है.
  • फुर्तीली टुकड़ियों का जमाना: UK के रक्षा मंत्रालय का अनुमान के मुताबिक, रूस ने इस युद्ध में 1,50,000 से ज्यादा सैनिक खो दिए हैं. यूक्रेनी सेना ने अपने नुकसान को काफी कम रखा क्योंकि उसने बड़ी-बड़ी टुकड़ियों में लड़ने के बजाय छोटी-छोटी 8-10 लोगों की मोबाइल टीमों में काम किया. ये टीमें जैवलिन और NLAW जैसी एंटी-टैंक मिसाइलों से रूसी टैंकों को निशाना बनाती थीं और फिर तुरंत अपनी लोकेशन बदल लेती थीं.
  • सप्लाई लाइन बना बड़ा हथियार: यूक्रेन ने रूस की सप्लाई लाइन को तोड़ने पर सबसे ज्यादा जोर दिया. HIMARS रॉकेट सिस्टम की मदद से उसने रूसी सेना के गोला-बारूद डिपो, ईंधन भंडार और कमांड सेंटरों को निशाना बनाया. नतीजतन 2025 की शुरुआत तक रूसी सेना के पास उतने तोप के गोले नहीं बचे जितने एक दिन की लड़ाई के लिए जरूरी होते हैं. रूस को उत्तर कोरिया से गोले खरीदने पड़े, जो अपने आप में एक सुपरपावर की बेबसी को दिखाता है.
  • आर्थिक कमजोरी से अधूरी सैन्य ताकत: 21% से ऊपर की ब्याज दर, 100 के पार डॉलर के मुकाबले रूबल, 90% तक गिरा यूरोपीय गैस निर्यात और 2.5 अरब डॉलर पर सिमटा विदेशी निवेश. ये आंकड़े बताते हैं कि कोई भी देश कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं है, तो वो लंबी लड़ाई नहीं लड़ सकता.
  • हर हथियार से बड़ी इच्छाशक्ति: 24 फरवरी 2022 को जब रूसी टैंक कीव की तरफ बढ़ रहे थे, तब एक्सपर्ट्स ने मान लिया था कि यूक्रेन 72 घंटे से ज्यादा नहीं टिक पाएगा. लेकिन यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने अमेरिका के प्रस्तावित पलायन को ठुकराते हुए जो कहा, ‘मुझे सवारी नहीं, गोला-बारूद चाहिए.’ वो इस पूरे युद्ध का सबसे बड़ा बयान बन गया. आज वही देश रूस के अंदर तक घुसकर हमले कर रहा है.



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