चुनाव आयोग को लेकर जारी एक रिपोर्ट के बाद देश की राजनीति गरमाई हुई है. इसमें दावा किया गया है कि दो चुनाव आयुक्त ने कहा है कि कई फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए. ऐसे ये सिर्फ सवाल नहीं रह जाता, बल्कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का सवाल बन जाता है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 24 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ऐसे ही सवालों की बौछार कर दी. उन्होंने चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार से लेकर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को वोट चोरी का सबूत बताया.
विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन तैयार करके मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मोदी सरकार पर हमले किये. उन्होंने कहा कि पहले वोट चोरी हुई, फिर कानून चोरी हुई और फिर संस्था चोरी हुई. राहुल गांधी ने आरोप लगाया, ‘चुनाव आयोग ने भारत देश के खिलाफ काम किया है. चुनाव आयोग ने भारत के संविधान पर हमला किया है. चुनाव आयोग ने देशद्रोह किया है.’ उन्होंने कहा कि देश एक ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जिसका सामना भारतीय इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ. राहुल गांधी ने मोदी सरकार और CEC ज्ञानेश कुमार को डिस्ट्रॉयर ऑफ डेमोक्रेसी बता दिया. राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत ही इस सवाल से की थी कि बीजेपी के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी क्यों नहीं होती?
चुनाव आयोग ने देशद्रोह किया: राहुल गांधी
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ये कहना चाह रहे थे कि बीजेपी जो भी चुनाव जीतती है, वो चुनाव आयोग के दम पर जीतती है. उनका आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार जो कुछ करते हैं, वो मोदी सरकार से पूछकर करते हैं, मोदी सरकार के कहने पर करते हैं, राहुल गांधी ने कहा, ‘वोट चोरी भारत की जनता के खिलाफ अपराध है. यह संविधान पर सीधा हमला है. चुनाव आयोग ने देशद्रोह किया है. ज्ञानेश कुमार को तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए.’
राहुल गांधी ने किस कानून का किया था जिक्र?
राहुल गांधी यहीं नहीं रुके. उन्होंने दावा कर दिया कि ज्ञानेश कुमार को पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने ही अपॉइंट किया था और अब वही उन्हें बचा रहे हैं. राहुल गांधी जिस कानून का जिक्र करके ज्ञानेश कुमार को इम्युनिटी दिए जाने की बात कह रहे हैं, वो कानून क्या है और वो इम्युनिटी क्या है, वो समझते हैं. साल 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम बना. इसी कानून की धारा 16 के मुताबिक कोई भी कोर्ट मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त के खिलाफ नागरिक या आपराधिक मुकदमा नहीं चला सकती. ये सुरक्षा उन कामों या फैसलों के लिए है, जो उन्होंने अपने आधिकारिक कर्तव्य निभाते हुए किए हों और ये इम्युनिटी पद छोड़ने के बाद भी बनी रहती है. यानी लाइफटाइम मिलती है, लेकिन सिर्फ आधिकारिक ड्यूटी के दौरान किए गए कामों पर ही लागू होती है.
आसान भाषा में कहें तो ज्ञानेश कुमार या कोई भी चुनाव आयुक्त या मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद पर रहते हुए जो फैसले लेते हैं, उनके खिलाफ अदालत में केस दायर करना बहुत मुश्किल है. इसी पर राहुल गांधी ने सवाल उठाया है. हालांकि उन्होंने साथ में ये भी दावा किया कि ज्ञानेश कुमार को बचकर नहीं जाने देंगे. सिर्फ राहुल गांधी ही नहीं, बल्कि पूरा विपक्ष एक सुर में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ बयान दे रहा है और उनका इस्तीफा मांग रह है. ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दल मिलकर महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं.
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी
कांग्रेस इंडिया गठबंधन के दलों के साथ समन्वय कर रही है. प्रस्ताव का मसौदा कानूनी विशेषज्ञों की मदद से तैयार किया जा रहा है. अगले एक दो हफ्तों में लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में नोटिस जमा करने की योजना है. वैसे दो बार पहले भी विपक्षी दलों ने संसद में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग चलाने की कोशिश की है, लेकिन एक बार ये प्रस्ताव खारिज हो चुका है और एक प्रस्ताव अभी भी लंबित है. हालांकि महाभियोग चलाकर ज्ञानेश कुमार को पद से हटवाना भी कोई आसान काम नहीं है.
महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए. राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर चाहिए. नोटिस स्वीकार होने के बाद जांच समिति बनती है. अंत में दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरूरी है. राहुल गांधी ने तो यहां तक कह दिया कि ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में जितने भी चुनाव हुए हैं, सब फेक हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए जो भी चुनाव हुए उनमें वोट चोरी हुई.
