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EC विवाद: ’10 महीने में हुए चुनाव रद्द हों’, ज्ञानेश कुमार पर भड़के सिब्बल


राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने रविवार को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर आरोप लगाया है. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में दखल देने, हालिया चुनाव के रिकॉर्ड और फैसलों की जांच करने की अपील की है. साथ ही हाल में हुए चुनावों को रद्द करने पर भी विचार करने को कहा है. कपिल सिब्बल ने कहा है कि जो फैसले कमीशन के हैं ही नहीं तो चुनाव आखिर करवा कैसे लिए? इसकी जांच होना चाहिए. 

कपिल सिब्बल ने एक वीडियो जारी करते हुए इस मसले पर विस्तार से बातचीत की है. सिब्बल ने कहा, 26 सितंबर 2026 को तीन इलेक्शन कमिश्नर्स बैठे, और एक प्रेस नोट जारी किया गया. मुख्य चुनाव आयुक्त ने माना है, कि जो भी फैसले अबतक हुए हैं, सभी की सहमति से नहीं हुए. यानी कि जो फैसले हुए हैं, वो कमीशन के नहीं थे, मतलब के फैसले केवल चीफ इलेक्शन कमिश्नर्स के थे, ज्ञानेश कुमार के थे. वो फैसले कमीशन के नहीं थे. 

इसके आगे सिब्बल ने कहा कि कमीशन की बैठक में कोई एजेंडा नहीं बांटा जाता था. जो फैसले होते थे, उसके मिनट नहीं रखे जाते थे. एजेंडा सर्कुलेट नहीं होता, मिनट भी नहीं रखे जाते थे. इससे साफ जाहिर है कि ये केवल ज्ञानेश कुमार के थे. मीटिंग होती थी, तो किसी को मालूम नहीं था कि एजेंडे में होने क्या वाला है. फैसले हुए, वो भी दोनों कमीश्नर्स को नहीं दिए जाते थे, इसलिए वो टिप्पणी भी नहीं कर  सकते थे. 

इसके अलावा कहा गया कि यह 10 महीने से चला आ रहा था. इलेक्शन ने जून में ऐलान किया कि बिहार में चुनाव होंगे. अप्रैल में खत्म होते हैं, जब पश्चिम बंगाल का चुनाव खत्म होता है. जून 2025 से अप्रैल 2026 तक 10 महीने होते हैं. तो जो 2 इलेक्शन कमिश्नर्स कह रहे हैं, कि पिछले 10 महीने से जो फैसले लिए जा रहे हैं, वो सिर्फ ज्ञानेश कुमार ले रहे हैं. इसका मतलब सारे फैसले बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल तक ज्ञानेश कुमार ने किए. ज्ञानेश कुमार किसी से सलाह मशविरा नहीं कर रहे थे. इसका मतलब ये हुआ कि जो केंद्रीकरण हुआ, ईसीआईनेट के द्वारा, जहां फैसले डिलीशन और एडिशन के लिए गए, ये फैसले ईआरओ नहीं लेता था, ये फैसले ज्ञानेश कुमार जी लेते थे. इसका बाकी दो कमिश्नर्स को कोई जानकारी नहीं थी.

‘ये कानून और नोटिफिकेशन का उल्लंघन है’

इसके अलावा कपिल सिब्बल ने 24 जून के नोटिफिकेशन दिखाते हुए बताया जिसमें वोटर्स को जोड़ने और हटाने का अधिकार ईआरओ के पास था, उसका उल्लंघन होता रहा. तो यह 10 महीने जो फैसले हुए, वोटर्स को जोड़ने और घटाने के, वो कमीशन के नोटिफिकेशन का उल्लंघन है और कानून का भी उल्लंघन है. क्योंकि रिप्रेजेंटेशन एक्ट के तहत यह फैसला ईआरओ को करना था. इसका मतलब जो सारे इलेक्शन बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल तक जितने फैसले हुए, वो सारे कानून के खिलाफ हैं.

’10 महीने में जो चुनाव हुए हैं, उन्हें रद्द किया जाए’

अब 26 सितंबर को मीटिंग की है. इसमें इलेक्शन कमीशन की तरफ से कहा गया है कि जो पिछले 10 महीने से हो रहा है, वो अब नहीं होगा. तो जो पिछले 10 महीने में जो चुनाव हुए हैं, उनको तो रद्द करना पड़ेगा. 

सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से इस पूरे मामले में हस्तक्षेप की मांग की है. उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट को चुनाव आयोग के डॉक्यूमेंट्स और इससे जुड़े आदेशों की जांच करनी चाहिए. उन्होंने अदालत से मामले में स्वत: संज्ञान लेने और हाल के चुनावों को रद्द करने की संभावना पर विचार करने की मांग की है. 



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