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Explained: ‘सनातन ही समाजवादी’ या ‘चुनावी नाटक’ का खेल! PDA से हटकर ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की ओर क्यों बढ़े अखिलेश यादव?


2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी राजनीतिक रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. वे अब पारंपरिक जातीय समीकरणों (यादव-मुस्लिम) से हटकर PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ-साथ सॉफ्ट हिंदुत्व को भी अपना रहे हैं. एक्सपर्ट्स इसे ‘नियो-सोशलिस्ट’ रणनीति कह रहे हैं, यानी PDA आधार को बचाते हुए उसमें सॉफ्ट हिंदुत्व का एक नया रंग घोलना. लेकिन क्या यह रणनीति कामयाब हो पाएगी या नहीं…

2024 का आधार: PDA फॉर्मूला जिसने बदल दी तस्वीर

PDA फॉर्मूला वही रणनीति है, जिसने 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को बड़ी कामयाबी दिलाई. 2019 में बीजेपी को उत्तर प्रदेश की 80 में से 64 सीटें मिली थीं. 2024 में यह आंकड़ा घटकर 33 पर आ गया, जबकि सपा ने 37 सीटें जीतीं. सपा-कांग्रेस गठबंधन ने कुल 43 सीटें (37 सपा और 6 कांग्रेस) हासिल कीं.

सपा ने 2019 में सिर्फ 5 सीटें जीती थीं यानी 2024 में सपा का आंकड़ा 5 से बढ़कर 37 हो गया. यह सफलता PDA फॉर्मूले की देन मानी जा रही है. इसी के दम पर सपा ने अयोध्या जैसी बड़ी सीट भी जीती. इस सफलता के बाद अखिलेश यादव ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए भी PDA को अपनी रणनीति का केंद्र बनाया है.

PDA का विस्तार: 100 दलित-आदिवासी उम्मीदवारों की योजना

सपा ने दलित वोटों को साधने के लिए एक बड़ी योजना बनाई है. जुलाई 2026 में सपा ने 2027 के चुनाव के लिए 14 जनरल सीटों पर अनुसूचित जाति (SC) के उम्मीदवार उतारने की योजना बनाई. इससे आरक्षित सीटों (84 SC और 2 ST) को मिलाकर कुल 100 दलित-आदिवासी उम्मीदवार मैदान में होंगे.

इस कदम के पीछे सपा का मानना है कि मायावती की बसपा अब उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति से धीरे-धीरे फीकी पड़ रही है. दलित वोटों को सपा अपनी ओर खींच सकती है. सपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भी मेरठ और फैजाबाद (अयोध्या) जैसी जनरल सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारे थे. अवधेश प्रसाद ने अयोध्या सीट जीती, जबकि सुनीता वर्मा मेरठ में सिर्फ 10,585 वोटों से हारीं.

सॉफ्ट हिंदुत्व: नई राजनीतिक शैली

पॉलिटिकल एक्सपर्ट अमिताभ तिवारी कहते हैं, ‘अखिलेश यादव अच्छी तरह समझते हैं कि सिर्फ PDA के दम पर सत्ता में वापसी मुश्किल है. उत्तर प्रदेश की आबादी का करीब 80% हिंदू है और सिर्फ अल्पसंख्यक या खास जातियों के भरोसे बहुमत हासिल नहीं किया जा सकता. 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में सपा की हार का एक बड़ा कारण यह भी था कि पार्टी को मुस्लिम तुष्टिकरण वाली छवि से नुकसान हुआ.’

अमिताभ तिवारी ने आगे कहा, ‘इस बार अखिलेश ने उस छवि को तोड़ने के लिए एक सधी हुई रणनीति बनाई है, जिसे ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ कहा जा सकता है. यह कोई आक्रामक हिंदुत्व नहीं है, बल्कि हिंदू प्रतीकों, परंपराओं और आस्था के लिए सम्मान दिखाकर अपनी पार्टी की पहुंच बढ़ाने की कोशिश है. यह बीजेपी के कट्टर हिंदुत्व के मुकाबले एक वैकल्पिक, समावेशी हिंदू राजनीति पेश करने का प्रयास है.ट

अखिलेश यादव अब सिर्फ मुसलमानों और यादवों के नेता के रूप में नहीं दिखना चाहते. वह सनातन धर्म परंपराओं में उतना ही जड़ दिखना चाहते हैं:

  • हनुमान चालीसा का सहारा: उन्होंने बड़े मंगल (ज्येष्ठ माह में मंगलवार को मनाया जाने वाला हनुमान जी का त्योहार) के दौरान हनुमान चालीसा के दोहे पढ़े.
  • ज्योतिष में आस्था: अखिलेश ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह ज्योतिषियों से सलाह लेते हैं और ‘पंडित कहे तभी’ आगे बढ़ते हैं. उन्होंने मजाक में खुद को ‘न्यू सोशलिस्ट’ बताया.
  • लैपटॉप और आस्था का संतुलन: वह विकास, AI और लैपटॉप की राजनीति को धर्म, अनुष्ठान और ज्योतिष के साथ जोड़ रहे हैं.

केदारेश्वर महादेव मंदिर: 50 करोड़ रुपए से ज्यादा का प्रोजेक्ट

अखिलेश ने अपने पैतृक शहर इटावा में श्री केदारेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण कराया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पर 50 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होने की बात कही जा रही है.