ज्ञानेश कुमार के CEC बनने के बाद हुए चुनाव
- नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव, जिसमें बीजेपी गठबंधन की जीत हुई.
- अप्रैल 2026 में असम विधानसभा चुनाव. इसमें भी बीजेपी गठबंधन दोबारा जीता.
- अप्रैल 2026 में ही केरलम् और पुदुचेरी में चुनाव हुए. इसमें कांग्रेस गठबंधन केरल में और एनडीए पुदुचेरी में जीता.
- अप्रैल 2026 में ही तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में टीवीके को जीत मिली.
- मई 2026 में हुए बंगाल विधानसभा चुनाव में पहली बार जीतकर बीजेपी ने सरकार बनाई है.
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इन सभी चुनावों में वोट चोरी हुई, जिसका जवाब देने के लिए बीजेपी भी मैदान में उतर आई. बीजेपी प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से ईर्ष्या और चुनावों में अपनी पार्टी को मिल रही हार के कारण कांग्रेस नेता निर्वाचन आयोग के अंदर मतभेदों पर आई एक मीडिया रिपोर्ट को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘निर्वाचन आयोग में सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए. ऐसा कोई सबूत नहीं है कि निर्णय बहुमत के आधार पर लिए गए हों.’
गोवा एसआईआर को लेकर उठे सवाल
अभी तक तो चुनाव आयोग भी खुद पर लग रहे आरोपों का ठीक से जवाब नहीं दे पा रहा है. जिसमें एक सवाल गोवा के 97 वोटर्स के नाम डिलीट होने का भी है. जिसको लेकर मीडिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि एसआईआर के दौरान जांच में 97 वोटर्स को योग्य पाया फिर भी नाम फाइनल लिस्ट में नहीं जुड़े. एसीआई नेट सॉफ्टवेयर में रोल बैक विकल्प नहीं दिया गया, जिससे स्थानीय अधिकारी खुद नाम वापस नहीं जोड़ पाए. उपचुनाव आयुक्तों ने आईटी विभाग को सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया. फिर भी नाम नहीं जोड़े गए. गोवा के 97 योग्य वोटर्स के नाम अभी भी वोटर लिस्ट से गायब हैं. अब आसान भाषा में आपको समझाते हैं कि गोवा में 97 वोटर्स केनाम कटने का केस आखिर क्या है. गोवा में एसआईआर के दौरान कुछ वोटर्स के नाम लॉजिकल गड़बड़ी के कारण पहले कट गए थे.
लॉजिकल गड़बड़ी यानी उम्र या नाम सॉफ्टवेयर में मैच ना होना. बाद में गोवा के स्थानीय इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स. यानी ईआरओस ने इनके दस्तावेज चेक किए और 97 वोटर्स को योग्य पाया. इसके बाद तय किया गया कि इन 97 वोटर्स के नाम एसआईआर लिस्ट में वापस जोड़े जाने चाहिए. क्यों नहीं जोड़ पाए? इसको लेकर मीडिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि नाम वापस जोड़ने के लिए चुनाव आयोग को केंद्रीय सॉफ्टवेयर ईसीआई नेट का इस्तेमाल होता है. इसमें रोल बैक यानी पहले के फैसले को पलटने का विकल्प इआरओस के पास उपलब्ध नहीं था. क्योंकि ईसीआई नेट का कंट्रोल दिल्ली में बैठे चुनाव आयोग के अधिकारियों के पास होता है. जिस वजह से गोवा के इआरओस 97 योग्य वोटर्स का नाम वोटर लिस्ट में नहीं जोड़ पाए.
7 दिनों में आठ ईमेल भेजा
अब इसके बाद जो हुआ वह चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर सवाल उठाता है. जिसको लेकर दो चुनाव आयुक्तों ने भी आपत्ति दर्ज करवाई थी तो हुआ यह कि 97 वोटर्स के नाम जोड़ने के लिए गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के दफ्तर ने 7 दिनों में आठ ईमेल भेजकर बार-बार एसीआई नेट में रोल बैक यानी पहले के फैसले को पलटने की सुविधा मांगी. गोवा चुनाव आयुक्त ने भी चुनाव आयुक्त के आईटी विभाग को लिखा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक 97 वोटर्स के नाम वापस जोड़ने के सिस्टम को रोकना नहीं चाहिए. खुलासे के मुताबिक गोवा के निर्वाचन आयोग को ना कोई जवाब मिला और ना 97 वोटर्स के नाम एसीआई नेट के जरिए वापस जोड़ने की सुविधा दी गई.