  • मंदिर में बाल स्वरूप राम की मूर्ति: मंदिर परिसर में भगवान राम की बाल मूर्ति स्थापित की गई है.
  • शिवशक्ति अक्ष रेखा: अखिलेश ने कहा कि यह मंदिर ‘शिवशक्ति अक्ष रेखा’ के ऊपर स्थित है, जो इसे आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है.
  • उद्घाटन: सावन शिवरात्रि (अगस्त 2026) में इसका उद्घाटन होने की उम्मीद है.

अप्रैल 2026 में अखिलेश ने मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना की और निर्माण कार्य की प्रगति जानी. मार्च 2026 में रामनवमी के मौके पर उन्होंने मंदिर में बाल स्वरूप भगवान राम की मूर्ति की स्थापना की जानकारी दी.

शंकराचार्य से मुलाकात: सनातन धर्म की ओर कदम

9 जुलाई 2026 को अखिलेश यादव ने लखनऊ में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मुलाकात की. यह चार महीने में उनकी दूसरी मुलाकात थी. इसके बाद अखिलेश ने सोशल मीडिया पर तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा, ‘पूज्य शंकराचार्य जी के दर्शन और आशीर्वाद पाना सौभाग्य की बात थी. सनातन धर्म पर आ रहे संकट को दूर करने और धर्म को अधर्मियों के चंगुल से मुक्त कराने के लिए सार्थक चर्चा हुई.’

2015 में जब सपा सरकार थी और अखिलेश मुख्यमंत्री थे, तब पुलिस ने इन्हीं शंकराचार्य सहित संतों पर लाठीचार्ज किया था. अब वही शंकराचार्य से मिलकर अखिलेश अपनी छवि बदलने की कोशिश कर रहे हैं. इससे पहले अखिलेश की पत्नी और सांसद डिंपल यादव ने मैनपुरी में शंकराचार्य के पदयात्रा के दौरान उनसे मुलाकात की थी. इस रणनीति के तहत सपा मुख्यालय के बाहर ‘सनातन ही समाजवादी है’ का होर्डिंग भी लगाया गया.

राम मंदिर दान विवाद: बीजेपी को घेरने का हथियार

अखिलेश अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मुद्दे को लगातार उठा रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘इस घटना ने दुनिया भर के सनातनियों को चिंतित कर दिया है. जिसे जिम्मेदारी दी गई थी, उन्होंने भगवान राम की स्थापित गरिमा को विकृत करके बड़ा पाप किया है.’

अखिलेश ने राम मंदिर दान विवाद पर SIT के गठन पर भी सवाल उठाए. उनका तर्क है कि यह सनातन धर्म का अपमान है.

बीजेपी ने क्या जवाब दिया?

बीजेपी ने अखिलेश की इस रणनीति को ‘चुनावी नाटक’ करार दिया. योगी आदित्यनाथ ने तंज कसा कि लगता है अब अखिलेश भी भगवा पहनने वाले हैं. हालांकि, बीजेपी को शंकराचार्य के साथ हुए ‘दुर्व्यवहार’ के मुद्दे पर डैमेज कंट्रोल करना पड़ा. उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने शंकराचार्य के शिष्यों की पूजा करके ब्राह्मणों में नाराजगी को शांत करने की कोशिश की.

तो फिर अखिलेश यादव के सामने चुनौतियां क्या है?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं कि अखिलेश अब ऐसी राजनीतिक लाइन पर चल रहे हैं, जिसमें सामाजिक न्याय और धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान दोनों को साथ लेकर चलना होगा. अखिलेश यादव के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं:

  • कांग्रेस के साथ गठबंधन: अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस के साथ सीट-शेयरिंग का मुद्दा है.
  • जातीय समीकरण का संतुलन: सपा के 97 जिला अध्यक्षों में से 70% यादव या मुस्लिम हैं, यानी PDA के नारे के बावजूद संगठन में पिछड़ों-दलितों को पूरा समर्थन नहीं मिल पाया है.

क्या अखिलेश का ‘सनातन’ दांव कामयाब होगा?

रशीद किदवई ने कहा, ‘इस रणनीति के अपने जोखिम भी हैं और मौके भी. एक तरफ, सॉफ्ट हिंदुत्व का यह प्रयोग सपा के मुस्लिम वोट बैंक को नाराज कर सकता है, जो हमेशा से पार्टी का सबसे भरोसेमंद आधार रहा है. मुसलमानों को यह संदेश जा सकता है कि पार्टी अब उनकी तरफ से आंखें मूंद रही है और हिंदू वोटरों को लुभाने के लिए अपनी मूल विचारधारा से समझौता कर रही है.’

रशीद किदवई ने आगे कहा, ‘दूसरी तरफ, यही रणनीति उन गैर-यादव OBC और दलित हिंदू वोटरों को सपा के करीब ला सकती है, जो अभी तक पार्टी को सिर्फ मुस्लिम-यादव की पार्टी मानकर दूरी बनाए हुए थे. अगर अखिलेश PDA को बनाए रखते हुए सॉफ्ट हिंदुत्व के जरिए 5-7% गैर-यादव हिंदू वोट भी अपनी तरफ खींचने में कामयाब हो जाते हैं, तो 2027 का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है.’



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